ओबीसी आयोग के कारण अटके पंचायत चुनाव, तय समय पर मतदान पर गहराता संशय

ओबीसी आयोग के कारण अटके पंचायत चुनाव, तय समय पर मतदान पर गहराता संशय

ओबीसी आयोग के कारण अटके पंचायत चुनाव, तय समय पर मतदान पर गहराता संशय


उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव 2026 को लेकर जो असमंजस पिछले कुछ महीनों से चल रहा था, वह अब लगभग साफ तस्वीर में बदलता दिख रहा है। गांव-देहात में जहां संभावित प्रत्याशी तैयारियों में जुटे थे, वहीं अब उनकी बातचीत का केंद्र चुनाव प्रचार नहीं, बल्कि यह सवाल बन गया है कि चुनाव होंगे भी या नहीं। हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में राज्य सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे के बाद यह माना जा रहा है कि अप्रैल–मई में प्रस्तावित पंचायत चुनाव तय समय पर होना मुश्किल है। इसकी वजह है ओबीसी आरक्षण और समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन, जो अब चुनावी प्रक्रिया की पहली शर्त बन चुका है।पूरा मामला तब तूल पकड़ गया जब यह सवाल उठाया गया कि मौजूदा पिछड़ा वर्ग आयोग को क्या पंचायत चुनावों के लिए आरक्षण तय करने का अधिकार है या नहीं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि वर्तमान आयोग का कार्यकाल मूल रूप से अक्टूबर 2025 में समाप्त हो चुका था और भले ही सरकार ने इसे अक्टूबर 2026 तक बढ़ा दिया हो, लेकिन वह कानूनी रूप से समर्पित आयोग नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण तभी लागू हो सकता है, जब ‘ट्रिपल टेस्ट’ की प्रक्रिया पूरी हो। इसमें सबसे अहम शर्त है समर्पित आयोग का गठन और उसके जरिए कराया गया समकालीन सर्वे।

हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में सुनवाई के दौरान सरकार ने अपना रुख स्पष्ट किया। जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की पीठ के सामने सरकार ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप नया समर्पित ओबीसी आयोग गठित करेगी। यह आयोग तीन साल के कार्यकाल के साथ बनाया जाएगा और प्रदेश भर में ओबीसी आबादी की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का रैपिड सर्वे करेगा। इसी सर्वे के आधार पर पंचायतों में ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत और सीटों का निर्धारण होगा।यहीं से पंचायत चुनाव की टाइमलाइन उलझ जाती है। नया आयोग बनाने के लिए पहले अधिसूचना जारी होगी, फिर सदस्यों की नियुक्ति होगी। इसके बाद सर्वे का काम शुरू होगा, जिसमें हर जिले, ब्लॉक और पंचायत स्तर पर आंकड़े जुटाए जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम पांच से सात महीने का समय लग सकता है। सर्वे पूरा होने के बाद आयोग अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा, फिर सरकार आरक्षण को लेकर अधिसूचना जारी करेगी। इसके बाद ही राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव कार्यक्रम घोषित कर पाएगा।

आंकड़ों पर नजर डालें तो पंचायत चुनाव उत्तर प्रदेश में किसी छोटे स्तर का आयोजन नहीं है। प्रदेश में लगभग 57,691 ग्राम प्रधान और पंचायत सदस्य, 826 ब्लॉक प्रमुख, करीब 3,200 जिला पंचायत सदस्य और 75 जिला पंचायत अध्यक्ष चुने जाते हैं। यह पूरा ढांचा ग्रामीण राजनीति की दिशा तय करता है। यही कारण है कि पंचायत चुनावों को 2027 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जाता है। राजनीतिक दल पंचायत चुनाव के नतीजों से यह आंकलन करते हैं कि उनकी जमीनी पकड़ कितनी मजबूत है और किन इलाकों में सुधार की जरूरत है।पिछली बार 2021 में हुए पंचायत चुनाव इसके उदाहरण रहे हैं। तब जिला पंचायत सदस्य सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों का दबदबा देखने को मिला था। कुल 3,050 जिला पंचायत सदस्य सीटों में से 944 पर निर्दलीयों ने जीत दर्ज की थी। इसके अलावा भाजपा के 768, सपा के 759, बसपा के 319, कांग्रेस के 125, रालोद के 69 और आम आदमी पार्टी के 64 सदस्य चुने गए थे। बाद में सियासी जोड़-तोड़ के जरिए भाजपा ने 75 में से 67 जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी अपने नाम कर ली थी। ब्लॉक प्रमुखों के चुनाव में भी इसी तरह का समीकरण देखने को मिला था।

इसी अनुभव के चलते इस बार पंचायत चुनाव को लेकर सियासी दल बेहद सतर्क हैं। चर्चा है कि सत्ताधारी दल नहीं चाहता कि पंचायत चुनाव के दौरान टिकट और समर्थन को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच टकराव हो, जिसका असर सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव पर पड़े। पंचायत चुनाव भले ही आधिकारिक तौर पर दलगत आधार पर न लड़े जाएं, लेकिन गांव स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण पूरी तरह सक्रिय रहता है। एक गुट को समर्थन देने पर दूसरा गुट नाराज हो सकता है और यही नाराजगी बड़े चुनाव में नुकसान का कारण बन सकती है।इस बीच प्रशासनिक स्तर पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्यों का कार्यकाल मई 2026 के पहले सप्ताह में समाप्त हो रहा है। वहीं ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल जुलाई 2026 के पहले सप्ताह तक है। अगर तब तक चुनाव नहीं कराए गए तो सरकार के पास प्रशासक या रिसीवर नियुक्त करने का विकल्प रहेगा, जो नए चुनाव तक जिम्मेदारी संभालेंगे। हालांकि यह व्यवस्था अस्थायी होगी, लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से इसे आदर्श स्थिति नहीं माना जाता।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पंचायत चुनाव अब पूरी तरह समर्पित ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पर निर्भर हो गए हैं। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश हैं, दूसरी तरफ हाई कोर्ट की निगरानी और तीसरी तरफ 2027 का सियासी गणित। इन तीनों के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए आसान नहीं है। फिलहाल संकेत यही हैं कि पहले आरक्षण का कानूनी ढांचा मजबूत किया जाएगा, उसके बाद ही चुनाव की तारीखों पर फैसला होगा।गांवों में बैठे मतदाता भी इस स्थिति को समझ रहे हैं। चर्चा है कि अगर चुनाव देर से होते हैं तो इसका असर स्थानीय विकास योजनाओं और प्रशासनिक फैसलों पर पड़ेगा। पंचायत प्रतिनिधि न होने की स्थिति में फैसले अफसरों के हाथ में चले जाएंगे, जिससे जनभागीदारी कमजोर हो सकती है। यही वजह है कि पंचायत चुनाव की तारीख को लेकर बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है।कुल मिलाकर तस्वीर यही बनती है कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव 2026 अब तय समय पर होना कठिन है। ओबीसी आरक्षण, समर्पित आयोग और कानूनी प्रक्रियाओं के बीच चुनाव की घड़ी आगे खिसकती नजर आ रही है। आने वाले कुछ महीनों में आयोग के गठन और सर्वे की रफ्तार ही तय करेगी कि लोकतंत्र की यह अहम प्रक्रिया कब जमीन पर उतर पाएगी।

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