बंगाल में मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में कमल का खिलना

 

बंगाल में मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में कमल का खिलना 

पश्चिम बंगाल की सियासत इस समय एक ऐसे अप्रत्याशित और ऐतिहासिक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है, जिसकी कल्पना खुद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बड़े-बड़े रणनीतिकारों ने कभी बंद कमरों की बैठकों में भी नहीं की होगी। हालिया विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त झेलने के बाद ममता बनर्जी का पूरा सियासी साम्राज्य जिस तरह ताश के पत्तों की तरह बिखरता नजर आ रहा है, उसने सूबे की राजनीति के सारे पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। एक तरफ जहां पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी फेसबुक लाइव के जरिए नई सरकार की ‘बुलडोजर राजनीति’ और प्रशासनिक नियमों को लेकर लगातार जनता के बीच अपनी बात रख रही हैं, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि उनका सबसे खास और पारंपरिक माना जाने वाला मुस्लिम वोट बैंक अब इस तरह की बयानबाजी से पूरी तरह तंग आ चुका है। टीएमसी के भीतर आंतरिक कलह और असंतोष का लावा इस कदर फूट रहा है कि पार्टी के आधे से ज्यादा विधायक और सैकड़ों जमीनी पार्षद दीदी का साथ छोड़ रहे हैं। विशेषकर डायमंड हार्बर जैसे हाई-प्रोफाइल इलाके के ठीक बगल में स्थित फाल्टा विधानसभा के उपचुनाव नतीजों ने टीएमसी को सांगठनिक रूप से आखिरी सांसें गिनने पर मजबूर कर दिया है और यह संदेश दे दिया है कि बंगाल की खाड़ी से उठने वाली सियासी लहर अब पूरी तरह बदल चुकी है।

सत्ता गंवाने के बाद पहली बार ममता बनर्जी ने सीधे जनता से जुड़ने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया, जहां उनका पुराना चुनावी दर्द और छटपटाहट साफ तौर पर छलकती हुई दिखाई दी। उन्होंने चुनाव में बड़े पैमाने पर संस्थागत धांधली का आरोप लगाते हुए दावा किया कि करीब एक करोड़ मतदाताओं के नाम जानबूझकर वोटर लिस्ट से साफ कर दिए गए, लेकिन जनता अब इन दलीलों को हार का बहाना मान रही है। कोलकाता और साल्ट लेक के आसपास चल रहे अतिक्रमण विरोधी अभियानों और पार्टी दफ्तरों को तोड़े जाने को ममता भले ही निजी प्रतिशोध की राजनीति करार दे रही हों, लेकिन उनकी अपनी पार्टी का अंदरूनी ढांचा पूरी तरह हिल चुका है। विधानसभा परिसर में जब टीएमसी ने इस कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन आयोजित किया, तो पार्टी के 80 विधायकों में से महज 36 विधायक ही वहां पहुंचे। आधे से अधिक विधायकों का इस तरह विरोध प्रदर्शन से नदारद रहना यह साफ दिखाता है कि नेताओं का मनोबल जमीनी स्तर पर टूट चुका है और उन्हें अब ममता के नाम पर अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा है। कालीघाट की रणनीतिक बैठक से भी भारी संख्या में विधायकों का गायब होना और स्थानीय नगर पालिकाओं जैसे कंचरापारा और हालिशहर में पार्षदों का सामूहिक इस्तीफा इस बात का गवाह है कि टीएमसी का जमीनी कैडर अब नए राजनीतिक ठिकाने की तलाश में है।

इस पूरे सियासी परिदृश्य में दक्षिण 24 परगना के फाल्टा विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव नतीजों ने देश के तमाम राजनीतिक पंडितों को हक्का-बक्का कर दिया है। फाल्टा में इस बार रिकॉर्ड 87 फीसदी वोटिंग दर्ज की गई, जिसने यह साफ कर दिया कि जनता बदलाव के लिए पूरी तैयारी के साथ पोलिंग बूथ तक पहुंची थी। इस चुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार देवांग्शु पांडा को अकेले 71.2 फीसदी यानी 1,49,666 वोट मिल गए, जो अपने आप में एक अविश्वसनीय रिकॉर्ड है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस निर्वाचन क्षेत्र में हिंदू आबादी करीब 62 से 65 फीसदी के आसपास है। अगर गणित के सामान्य नियम से भी देखें और यह मान लें कि शत-प्रतिशत हिंदुओं ने बीजेपी को वोट दिया, जो कि व्यावहारिक रूप से कभी नहीं होता, तब भी बीजेपी का आंकड़ा 65 फीसदी पर रुक जाना चाहिए था। लेकिन बीजेपी को मिले 71 फीसदी से ज्यादा वोट यह साबित करते हैं कि स्थानीय मुस्लिम मतदाताओं के एक बहुत बड़े हिस्से ने भी चुपके से ‘कमल’ का बटन दबाया है और बंगाल की राजनीति में उस 'साइलेंट शिफ्ट' की शुरुआत कर दी है, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी।

