कानपुर बैंक विवाद ने सोशल मीडिया से लेकर थाने तक खींची जाति, सम्मान और सिस्टम की बहस
कानपुर के पनकी इलाके में स्थित एक निजी बैंक की शाखा में 6 जनवरी को हुई एक मामूली-सी दिखने वाली घटना ने ऐसा रूप ले लिया, जिसने न सिर्फ दो परिवारों की जिंदगी उलझा दी बल्कि पूरे समाज को एक बार फिर जाति, महिला सम्मान और सोशल मीडिया की भूमिका पर सोचने को मजबूर कर दिया। यह मामला तब सुर्खियों में आया जब फरवरी के दूसरे सप्ताह में एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ, जिसमें बैंक की रिलेशनशिप मैनेजर आस्था सिंह गुस्से में “मैं ठाकुर हूं” कहते हुए नजर आईं। यह वीडियो महज 30 से 40 सेकेंड का था, लेकिन इसके असर ने हफ्तों तक सोशल मीडिया और समाचार जगत को गर्माए रखा।बताया जा रहा है कि 6 जनवरी को बैंक की पूर्व कर्मचारी ऋतु त्रिपाठी अपने रिलीविंग लेटर के लिए शाखा पहुंची थीं। उनके साथ पति ऋषि मिश्रा और ननद भी मौजूद थीं। बातचीत के दौरान किसी बात पर कहासुनी हुई और माहौल बिगड़ गया। उसी दौरान किसी ने मोबाइल से वीडियो बना लिया, जो बाद में वायरल हुआ। आस्था सिंह का कहना है कि यह वीडियो अधूरा है और पूरी घटना को नहीं दिखाता। उनका दावा है कि उनसे पहले उनकी जाति पूछी गई, उन्हें धमकाया गया और नौकरी से निकलवाने तक की बात कही गई, जिसके जवाब में उन्होंने गुस्से में अपनी पहचान बताई।
वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कुछ लोगों ने आस्था की भाषा और व्यवहार को गलत ठहराया, तो कुछ ने इसे उकसावे की प्रतिक्रिया बताया। देखते-देखते मामला ‘ठकुराइन बनाम पंडिताइन’ जैसी टिप्पणियों तक पहुंच गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ ही घंटों में वीडियो हजारों बार शेयर हुआ और लाखों लोगों तक पहुंच गया। डिजिटल इंडिया से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर दिन औसतन 50 करोड़ से ज्यादा लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय रहते हैं और ऐसे वायरल वीडियो कुछ ही समय में जनमत को प्रभावित कर देते हैं।आस्था सिंह ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वीडियो वायरल होने के बाद उन्हें गंभीर मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें गालियां दी जा रही हैं, चरित्र पर सवाल उठाए जा रहे हैं और यहां तक कि दुष्कर्म जैसी धमकियां भी मिल रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस बदनामी के कारण उनके करियर पर असर पड़ सकता है और भविष्य में नौकरी मिलना मुश्किल हो सकता है। आस्था ने पनकी थाने में लिखित शिकायत देकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
दूसरी ओर, ऋतु त्रिपाठी ने अपने बयान में साफ कहा कि उन्होंने या उनके पति ने कभी आस्था सिंह की जाति नहीं पूछी। उनका कहना है कि वे बैंक सिर्फ रिलीविंग लेटर के सिलसिले में गई थीं और वहां आस्था ने बिना वजह गाली-गलौज की और जाति का जिक्र किया। ऋतु ने कहा कि वे जातिवाद में विश्वास नहीं करतीं और उनका परिवार बेवजह इस विवाद में घसीटा जा रहा है। ऋतु के पति ऋषि मिश्रा ने भी सीसीटीवी फुटेज की जांच की मांग की है ताकि सच्चाई सामने आ सके।ऋतु त्रिपाठी ने यह भी बताया कि उन्होंने बैंक की नौकरी इसलिए छोड़ी थी क्योंकि काम के घंटे बहुत लंबे थे। उनका आठ महीने का बच्चा घर पर था और उन्हें देर रात तक बैंक में रुकना पड़ता था। श्रम से जुड़े हालिया आंकड़ों के अनुसार, निजी बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में काम करने वाले करीब 35 से 40 प्रतिशत कर्मचारी तय समय से ज्यादा काम करने को मजबूर हैं, जिसका असर खासकर महिला कर्मचारियों पर पड़ता है।इस पूरे मामले ने सोशल मीडिया ट्रोलिंग की गंभीरता को भी उजागर किया है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन उत्पीड़न और धमकी से जुड़े मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अधूरे वीडियो और बिना संदर्भ की जानकारी लोगों को तुरंत निष्कर्ष पर पहुंचा देती है, जिससे असल मुद्दा पीछे छूट जाता है।
पुलिस ने दोनों पक्षों की शिकायतें दर्ज कर ली हैं और मामले की जांच शुरू कर दी है। पनकी थाना पुलिस का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज, गवाहों के बयान और उपलब्ध सबूतों के आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई की जाएगी। पुलिस दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाकर बातचीत कराने की भी तैयारी कर रही है, ताकि सच्चाई सामने आ सके।कुल मिलाकर, यह विवाद सिर्फ एक बैंक शाखा की तकरार नहीं रह गया है। यह घटना इस बात की मिसाल बन गई है कि कैसे एक अधूरा वीडियो किसी व्यक्ति की पहचान, सम्मान और भविष्य को दांव पर लगा सकता है। अब निगाहें पुलिस जांच और तथ्यों पर टिकी हैं, क्योंकि फैसला जो भी हो, यह मामला समाज को यह सोचने पर जरूर मजबूर कर चुका है कि गुस्सा, जाति और सोशल मीडिया का मेल कितना खतरनाक हो सकता है।
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