सीटों की बिसात पर बीजेपी की बढ़ी बेचैनी, सहयोगियों का  दबाव

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है। यही वजह है कि जब विधानसभा चुनाव में अभी करीब एक साल का वक्त बचा हो और राजनीतिक दल सीटों के बंटवारे पर चर्चा शुरू कर दें, तो यह साफ संकेत होता है कि लड़ाई केवल विपक्ष से नहीं बल्कि अपने सहयोगियों को साथ रखने की भी है। इस बार तस्वीर कुछ ऐसी ही बन रही है। एक तरफ इंडिया गठबंधन में कांग्रेस समाजवादी पार्टी से पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा सीटों की हिस्सेदारी चाहती है, तो दूसरी तरफ एनडीए में भी राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा), निषाद पार्टी और दूसरे सहयोगी दल अपनी राजनीतिक ताकत का नया हिसाब मांग रहे हैं। ऐसे माहौल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का लखनऊ दौरा केवल संगठनात्मक बैठक नहीं था, बल्कि 2027 के चुनाव का पहला बड़ा राजनीतिक संदेश भी था।भाजपा नेतृत्व ने सहयोगी दलों को साफ शब्दों में कहा कि अभी सार्वजनिक मंचों पर सीटों की दावेदारी से बचा जाए। पहले उन सीटों पर काम किया जाए जहां 2022 में गठबंधन को हार मिली थी। सीटों का अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व करेगा। राजनीतिक नजरिए से देखें तो यह संदेश जितना सहयोगियों के लिए था, उतना ही भाजपा के अपने नेताओं के लिए भी था। पार्टी यह नहीं चाहती कि चुनाव से एक साल पहले ही सीटों को लेकर ऐसा माहौल बने, जिससे गठबंधन के भीतर असहजता पैदा हो।दरअसल भाजपा की यह सावधानी अचानक नहीं आई है। इसके पीछे पिछले तीन चुनावों का पूरा राजनीतिक अनुभव है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर 325 सीटें जीतकर इतिहास रचा था। अकेले भाजपा के खाते में 312 सीटें आई थीं। लेकिन 2022 में भाजपा 255 सीटों पर सिमट गई और एनडीए का कुल आंकड़ा 273 तक पहुंचा। समाजवादी पार्टी ने 111 सीटें जीतकर विपक्ष को नई ताकत दी। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की तस्वीर और बदल गई। समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि भाजपा 33 सीटों पर आ गई। कांग्रेस ने भी छह सीटें जीतकर गठबंधन की ताकत बढ़ाई। यही नतीजे भाजपा को यह सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि 2027 की लड़ाई केवल मोदी और योगी के चेहरे पर नहीं जीती जा सकती, बल्कि सहयोगियों को साथ लेकर चलना भी उतना ही जरूरी होगा।यही कारण है कि इस बार भाजपा संगठन पर असाधारण जोर दे रही है। नितिन नवीन ने केवल सहयोगी दलों से ही बैठक नहीं की, बल्कि पूर्व प्रदेश अध्यक्षों, वरिष्ठ नेताओं और संगठन के पदाधिकारियों से अलग-अलग फीडबैक लिया। पार्टी की रणनीति साफ है पहले बूथ, फिर संगठन और उसके बाद उम्मीदवार। भाजपा का मानना है कि यदि संगठन मजबूत होगा तो सीटों का विवाद भी आसानी से सुलझ जाएगा।

