लखनऊ में अतिक्रमण-बैटरी रिक्शा का आतंक, सभी ट्रैफिक नियम बेकार
लखनऊ, नवाबों का शहर, जहां तहजीब और संस्कृति की मिसाल दी जाती है, लेकिन आज यहां की सड़कें जाम के जाल में फंसी हुई हैं। हर रोज सुबह से शाम तक लाखों लोग घंटों इस जाम में खड़े रहते हैं। वजह? अतिक्रमण का बोलबाला और बैटरी रिक्शा की मनमानी। शहर की 45 लाख से ज्यादा आबादी रोज इस समस्या से जूझ रही है, लेकिन प्रशासन की कार्रवाई अक्सर दिखावटी साबित हो रही है। शहर में 37 लाख से अधिक वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं, लेकिन सड़कें पुरानी और संकरी हैं। ऊपर से ई-रिक्शा और ऑटो वाले जहां मन करता है, वहां गाड़ी रोक देते हैं, सवारी उतारते हैं या चढ़ाते हैं। फुटपाथ पर दुकानें, ठेले और अवैध पार्किंग ने सड़कों को और संकरा कर दिया है। ट्रैफिक नियम तो बस किताबों में रह गए हैं, सड़क पर कोई डर नहीं।शहर के प्रमुख इलाकों में देखिए क्या हाल है। आलमबाग, कैसरबाग और अवध बस स्टेशनों के बाहर ई-रिक्शा और बसों का ऐसा घमासान मचा रहता है कि राहगीरों का निकलना दूभर हो जाता है। बसें सड़क किनारे खड़ी होती हैं, और उनके चारों तरफ ई-रिक्शा वाले घेरा डाल लेते हैं। सवारी उतरती नहीं कि जाम लग जाता है। लोग बेबस होकर इंतजार करते रहते हैं। इसी तरह मुंशी पुलिया और टेढ़ी पुलिया पर अतिक्रमण और अव्यवस्थित पार्किंग ने जाम को रोजमर्रा की समस्या बना दिया है। यहां ई-रिक्शा चालक मनमाने ढंग से वाहन खड़े कर देते हैं, और ट्रैफिक पुलिस अक्सर मूकदर्शक बनी रहती है। पुराने शहर में नखास चौराहे से चौक तक बैटरी रिक्शा का मकड़जाल फैला हुआ है। रोजाना जाम लगता है, पैदल चलना मुश्किल हो जाता है। बालागंज चौराहे पर भी ई-रिक्शा का कब्जा है, ऑटो और टेंपो मिलकर जाम का कारण बनते हैं।
आंकड़े इस समस्या की गंभीरता बताते हैं। लखनऊ में 35 हजार से ज्यादा अनफिट और अवैध ई-रिक्शा सड़कों पर दौड़ रहे हैं। ये वाहन न सिर्फ ट्रैफिक नियम तोड़ते हैं, बल्कि जाम का मुख्य कारण भी हैं। अवध चौराहे पर ई-रिक्शा और ऑटो आधे रोड पर कब्जा जमाए रहते हैं, जिससे रोज जाम लगता है। चारबाग रेलवे स्टेशन, मेडिकल कॉलेज, हजरतगंज, डालीगंज, तेलीबाग, निशातगंज, गोमती नगर, इंदिरा नगर, चौक, आलमबाग, कानपुर रोड- हर जगह यही हाल। दुकानदार सामान सड़क पर फैला देते हैं, ठेले वाले फुटपाथ घेर लेते हैं। जाम से समय बर्बाद होता है, लोग तनाव में रहते हैं। मरीज अस्पताल पहुंचने में लेट हो जाते हैं, बच्चे स्कूल देर से जाते हैं, ऑफिस वाले थक-हार कर पहुंचते हैं। अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है- समय की बर्बादी से उत्पादकता घटती है, और जाम में खड़े वाहन ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं।