एनकाउंटर- मुठभेड़ों से बदलती यूपी की राजनीति


 एनकाउंटर- मुठभेड़ों से बदलती यूपी की राजनीति

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार   



उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ महीने दूर हों, लेकिन सियासी लड़ाई का मैदान तैयार हो चुका है। भाजपा ने एक बार फिर वही मुद्दा सबसे आगे ला दिया है जिसने पिछले दो चुनावों में उसे निर्णायक बढ़त दिलाई थी कानून व्यवस्था। योगी आदित्यनाथ सरकार के नौ साल पूरे होने से पहले सामने आए पुलिस एनकाउंटर के आंकड़े सिर्फ प्रशासनिक रिपोर्ट नहीं हैं, बल्कि आने वाले चुनाव की राजनीतिक पटकथा भी माने जा रहे हैं। मार्च 2017 से मई 2026 तक प्रदेश में 17,043 पुलिस मुठभेड़ें हुईं। यानी हर दिन औसतन पांच से ज्यादा एनकाउंटर। इन कार्रवाइयों में 289 अपराधियों के मारे जाने, 11,834 के घायल होने और 34,253 की गिरफ्तारी का दावा किया गया। वहीं 18 पुलिसकर्मियों की मौत और 1,852 जवानों के घायल होने की बात भी कही गई। इन आंकड़ों ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश मॉडल की बहस को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। 2017 से पहले उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था का जिक्र होते ही लोगों के सामने अपराध, माफिया, गैंगवार और रंगदारी की तस्वीर उभरती थी। पश्चिमी यूपी में व्यापारियों के पलायन की खबरें आती थीं। पूर्वांचल में बाहुबली नेताओं का प्रभाव पुलिस और प्रशासन पर भारी माना जाता था। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर लगातार सवाल उठते थे। यही वह दौर था जब भाजपा ने “भयमुक्त उत्तर प्रदेश” का नारा दिया। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने तो शुरुआती दिनों से ही यह साफ कर दिया गया कि सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

योगी सरकार के पहले कुछ महीनों में ही पुलिस मुठभेड़ों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। अपराधियों की गिरफ्तारी के दौरान गोली लगने की घटनाएं आम होने लगीं। धीरे-धीरे “पैर में गोली” उत्तर प्रदेश पुलिस मॉडल की पहचान बन गया। लगभग हर मुठभेड़ में पुलिस की कहानी एक जैसी दिखाई दी अपराधी भागने की कोशिश कर रहे थे, उन्होंने पुलिस पर फायरिंग की और जवाबी कार्रवाई में घायल हो गए। विपक्ष ने इसे सवालों के घेरे में रखा, लेकिन भाजपा ने इसे अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति बताया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा 4,813 एनकाउंटर मेरठ जोन में हुए। यहां 97 अपराधियों के मारे जाने का दावा किया गया। 3,513 अपराधी घायल हुए और 8,921 गिरफ्तारियां हुईं। यह वही इलाका है जो कभी कुख्यात गैंग और सांप्रदायिक तनाव के लिए चर्चा में रहता था। वाराणसी जोन में 1,292 मुठभेड़ों में 29 अपराधियों के मारे जाने की बात कही गई। आगरा जोन में 2,494 मुठभेड़ों में 24 अपराधी मारे गए। बरेली जोन में 21, लखनऊ जोन में 20 और गाजियाबाद कमिश्नरेट में 18 अपराधियों की मौत हुई। दिलचस्प यह है कि गाजियाबाद कमिश्नरेट सभी कमिश्नरेट में सबसे ऊपर रहा। यह आंकड़े भाजपा के लिए सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड नहीं बल्कि चुनावी प्रचार का हिस्सा हैं।