लेकिन सहयोगी दलों की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। सबसे ज्यादा बदलाव राष्ट्रीय लोक दल में दिखाई देता है। चौधरी अजीत सिंह के दौर में आरएलडी की पहचान मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जाट राजनीति तक सीमित थी। लेकिन जयंत चौधरी के नेतृत्व में पार्टी अब खुद को पूरे उत्तर प्रदेश की पार्टी के रूप में स्थापित करना चाहती है। पिछले एक साल में पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड में लगातार कार्यक्रम, किसान पंचायतें और सामाजिक सम्मेलन इसी रणनीति का हिस्सा हैं। पार्टी का दावा है कि उसने प्रदेश के सभी 18 मंडलों में संगठन खड़ा कर लिया है। यही वजह है कि आरएलडी अब केवल बागपत, मुजफ्फरनगर, मेरठ या शामली तक सीमित सीटें नहीं चाहती, बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी हिस्सेदारी मांग रही है।आरएलडी की इस रणनीति के पीछे राजनीतिक गणित भी है। जाट वोट बैंक के साथ-साथ दलित, अति पिछड़ा और मुस्लिम समाज के बीच लगातार संपर्क अभियान चलाए जा रहे हैं। पार्टी जानती है कि यदि भविष्य में उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनानी है तो पश्चिम तक सीमित रहना नुकसान का सौदा होगा। यही वजह है कि सीटों का सवाल उसके लिए केवल चुनाव लड़ने का नहीं बल्कि राजनीतिक विस्तार का मुद्दा बन गया है।उधर ओम प्रकाश राजभर भी अपनी राजनीतिक जमीन को और मजबूत करने में जुटे हैं। कभी भाजपा के साथ तो कभी समाजवादी पार्टी के साथ जाने वाले राजभर अब एनडीए के भीतर अपनी उपयोगिता लगातार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। पूर्वांचल की राजभर बहुल सीटों पर उनका प्रभाव भाजपा भी स्वीकार करती है। इसी कारण सुभासपा ने भाजपा नेतृत्व के सामने उन सीटों की सूची रखी है जहां पार्टी पिछले कई वर्षों से संगठन खड़ा कर रही है। खास तौर पर आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, बलिया और आसपास के इलाकों में सुभासपा की नजर है। पार्टी का मानना है कि यदि उसे ज्यादा सीटें मिलती हैं तो समाजवादी पार्टी के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाई जा सकती है।संजय निषाद भी पीछे नहीं हैं। निषाद समाज को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग एक बार फिर उन्होंने भाजपा नेतृत्व के सामने रखी। यह मुद्दा वर्षों से उनकी राजनीति का आधार रहा है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि संजय निषाद जानते हैं कि यह मांग तुरंत पूरी होना आसान नहीं है, लेकिन इसे जीवित रखकर वह अपने सामाजिक आधार को लगातार सक्रिय बनाए रखते हैं। इसके साथ ही निषाद पार्टी भी उन क्षेत्रों में ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है जहां मछुआरा और निषाद समाज निर्णायक भूमिका में है।

भाजपा की मुश्किल केवल सहयोगियों तक सीमित नहीं है। विपक्ष में भी लगभग ऐसी ही तस्वीर है। कांग्रेस अब खुलकर समाजवादी पार्टी से ज्यादा सीटें मांग रही है। उसका तर्क है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन सुधरा है, इसलिए विधानसभा चुनाव में भी उसे सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। लेकिन समाजवादी पार्टी अपने मजबूत प्रदर्शन के बाद पीछे हटने को तैयार नहीं दिखती। यानी दोनों बड़े गठबंधनों के भीतर सीटों की राजनीति धीरे-धीरे तेज होती जा रही है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार सीटों का बंटवारा केवल पिछले चुनावी नतीजों से तय नहीं होगा। जातीय समीकरण, बूथ संगठन, उम्मीदवार की स्थानीय स्वीकार्यता, पिछले दो वर्षों की राजनीतिक सक्रियता और लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन जैसे कई पैमाने सामने होंगे। भाजपा भी यही संदेश अपने सहयोगियों को दे रही है कि केवल दावा करने से सीट नहीं मिलेगी, बल्कि जमीन पर ताकत दिखानी होगी।यही वजह है कि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में जनसभाओं, सामाजिक सम्मेलनों और संगठन विस्तार की गतिविधियां तेजी से बढ़ेंगी। हर सहयोगी दल अपने प्रभाव वाले इलाकों में भीड़ जुटाएगा, ताकि जब सीटों की बातचीत शुरू हो तो उसके पास राजनीतिक ताकत का प्रमाण हो। भाजपा भी इसी आधार पर अंतिम फैसला लेने की तैयारी कर रही है। फिलहाल इतना साफ है कि 2027 का चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन उसकी सबसे कठिन लड़ाई शुरू हो चुकी है। यह लड़ाई विपक्ष और सत्ता के बीच जितनी है, उससे कहीं ज्यादा गठबंधनों के भीतर है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सहयोगियों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को संतुलित करते हुए अपना नेतृत्व कायम रखना है। वहीं सहयोगी दल जानते हैं कि अगर इस बार अपनी हिस्सेदारी नहीं बढ़ाई तो भविष्य में उनकी राजनीतिक हैसियत सीमित हो सकती है। इसलिए उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति अब भाषणों से ज्यादा सीटों के गणित पर टिक गई है। आने वाले महीनों में लखनऊ और दिल्ली के बीच होने वाली बैठकों में सिर्फ सीटों का बंटवारा नहीं होगा, बल्कि यह भी तय होगा कि 2027 में एनडीए की असली ताकत कौन होगा और किसकी राजनीतिक सौदेबाजी सबसे भारी पड़ेगी।