पब्लिक भी कम जिम्मेदार नहीं। जीरो ट्रैफिक सेंस की वजह से जाम और बढ़ता है। लोग जहां चाहें गाड़ी पार्क कर देते हैं, सिग्नल तोड़ते हैं। स्कूलों के बाहर अभिभावक वाहन लगा देते हैं, चौराहों पर बेतरतीब पार्किंग होती है। ई-रिक्शा और ऑटो वाले अवैध स्टैंड बना लेते हैं, सड़क किनारे कब्जा कर लेते हैं। प्रशासन की तरफ से ट्रैफिक पुलिस, नगर निगम, एलडीए और पीडब्ल्यूडी के बीच तालमेल की कमी है। सब अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाने में पीछे रहते हैं। गलत डिजाइन, धीमी रोड वाइडनिंग, स्मार्ट सिग्नल का अभाव और अतिक्रमण पर ढीली कार्रवाई ने जाम को स्थायी समस्या बना दिया है।
सरकार और प्रशासन की कोशिशें भी हो रही हैं, लेकिन असर कम। मुख्यमंत्री के निर्देश पर अवैध ई-रिक्शा और ऑटो के खिलाफ अभियान चलाया गया। पूरे प्रदेश में, लखनऊ समेत सभी जिलों में चेकिंग हुई। कई रिक्शे जब्त किए गए, चालान कटे। लेकिन अभियान खत्म होते ही हालात पुराने ढर्रे पर आ जाते हैं। हाल ही में जाम की समस्या पर बड़ा एक्शन लिया गया। तीन चौकी इंचार्जों को लाइन हाजिर किया गया, दो पर जांच बैठाई गई। एडीसीपी ट्रैफिक अशोक कुमार सिंह और एसीपी सुरेंद्र कुमार शर्मा को हटा दिया गया, नए अधिकारी राघवेंद्र सिंह और शशि प्रकाश मिश्रा को जिम्मेदारी सौंपी गई। हजरतगंज जैसे इलाकों में ई-रिक्शा पर बैन लगा है, लेकिन अमल में सख्ती की कमी है।ट्रैफिक व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए क्या किया जा सकता है? सबसे पहले अतिक्रमण हटाने का स्थायी प्लान बनाएं। नियमित अभियान चलाएं, दुकानदारों को वैकल्पिक जगह दें। ई-रिक्शा के लिए अलग स्टैंड बनाएं, रूट तय करें। स्मार्ट सिग्नल लगाएं, चौराहों पर सीसीटीवी से निगरानी करें। पब्लिक को जागरूक करें, स्कूलों में ट्रैफिक सेंस की शिक्षा दें। सड़कों को चौड़ा करें, नए फ्लाईओवर बनाएं। विभागों में समन्वय बढ़ाएं, एक कमिटी बनाएं जो रोज मॉनिटर करे। ई-रिक्शा चालकों को ट्रेनिंग दें, लाइसेंस अनिवार्य करें। अवैध रिक्शा पर सख्त कार्रवाई करें, लेकिन गरीब चालकों की रोजी-रोटी का भी ख्याल रखें। वैकल्पिक रोजगार के विकल्प दें।लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाने का सपना है, लेकिन जाम इस सपने पर पानी फेर रहा है। अगर प्रशासन, पुलिस और पब्लिक मिलकर काम करें तो ये समस्या हल हो सकती है। आंकड़े बताते हैं कि शहर में वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन अगर नियम मानें तो रफ्तार थमेगी नहीं। लोग मुस्कुराना भूल जाएंगे अगर जाम ऐसे ही रहा। समय आ गया है कि हम सब जागें, अपनी जिम्मेदारी समझें और शहर को जाम मुक्त बनाएं। ट्रैफिक नियम जीवन बचाते हैं, उन्हें बेकार मत समझिए। अगर सब कोशिश करें तो लखनऊ फिर से तहजीब और सुकून का शहर बन सकता है।
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