इन कार्रवाइयों ने योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक छवि को पूरी तरह बदल दिया। वह सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं रहे, बल्कि “सख्त प्रशासक” के तौर पर स्थापित हुए। भाजपा ने इस छवि को बेहद आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया। मंचों से योगी का यह कहना कि “अपराधी या तो सुधर जाएं या प्रदेश छोड़ दें” समर्थकों के बीच लोकप्रिय नारा बन गया। विकास दुबे एनकाउंटर ने इस छवि को और मजबूत किया। कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद विकास दुबे का एनकाउंटर राष्ट्रीय बहस का विषय बना, लेकिन भाजपा समर्थकों के बीच इसे न्याय की कार्रवाई की तरह पेश किया गया। यहीं से बुलडोजर राजनीति की शुरुआत भी हुई। अपराधियों और माफियाओं की संपत्तियों पर बुलडोजर चलाने की तस्वीरें सोशल मीडिया से लेकर गांवों तक चर्चा का विषय बन गईं। सरकार ने इसे अवैध संपत्तियों के खिलाफ कार्रवाई बताया, जबकि विपक्ष ने इसे कानून और संविधान के खिलाफ कदम करार दिया। लेकिन राजनीतिक रूप से भाजपा को इसका फायदा मिला। महिलाओं, व्यापारियों और शहरी मध्यवर्ग में यह संदेश गया कि सरकार अपराधियों के खिलाफ बिना दबाव कार्रवाई कर रही है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार इन एनकाउंटर और बुलडोजर कार्रवाइयों पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने कई बार आरोप लगाया कि सरकार पुलिस का इस्तेमाल राजनीतिक बदले के लिए कर रही है। फर्जी एनकाउंटर और चुनिंदा कार्रवाई के आरोप भी लगे। लेकिन भाजपा ने हर आलोचना को “अपराधियों के समर्थन” से जोड़ दिया। यही वजह है कि विपक्ष का हमला कई बार उसी पर भारी पड़ता दिखाई दिया। भाजपा लगातार यह याद दिलाती रही कि पिछली सरकारों में माफियाओं को संरक्षण मिलता था और योगी सरकार ने उसी व्यवस्था को खत्म किया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जनवरी 2026 में एक टिप्पणी करते हुए कहा था कि प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ें अब सामान्य घटना बन चुकी हैं। अदालत ने कहा कि छोटे मामलों में भी पुलिस गोलीबारी को एनकाउंटर का रूप दे रही है। यह टिप्पणी महत्वपूर्ण थी क्योंकि पहली बार न्यायपालिका की तरफ से इस मॉडल पर गंभीर सवाल उठे। मानवाधिकार संगठनों ने भी कई बार कहा कि पुलिस कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया की जगह नहीं ले सकती। लेकिन इन आलोचनाओं का राजनीतिक असर सीमित दिखाई दिया। 2022 विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा। समाजवादी पार्टी ने जातीय समीकरणों के जरिए भाजपा को चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन भाजपा ने कानून व्यवस्था को चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बना दिया। महिलाओं के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि योगी सरकार में सुरक्षा बेहतर हुई है। छोटे व्यापारी और शहरी मध्यवर्ग भी इसी नैरेटिव के साथ खड़ा दिखाई दिया। भाजपा ने “सुरक्षा बनाम अराजकता” की बहस को इस तरह स्थापित किया कि विपक्ष रक्षात्मक हो गया।अब 2027 चुनाव से पहले फिर वही रणनीति दिखाई दे रही है। भाजपा जानती है कि बेरोजगारी, महंगाई और किसानों के मुद्दों पर विपक्ष हमला करेगा। ऐसे में पार्टी कानून व्यवस्था को सबसे आगे रखकर चुनावी मैदान में उतरना चाहती है। हाल के महीनों में बच्चों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों में त्वरित पुलिस कार्रवाई को प्रमुखता से प्रचारित किया गया। हरदोई और गाजियाबाद जैसे मामलों में आरोपी एनकाउंटर में घायल हुए और सरकार ने उसे अपनी जीरो टॉलरेंस नीति की सफलता बताया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है। क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में एनकाउंटर आधारित मॉडल लंबे समय तक स्वीकार्य रह सकता है? क्या पुलिस की गोली न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प बन सकती है? क्या अपराध के खिलाफ सख्ती और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बना रह पाएगा? इन सवालों पर बहस आगे भी जारी रहेगी। लेकिन फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में तस्वीर साफ है योगी आदित्यनाथ ने कानून व्यवस्था को सिर्फ शासन का मुद्दा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे भाजपा की सबसे ताकतवर राजनीतिक पहचान में बदल दिया है।


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