इस चुनाव का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट यह रहा कि टीएमसी के आधिकारिक उम्मीदवार जहांगीर खान ऐन वक्त पर तकनीकी या राजनीतिक कारणों से चुनावी रेस से बाहर हो गए। डायमंड हार्बर जैसी हाई-प्रोफाइल लोकसभा सीट, जिसे अभिषेक बनर्जी का अभेद्य किला माना जाता है, उसके ठीक बगल की विधानसभा सीट पर सत्ताधारी दल का इस तरह वॉकओवर दे देना कार्यकर्ताओं को हजम नहीं हुआ। हालांकि मतपत्रों पर नाम होने के कारण उन्हें महज 3.7 फीसदी वोट मिले, जिनमें से बड़ा हिस्सा पोस्टल बैलट का था, लेकिन मुख्य चेहरे के मैदान से गायब होने से टीएमसी का कोर वोटर, विशेषकर मुस्लिम आबादी और सरकारी योजनाओं के लाभार्थी पूरी तरह असमंजस में आ गए। डेमोग्राफिक विश्लेषण के मुताबिक, फाल्टा सीट पर मुस्लिम मतदाता लगभग 34 से 36 फीसदी के बीच हैं और हासिमनगर, गोपालपुर, फतेहपुर और भदुरा जैसे इलाके पूरी तरह मुस्लिम बहुल माने जाते हैं, जहां कभी सिर्फ दीदी का सिक्का चलता था। लेकिन जब टीएमसी का मुख्य चेहरा ही मैदान में सक्रिय नहीं दिखा, तो मुस्लिम वोटर्स ने अपना वोट खराब करने के बजाय स्थानीय विकास, रोजगार और केंद्रीय योजनाओं के जमीनी प्रभाव को देखते हुए पहली बार बीजेपी का रुख किया।

इस चुनाव ने पश्चिम बंगाल की उस पुरानी राजनीतिक धारणा को पूरी तरह तोड़ दिया है कि मुस्लिम समुदाय कभी भी किसी भी परिस्थिति में बीजेपी को वोट नहीं देता। ग्राउंड रिपोर्ट इशारा करती है कि मुस्लिम बहुल पॉकेट्स के युवाओं ने रोजगार और विकास के नाम पर भगवा खेमे को चुना। अगर मुस्लिम आबादी ने एकमुश्त लेफ्ट या कांग्रेस को वोट दिया होता, तो सीपीआई(एम) के 19.34 फीसदी और कांग्रेस के 4.8 फीसदी वोटों का योग बहुत बड़ा होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके साथ ही, इस जादुई आंकड़े के पीछे हिंदू वोटों का शत-प्रतिशत ध्रुवीकरण भी एक बड़ी वजह रहा। फाल्टा की सामान्य जातियों और करीब 25.66 फीसदी दलित (SC) आबादी के बीच एक जबरदस्त राजनीतिक लामबंदी देखी गई, जिसने टीएमसी के खिलाफ अपने गुस्से को वोट के जरिए जाहिर किया। पारंपरिक रूप से जो हिंदू वोटर पहले लेफ्ट फ्रंट को वोट करता था, उसने इस बार अपना वोट खराब न करते हुए सीधे बीजेपी के पक्ष में ट्रांसफर कर दिया ताकि टीएमसी को पूरी तरह से साफ किया जा सके।

फाल्टा के इन नतीजों ने ममता बनर्जी और राहुल गांधी दोनों के लिए खतरे का अंतिम सायरन बजा दिया है। ममता बनर्जी के लिए यह झटका इसलिए जानलेवा है क्योंकि उनके अपने सबसे मजबूत गढ़ में संगठन अति-आत्मविश्वास और आंतरिक कलह के कारण ताश के पत्तों की तरह ढह गया। अगर दीदी का पारंपरिक वोटर उनके उम्मीदवार के न होने पर विपक्ष के बजाय सीधे बीजेपी की तरफ जा रहा है, तो यह आने वाले समय में टीएमसी के पूरी तरह अवसान की शुरुआत है। वहीं दूसरी तरफ, कांग्रेस ने यहां अब्दुर रज्जाक मोल्ला जैसे पुराने और कद्दावर चेहरे को उतारा था, लेकिन बड़े-बड़े दावों और यात्राओं के बावजूद कांग्रेस महज 4.8 फीसदी वोटों पर सिमट गई। इससे साफ है कि अल्पसंख्यक समुदाय अब खोखले सेक्युलर कार्ड पर भरोसा करने के मूड में नहीं है और वह देश की मुख्यधारा की राजनीति के साथ जुड़कर अपने विकास की नई इबारत लिखना चाहता है। बंगाल की यह सियासी करवट सिर्फ एक सीट का नतीजा नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति का एक बड़ा संदेश है।

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