योगी ने बताई माता प्रसाद-संजय निषाद में दूरियों की वजह



योगी ने बताई माता प्रसाद-संजय निषाद में दूरियों की वजह

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प बहस ने तूल पकड़ लिया है। विधानसभा के भीतर हुई नोकझोंक, तीखे शब्द और उस पर मुख्यमंत्री की चुटकी ने सियासी गलियारों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय और कैबिनेट मंत्री संजय निषाद के बीच कोई पुरानी दुश्मनी है या फिर यह सब मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों की उपज है। बजट सत्र के दौरान राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के जवाब में मुख्यमंत्री की टिप्पणी के बाद यह मुद्दा अचानक चर्चा के केंद्र में आ गया।दरअसल, पूरा मामला उस समय सुर्खियों में आया जब योगी आदित्यनाथ ने सदन में हल्के-फुल्के अंदाज में यह कह दिया कि उन्हें नहीं पता कि नेता प्रतिपक्ष और मंत्री के बीच किस बात की रंजिश चल रही है, लेकिन लगता है कि संजय निषाद ने उनकी पोखरी का भी ठेका दे दिया है। यह वाक्य राजनीतिक व्यंग्य था, लेकिन इसके पीछे छिपा संकेत साफ था कि हाल के दिनों में दोनों नेताओं के बीच तल्खी बढ़ी है। इस टिप्पणी के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के भीतर इस बहस ने हवा पकड़ ली कि आखिर इस टकराव की जड़ क्या है।

अगर हालिया घटनाक्रम पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि दोनों नेताओं के बीच कोई निजी या वर्षों पुरानी दुश्मनी नहीं है। असल में यह टकराव सदन की कार्यवाही, आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे और शब्दों के चयन को लेकर उपजा है। 13 फरवरी 2026 को विधानसभा में आरक्षण पर चर्चा के दौरान माहौल अचानक गरमा गया। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने जब निषाद समाज के आरक्षण का सवाल उठाया तो उनकी भाषा पर सत्ता पक्ष ने आपत्ति जताई। मंत्री संजय निषाद ने इसे अपनी बिरादरी के लिए अपमानजनक बताते हुए कड़ा विरोध किया।इस बहस में शब्दों का चयन सबसे बड़ा विवाद बना। पांडेय ने सवाल किया कि निषाद समाज को आरक्षण क्यों नहीं मिल पाया, जबकि मंत्री बार-बार इसकी बात करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण दिलाकर इनकी बोलती बंद कर दीजिए। बात यहीं तक सीमित रहती तो शायद मामला इतना नहीं बढ़ता, लेकिन आगे कही गई कुछ पंक्तियों को सत्ता पक्ष ने जातिगत संदर्भ में लिया। संजय निषाद ने तत्काल आपत्ति जताई और उन शब्दों को कार्यवाही से हटाने की मांग की। देखते ही देखते सदन में हंगामा बढ़ गया और बहस व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में बदल गई।

यह पहला मौका नहीं था जब दोनों नेता आमने-सामने आए हों। पिछले साल भी विधानसभा में एक बहस के दौरान संजय निषाद ने समाजवादी पार्टी और उससे जुड़े नेताओं पर फूलन देवी हत्याकांड को लेकर टिप्पणी की थी। उस समय माता प्रसाद पांडेय ने इस आरोप को सदन में गलत बताते हुए कड़ा विरोध किया था। तब भी कुछ देर के लिए कार्यवाही बाधित हुई थी। इससे यह साफ होता है कि दोनों नेताओं के बीच टकराव मुद्दों को लेकर रहा है, न कि किसी निजी रंजिश के कारण।मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में केवल इसी विवाद पर चुटकी नहीं ली, बल्कि विपक्ष के समग्र रवैये पर भी सवाल उठाए। उन्होंने महर्षि वेद व्यास के श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि मां के समान कोई छाया, सहारा या रक्षक नहीं होता और ऐसी मातृशक्ति के सामने सदन में सदस्यों का आचरण मर्यादित होना चाहिए। इसके बाद ग़ालिब के शेर का हवाला देकर उन्होंने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि अक्सर लोग असली समस्या की जगह दूसरी चीजों को ठीक करने में लगे रहते हैं।इस पूरे घटनाक्रम के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। एक ओर विपक्ष इसे अपनी आवाज दबाने की कोशिश बता रहा है, तो दूसरी ओर सत्ता पक्ष का कहना है कि सदन की गरिमा बनाए रखना सबकी जिम्मेदारी है। आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर शब्दों की सावधानी और सामाजिक संतुलन का सवाल हमेशा से राजनीति में अहम रहा है। यही वजह है कि इस बहस को केवल दो नेताओं के बीच की नोकझोंक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव आने वाले समय में और भी रंग दिखा सकता है। निषाद समाज का सवाल पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति में खास महत्व रखता है और समाजवादी पार्टी इसे अपने सामाजिक न्याय के एजेंडे से जोड़कर देखती रही है। वहीं, सरकार का दावा है कि उसने सभी वर्गों के हित में काम किया है और विपक्ष बेवजह मुद्दों को तूल दे रहा है। इस खींचतान में सदन का माहौल बार-बार गर्म हो रहा है।महत्वपूर्ण यह भी है कि इस पूरे विवाद में किसी भी नेता ने व्यक्तिगत स्तर पर दुश्मनी की बात स्वीकार नहीं की है। बयानबाजी का दायरा सदन की कार्यवाही और राजनीतिक मुद्दों तक ही सीमित रखा गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि यह टकराव रणनीतिक ज्यादा है, भावनात्मक कम। राजनीति में ऐसे टकराव अक्सर जनाधार को साधने और अपने-अपने समर्थकों को संदेश देने के लिए भी किए जाते हैं।कुल मिलाकर, यूपी विधानसभा में हुआ यह प्रकरण किसी पुरानी रंजिश की कहानी नहीं कहता, बल्कि यह दिखाता है कि कैसे आरक्षण, सामाजिक सम्मान और भाषा की मर्यादा जैसे मुद्दे राजनीति में अचानक बड़ा विवाद बन जाते हैं। मुख्यमंत्री की चुटकी ने भले ही माहौल को हल्का किया हो, लेकिन इसके बाद शुरू हुई चर्चा ने यह साफ कर दिया कि आने वाले दिनों में विधानसभा के भीतर बहस और तेज हो सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह टकराव आगे चलकर सुलह में बदलता है या फिर सियासी रणनीति का हिस्सा बनकर और गहराता है।


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