दहेज की आग में भस्म होती बेटियां और मानसिक सेहत से मुंह चुराता हमारा पाखंडी समाज
भारत की आधी आबादी चांद-सितारों को छूकर अब सूरज को मापने निकल पड़ी है, लेकिन हमारे समाज का स्याह सच यह है कि आज भी देश के किसी न किसी बंद कमरे में कोई न कोई बेटी चुपचाप सिसक रही है। वह अपने आंसुओं को इस खौफ में छुपाए बैठी है कि कहीं उसकी सिसकी बाहर आई तो मायके और ससुराल के बीच कोई कलह न खड़ी हो जाए, या फिर उसकी खुद की सांसों का सफर हमेशा के लिए थम न जाए। हाल ही में नोएडा की दीपिका नागर की संदिग्ध मौत और भोपाल में ट्विशा शर्मा की दुखद अंत की खबरों ने एक बार फिर पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। यह घटनाएं सिर्फ दो युक्तियों की मौत का मामला नहीं हैं, बल्कि यह हमारे उस आधुनिक होने के दावों पर एक करारा तमाचा हैं, जिसकी बुनियाद भीतर से बेहद खोखली और भयावह हो चुकी है। हम एक तरफ तो स्त्री सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और दूसरी तरफ शादियों के बाजार में लड़कों की नौकरी, सैलरी, सरकारी पद या विदेश में रहने के तमगे के आधार पर उनका ‘रेट कार्ड’ तय करते हैं। डॉक्टर, इंजीनियर और अफसर जैसे पढ़े-लिखे तबके की शादियों में होने वाली बड़ी-बड़ी डील्स यह साबित करती हैं कि हमारा तथाकथित सभ्य समाज भीतर से कितना दोगला है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े इस खौफनाक मंजर की गवाही देते हैं, जहां हर दिन औसतन सत्रह से अठारह महिलाएं दहेज की बलिवेदी पर चढ़ा दी जाती हैं। महानगरों की बात करें तो दिल्ली लगातार दहेज हत्याओं के मामलों में सबसे ऊपर बनी हुई है, तो वहीं बेंगलुरु जैसे हाई-टेक और आधुनिक शहर से दहेज प्रताड़ना के सबसे ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में तो यह आंकड़ा और भी ज्यादा डरावना है।
लेकिन इन मौतों के पीछे सिर्फ भौतिक सामान, गाड़ी या नकदी की भूख ही इकलौती वजह नहीं होती। अगर हम भोपाल की ट्विशा शर्मा के मामले की परतों को बिना किसी पूर्वाग्रह के बेहद तार्किक ढंग से खोलकर देखें, तो कहानी का एक दूसरा और बेहद पेचीदा पहलू भी सामने आता है। ट्विशा कोई दबी-कुचली या अनपढ़ लड़की नहीं थी; वह एक एमबीए ग्रेजुएट, मॉडल, पूर्व मिस पुणे और फिल्मों में काम कर चुकी एक बेहद मजबूत पहचान वाली आधुनिक महिला थी। उसने डेटिंग ऐप के जरिए अपनी पसंद से शादी की थी, लेकिन शादी के कुछ ही समय बाद उसे और उसके पति को कपल काउंसलिंग के लिए मनोचिकित्सक के पास जाना पड़ा। यहां आकर मामला सिर्फ एकतरफा दहेज उत्पीड़न का नहीं रह जाता, बल्कि यह आधुनिक परिवारों के भीतर टूटते मानसिक संतुलन और एक गहरे मनोवैज्ञानिक संकट की तरफ इशारा करता है। हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम आज भी मानसिक स्वास्थ्य को एक सामान्य बीमारी की तरह स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। जब कोई बहू या बेटी मानसिक अवसाद, तनाव या किसी तरह के साइकोसिस से जूझ रही होती है, तो ससुराल वाले अक्सर उसकी इस लाचारी को उसका ‘अहंकार’, नखरा या खराब स्वभाव मान बैठते हैं। भारतीय परिवारों में आज भी बहुओं से एक अवास्तविक किस्म के ‘परफेक्शन’ की उम्मीद की जाती है। हमें कभी यह सिखाया ही नहीं गया कि अगर घर का कोई सदस्य मानसिक रूप से अस्वस्थ है, तो उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। नतीजा यह होता है कि मानसिक रूप से परेशान इंसान को हमारे समाज में या तो ढोंगी कह दिया जाता है या फिर उसे ‘पागल’ और ‘साइको’ जैसे कड़े शब्दों के खांचे में डाल दिया जाता है। ऐसे में मरीज के साथ-साथ उसकी देखभाल करने वाले यानी केयर-गिवर का तनाव भी चरम पर पहुंच जाता है, जिससे रिश्तों की कड़वाहट उस मोड़ पर आ खड़ी होती है जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचता।
सोशल मीडिया के इस डिजिटल दौर में हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह हो गई है कि हम बिना किसी मामले की तह में जाए, तुरंत ‘जज का हथौड़ा’ उठा लेते हैं। रील्स और ट्वीट्स के भावुक बैकग्राउंड म्यूजिक के बहाने फटाफट फैसले सुनाने की हमारी कबीलाई आदत ने असल समस्याओं को और धुंधला कर दिया है। आत्महत्या के हर मामले में बेशक कोई न कोई कातिल जरूर होता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह कातिल हमेशा हाड़-मांस का कोई इंसान या ससुराल पक्ष ही हो। कभी-कभी वह असली कातिल हमारे आसपास की घूरती कातर आंखें, कमियां गिनाते लोग, समाज के ताने, अकेलापन और हमारा यह पूरा खोखला सिस्टम होता है, जो किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से बीमार तो मान सकता है, लेकिन मानसिक बीमारी के नाम पर मुंह फेर लेता है। इस पूरे चक्रव्यूह का परमानेंट इलाज किसी अदालती फैसले या सोशल मीडिया के एकतरफा न्याय में नहीं छिपा है, बल्कि इसके लिए हमें अपनी सामाजिक सोच की री-इंजीनियरिंग करनी होगी। एक पिता अपनी बेटी की शादी के लिए अपनी जिंदगी भर की कमाई, जमीन और मकान तक दांव पर लगा देता है, सिर्फ इसलिए कि समाज में उसकी नाक बची रहे। इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए केवल कड़े कानून काफी नहीं हैं, क्योंकि साठ साल से कानून होने के बावजूद हालात जस के तस हैं। जब तक समाज खुद इस बुराई को सामान्य मानना बंद नहीं करेगा और शादियों को सिर्फ दो परिवारों का वित्तीय मेलजोल समझने के बजाय दो इंसानों के मानसिक और भावनात्मक तालमेल का मंच नहीं बनाएगा, तब तक यह खामोश चीखें बंद नहीं होंगी। हमें अपने घरों में ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर को छोड़कर मानसिक सेहत पर खुलकर बात करनी होगी, ताकि हमारी बेटियों के खूबसूरत सपनों को किसी अदृश्य कातिल का शिकार न होना पड़े।
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