टीएफए विवाद यूपीए बनाम एनडीए क्या 2013 का समझौता किसानों के हित में था
संसद में हालिया बहस के दौरान जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2013 के ट्रेड डील का मुद्दा उठाया, तो एक बार फिर विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ के ट्रेड फैसिलिटेशन एग्रीमेंट (टीएफए) पर चर्चा तेज हो गई। आरोप लगा कि यूपीए सरकार ने इस समझौते के जरिए भारतीय किसानों के हितों से समझौता किया था। वहीं विपक्ष ने इसे राजनीतिक आरोप करार दिया। ऐसे में सवाल यह है कि टीएफए था क्या, इसमें भारत ने क्या स्वीकार किया और क्या इससे वाकई किसानों को नुकसान हो सकता था।टीएफए दरअसल डब्ल्यूटीओ के तहत दिसंबर 2013 में इंडोनेशिया के बाली में हुए मिनिस्टीरियल सम्मेलन में हुआ समझौता था। यह डब्ल्यूटीओ के गठन के बाद पहला बड़ा बहुपक्षीय व्यापार समझौता माना गया। इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय व्यापार को आसान बनाना था। सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को सरल करना, कागजी कार्रवाई घटाना, बंदरगाहों पर माल की आवाजाही तेज करना और पारदर्शिता बढ़ाना इसके मुख्य लक्ष्य थे। उस समय आकलन किया गया था कि इससे वैश्विक व्यापार लागत करीब 15 फीसदी तक कम हो सकती है और दुनिया भर में व्यापार का आकार एक ट्रिलियन डॉलर तक बढ़ सकता है।
भारत जैसे निर्यातक देश के लिए यह समझौता कागजों में काफी फायदेमंद दिख रहा था। उद्योग जगत खासकर निर्यातकों और एमएसएमई सेक्टर ने इसका स्वागत किया। उनका मानना था कि अगर कस्टम क्लीयरेंस तेज होगा और नियम सरल होंगे तो भारतीय सामान विदेशी बाजारों तक सस्ते और जल्दी पहुंच सकेंगे। लेकिन दूसरी तरफ कृषि क्षेत्र को लेकर गहरी चिंता भी सामने आई।असल विवाद खाद्य सुरक्षा से जुड़ा था। भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत सरकार बड़े पैमाने पर अनाज खरीदती और गरीबों को सस्ती दर पर उपलब्ध कराती है। डब्ल्यूटीओ के नियमों के तहत कृषि सब्सिडी पर पहले से ही सख्त सीमाएं तय हैं। टीएफए के साथ जुड़े कुछ प्रावधानों को लेकर आशंका जताई गई कि आगे चलकर ये नियम भारत की खाद्य सुरक्षा योजनाओं पर सवाल खड़े कर सकते हैं।2013 में जब यूपीए सरकार सत्ता में थी, तब भारत ने टीएफए पर सैद्धांतिक सहमति जताई थी। हालांकि, भारत ने उसी समय यह भी साफ किया था कि खाद्य सुरक्षा उसके लिए गैर-समझौता योग्य मुद्दा है। बाली सम्मेलन में एक अस्थायी समाधान के तौर पर ‘पीस क्लॉज’ पर सहमति बनी थी। इसके तहत भारत जैसे देशों को कुछ समय तक एमएसपी और पीडीएस जैसी योजनाएं जारी रखने की छूट दी गई थी, भले ही वे सब्सिडी की तय सीमा से ऊपर क्यों न चली जाएं।
यूपीए सरकार का तर्क था कि यह अस्थायी राहत भारत के लिए जरूरी समय खरीदेगी और इस दौरान स्थायी समाधान पर बातचीत की जा सकती है। लेकिन आलोचकों का कहना था कि यह पीस क्लॉज सीमित अवधि का था और भविष्य में भारत पर दबाव बढ़ सकता था। छोटे और सीमांत किसानों के हितों को लेकर सवाल उठने लगे थे।मई 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ और एनडीए सरकार बनी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली नई सरकार ने टीएफए को लेकर सख्त रुख अपनाया। जुलाई 2014 तक टीएफए के प्रोटोकॉल को अंतिम रूप दिया जाना था, लेकिन ठीक उससे पहले भारत ने इसे रोक दिया। सरकार ने डब्ल्यूटीओ को साफ संदेश दिया कि जब तक खाद्य सुरक्षा और पीडीएस पर स्थायी समाधान नहीं मिलता, तब तक टीएफए को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।यह कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। कई देशों ने इसे व्यापार सुधारों में बाधा बताया, जबकि भारत ने इसे किसानों और गरीबों के हितों की रक्षा से जोड़ा। सरकार का कहना था कि चार साल का पीस क्लॉज पर्याप्त नहीं है और इससे भारत की खाद्य सुरक्षा हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं होती। भारत ने स्पष्ट किया कि वह ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा, जिससे भविष्य में एमएसपी या सरकारी अनाज खरीद पर सवाल उठें।
लंबी बातचीत और दबाव के बाद डब्ल्यूटीओ में भारत की बात मानी गई। 2015 और 2016 के दौरान खाद्य सुरक्षा पर स्थायी समाधान को लेकर सहमति बनी। अप्रैल 2016 में जाकर भारत ने टीएफए को लागू करने पर हामी भरी। इसके साथ ही यह भरोसा मिला कि एमएसपी पर अनाज खरीद और पीडीएस के जरिए गरीबों को खाद्य सुरक्षा देने की नीति पर कोई आंच नहीं आएगी।टीएफए लागू होने के बाद इसके असर धीरे-धीरे दिखने लगे। कस्टम प्रक्रियाएं आसान हुईं, डिजिटल सिस्टम को बढ़ावा मिला और बंदरगाहों पर माल रोकने का समय घटा। खासकर छोटे और मध्यम निर्यातकों को इससे राहत मिली। लॉजिस्टिक्स लागत कम होने से भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बने।सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, टीएफए के बाद भारत ने अपने ट्रेड सिस्टम को कई मुक्त व्यापार समझौतों के अनुरूप अपडेट किया। इससे न सिर्फ निर्यात बढ़ा बल्कि ग्लोबल वैल्यू चेन में भारत की हिस्सेदारी भी मजबूत हुई। विदेशी निवेशकों के लिए भी भारत का व्यापारिक माहौल ज्यादा आकर्षक बना।
हालांकि, राजनीतिक बहस आज भी जारी है। एक पक्ष इसे यूपीए की जल्दबाजी बताता है तो दूसरा इसे अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कहता है। सच यह है कि टीएफए अपने आप में न तो किसानों के खिलाफ था और न ही पूरी तरह उनके पक्ष में। असली लड़ाई इसके साथ जुड़े कृषि और सब्सिडी नियमों को लेकर थी, जहां भारत ने आखिरकार अपनी शर्तों पर समझौता लागू कराया।आज जब संसद में इस मुद्दे पर फिर से बहस हो रही है, तो यह साफ है कि व्यापार और कृषि के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं। भारत जैसे देश के लिए, जहां करोड़ों किसानों की आजीविका एमएसपी और सरकारी खरीद पर निर्भर है, किसी भी वैश्विक समझौते में सतर्कता जरूरी है। टीएफए की कहानी यही बताती है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के फायदे तभी मायने रखते हैं, जब देश के सबसे कमजोर वर्ग के हित सुरक्षित रहें।
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