न्याय की चौखट पर तड़पती बेटियां और दहेज कानून की असफल होती सरकारी व्यवस्था

 

न्याय की चौखट पर तड़पती बेटियां और दहेज कानून की असफल होती सरकारी व्यवस्था

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

भोपाल की ट्विशा शर्मा मौत मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया है। एक तरफ बेटी को खो चुके माता-पिता हैं, जिनकी आवाज में दर्द, गुस्सा और सिस्टम के प्रति अविश्वास साफ दिखाई देता है, तो दूसरी तरफ वही पुराना सवाल है कि आखिर दहेज विरोधी कानून होने के बावजूद देश में बेटियां क्यों मर रही हैं। क्यों हर साल हजारों परिवार अदालतों, पुलिस थानों और पोस्टमार्टम हाउसों के बाहर न्याय की भीख मांगते नजर आते हैं। ट्विशा शर्मा के पिता नवनीधि शर्मा और मां रेखा शर्मा की प्रेस कॉन्फ्रेंस सिर्फ भावनात्मक बयान नहीं थी, बल्कि उस टूटते भरोसे का सार्वजनिक विस्फोट थी जो आम लोग न्याय व्यवस्था से लगाए बैठे हैं।परिवार का आरोप है कि प्रभावशाली लोगों के दबाव में जांच प्रभावित हो रही है। उनका कहना है कि उनकी बेटी के चरित्र पर सवाल उठाकर पूरे मामले को भटकाने की कोशिश की जा रही है। माता-पिता बार-बार यह कह रहे हैं कि उनका फोकस सिर्फ निष्पक्ष जांच और न्याय पर है, लेकिन जिस तरह मामले में पीड़िता की निजी जिंदगी को सार्वजनिक बहस बनाया जा रहा है, उससे उनका दर्द और बढ़ गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्विशा के पिता का टूटना और मीडिया से यह कहना कि “हमें भी मार डालिए जैसे हमारी बेटी को मार डाला”, सिर्फ एक पिता की चीख नहीं थी, बल्कि उस समाज के चेहरे पर तमाचा था जहां मृत बेटी को भी शांति नहीं मिलती।

देश में दहेज निषेध कानून 1961 से लागू है। भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए और 304बी महिलाओं को दहेज उत्पीड़न और दहेज हत्या से सुरक्षा देने के लिए बनाई गई थीं। अदालतें भी समय-समय पर सख्त टिप्पणियां करती रही हैं, लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदले। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल छह हजार से अधिक महिलाएं दहेज हत्या का शिकार होती हैं। यानी औसतन हर डेढ़ घंटे में एक महिला दहेज की वजह से अपनी जान गंवा देती है। सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों से सामने आते हैं। यह आंकड़े सिर्फ अपराध नहीं बताते, बल्कि समाज की सोच की भयावह तस्वीर भी सामने रखते हैं।ट्विशा शर्मा मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि इसमें सिर्फ मौत की जांच नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं। परिवार का आरोप है कि पोस्टमार्टम प्रक्रिया में देरी हुई। दूसरा पोस्टमार्टम कराने के लिए उन्हें कानूनी प्रक्रिया में धकेला गया। शव कई दिनों तक पड़ा रहा और परिवार लगातार गुहार लगाता रहा। सवाल यह है कि किसी भी नागरिक का यह मूल अधिकार क्यों बन जाता है कि वह अपनी बेटी के शव का सम्मानजनक पोस्टमार्टम करवाने के लिए भी संघर्ष करे। अगर एक परिवार को न्यायिक अनुमति लेने में दिनों तक भटकना पड़े तो यह व्यवस्था की असंवेदनशीलता नहीं तो और क्या है।

इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक बात वह माहौल है जिसमें पीड़िता की मौत के बाद उसका चरित्र बहस का विषय बना दिया जाता है। जैसे ही किसी महिला की संदिग्ध मौत होती है, उसके निजी संबंध, मानसिक स्थिति, सोशल मीडिया गतिविधियां और निजी जीवन सार्वजनिक मंचों पर उछाले जाने लगते हैं। यह सिर्फ एक महिला की मौत नहीं होती, बल्कि उसके सम्मान की दूसरी हत्या भी होती है। अदालत में दोनों पक्ष अपने तर्क रखेंगे, लेकिन समाज और मीडिया का यह दायित्व है कि वह किसी मृत महिला को कटघरे में खड़ा करने से पहले संवेदनशीलता दिखाए।दहेज की समस्या सिर्फ गरीब या अशिक्षित परिवारों तक सीमित नहीं रही। पढ़े-लिखे और संपन्न परिवारों में भी यह मानसिकता गहराई से मौजूद है। आधुनिकता के नाम पर दहेज का स्वरूप बदल गया है। अब इसे सीधे दहेज नहीं कहा जाता, बल्कि “गिफ्ट”, “सेटअप”, “सहयोग” और “स्टेटस” जैसे शब्दों में छिपा दिया जाता है। करोड़ों रुपये की शादियां सोशल मीडिया प्रदर्शन बन चुकी हैं। शादी अब दो लोगों का संबंध कम और आर्थिक ताकत दिखाने का मंच ज्यादा बनती जा रही है। यही कारण है कि दहेज कानून होने के बावजूद दहेज मांगने वालों को सामाजिक शर्मिंदगी महसूस नहीं होती।सरकारों की सबसे बड़ी विफलता यही है कि उन्होंने दहेज विरोधी कानून को केवल कागजों तक सीमित रहने दिया। जागरूकता अभियान, पोस्टर और शपथ कार्यक्रमों से समस्या खत्म नहीं होने वाली। अब कठोर और ठोस कदम उठाने की जरूरत है। हर जिले में दहेज उत्पीड़न मामलों के लिए विशेष जांच इकाई बनाई जानी चाहिए। पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक प्रक्रिया को पूरी तरह समयबद्ध और डिजिटल निगरानी में लाया जाना चाहिए। जिन मामलों में प्रभावशाली लोगों पर आरोप हों, वहां स्वतः विशेष निगरानी समिति बनाई जानी चाहिए ताकि जांच पर किसी तरह का दबाव न पड़े।

इसके साथ ही शादी में होने वाले बड़े आर्थिक लेन-देन की पारदर्शी व्यवस्था भी जरूरी है। विवाह पंजीकरण के समय उपहार और लेन-देन का स्पष्ट रिकॉर्ड अनिवार्य होना चाहिए। पंचायत और वार्ड स्तर पर दहेज विरोधी सामाजिक समितियां बनाई जानी चाहिए। स्कूल और कॉलेज स्तर पर भी दहेज विरोधी शिक्षा को गंभीरता से लागू करना होगा, क्योंकि यह सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक बीमारी है।ट्विशा शर्मा मामला अभी अदालत और जांच एजेंसियों के दायरे में है। अंतिम सच अदालत ही तय करेगी, लेकिन इस घटना ने देश को एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर बेटियों को न्याय मिलने में इतनी देरी क्यों होती है। क्यों हर बार पीड़ित परिवार को ही सफाई देनी पड़ती है। क्यों प्रभावशाली लोगों के सामने व्यवस्था कमजोर पड़ती दिखाई देती है। और सबसे बड़ा सवाल यह कि आखिर कानून होने के बावजूद दहेज के नाम पर बेटियां मरना कब बंद करेंगी।अगर सरकारें अब भी नहीं चेतीं तो दहेज विरोधी कानून सिर्फ किताबों में बचेंगे और अदालतों के बाहर माता-पिता इसी तरह अपनी बेटियों के लिए न्याय मांगते रहेंगे। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊंची इमारतों या बड़ी अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वहां बेटियां कितनी सुरक्षित हैं और उन्हें न्याय कितनी जल्दी मिलता है।


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