डिजिटल आंदोलन या भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय टूलकिट

 

डिजिटल आंदोलन या भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय टूलकिट

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

भारत के डिजिटल स्पेस में इन दिनों एक अजीबोगरीब नाम की गूंज है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP। शुरुआत में जिसे महज इंटरनेट की दुनिया का एक और मीम या मजाक समझकर नजरअंदाज किया गया, वह देखते ही देखते देश के भीतर एक बड़े ऑनलाइन असंतोष और व्यवस्था विरोधी सुर का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका है। महज छह दिनों के भीतर इस प्लेटफॉर्म के इंस्टाग्राम अकाउंट पर फॉलोअर्स की संख्या 1.34 करोड़ के आंकड़े को पार कर गई, जिसने देश की स्थापित और दशकों पुरानी राजनीतिक पार्टियों को डिजिटल रेस में पीछे छोड़ दिया। पहली नजर में यह युवाओं की स्वतःस्फूर्त भड़ास और डिजिटल एकजुटता दिखाई देती है, लेकिन जब इस पूरे घटनाक्रम की परतों को उधेड़ा जाता है, तो इसके पीछे एक बेहद सधा हुआ नैरेटिव, पुराना राजनीतिक नेटवर्क और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों की गहरी चिंताएं सामने आने लगती हैं। सोशल मीडिया के इस नए तूफ़ान ने अब मीम्स की दुनिया से निकलकर देश के नीति-निर्धारकों और सुरक्षा तंत्र की रातों की नींद उड़ा दी है।

इस पूरे विवाद की जड़ें बीती 15 मई को सुप्रीम कोर्ट में हुई एक सुनवाई से जुड़ी हैं। परीक्षा प्रणालियों में गड़बड़ी और फर्जी डिग्री के सहारे सिस्टम में सेंध लगाने वालों पर टिप्पणी करते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कथित तौर पर ‘पैरासाइट्स’ और ‘कॉकरोच’ जैसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था। हालांकि, बाद में यह साफ किया गया कि कोर्ट का इशारा देश के बेरोजगार युवाओं की तरफ नहीं, बल्कि सिस्टम को खोखला करने वाले जालसाजों की तरफ था, लेकिन तब तक सोशल मीडिया के महारथियों ने इस बयान के चुनिंदा हिस्सों को हवा में तैरा दिया। बेरोजगारी, लगातार होते पेपर लीक और सरकारी भर्तियों में लेती-लतीफी से जूझ रहे देश के Gen-Z (नई पीढ़ी के युवाओं) ने इस शब्द को अपने आत्मसम्मान पर चोट की तरह लिया। सोशल मीडिया पर एक ऐसा माहौल तैयार हो गया मानो पूरा तंत्र ही आम युवाओं को इसी नजर से देखता है। बस, इसी सामूहिक गुस्से और राजनीतिक हताशा को भांपकर अमेरिका के बॉस्टन यूनिवर्सिटी में पब्लिक रिलेशन की पढ़ाई कर रहे एक भारतीय छात्र अभिजीत दीपके ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम से एक व्यंग्यात्मक डिजिटल मंच की नींव रख दी।

पार्टी का नारा दिया गया “सेक्युलर, सोशलिस्ट, डेमोक्रेटिक, लेजी” और सदस्यता के लिए शर्तें रखी गईं बेरोजगार होना, आलसी होना, हमेशा ऑनलाइन रहना और प्रोफेशनल तरीके से अपनी भड़ास निकालना। युवाओं को यह अंदाज इतना पसंद आया कि ‘मैं भी कॉकरोच’ का नारा एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और रेडिट पर टॉप ट्रेंड बन गया। यह पूरी तरह से एक सटायर यानी व्यंग्य था, जिसने युवाओं के उस गंभीर अवसाद को अपनी तरफ खींच लिया जो नौकरी न मिलने या नीट जैसी परीक्षाओं के बार-बार लीक होने से पैदा हुआ था। लेकिन खेल सिर्फ इतने पर नहीं रुका। इस आभासी दल ने अपना एक मेनिफेस्टो भी जारी कर दिया, जिसमें जजों की रिटायरमेंट के बाद नियुक्तियों पर रोक, दलबदलू नेताओं पर 20 साल का प्रतिबंध और मीडिया की आजादी जैसे लोकलुभावन और गंभीर वादे शामिल थे। इंटरनेट की इस लहर को और हवा देने के लिए एक और छद्म विपक्षी समूह ‘नेशनल पैरासिटिक फ्रंट’ (NPF) भी मैदान में उतर आया, जिसने ‘मिनिस्ट्री ऑफ रिज’ और ‘यूपीआई के जरिए दिल टूटने का मुआवजा’ जैसे मजाकिया पैंतरे अपनाकर इस मीम वॉर को युवाओं के लिए एक फुल-टाइम डिजिटल एंगेजमेंट में बदल दिया। दिल्ली में तो कुछ उत्साही लड़के कॉकरोच के कॉस्ट्यूम पहनकर यमुना किनारे सफाई करने भी पहुंच गए, जिससे लगा कि यह आंदोलन अब जमीन पर उतर रहा है।

लेकिन जैसे ही इस डिजिटल उभार का तकनीकी और बैकग्राउंड ऑडिट शुरू हुआ, इस तथाकथित ‘ऑर्गेनिक मूवमेंट’ की चकाचौंध के पीछे छिपा पुराना राजनीतिक और संगठनात्मक ढांचा बेनकाब होने लगा। जांच में यह बात सामने आई कि इस मुहिम को शुरू करने वाले चेहरे कोई आम पीड़ित युवा नहीं हैं, बल्कि वे एक खास राजनीतिक दल के सोशल मीडिया और कम्यूनिकेशन सेल के पुराने और मंझे हुए खिलाड़ी रहे हैं। मुख्य सूत्रधार अभिजीत दीपके लंबे समय तक दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्रालय में कम्यूनिकेशन एडवाइजर के पद पर रह चुके हैं और उस समय के शीर्ष नेताओं के बेहद करीबी रहे हैं। इतना ही नहीं, उनका पुराना रिकॉर्ड भी विवादों से भरा रहा है, जिसमें कश्मीर और सीएए-एनआरसी जैसे संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दों पर भड़काऊ और फेक न्यूज फैलाने के आरोप में उन पर एफआईआर तक दर्ज हो चुकी है। इस कड़ी में दूसरा नाम अर्पित शर्मा का आता है, जिनका परिवार भी उसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से आता है और जो इस पेज को सीधे तौर पर प्रमोट कर रहे थे। तीसरा अहम लिंक यूएई और अमेरिका के बीच सक्रिय नबील शेख का मिला, जिसने रातों-रात अपने पुराने सोशल मीडिया अकाउंट्स के सारे डेटा डिलीट करके सीजेपी के सपोर्ट में दूसरा बड़ा डिजिटल पेज खड़ा कर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम की क्रोनोलॉजी को देखें तो यह महज एक इत्तेफाक नहीं लगता। 3 मई को नीट परीक्षा को लेकर उपजा विवाद, 13 मई को अरविंद केजरीवाल द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कहना कि अगर नेपाल और बांग्लादेश के युवा तख्तापलट कर सकते हैं तो भारत के युवा भी सड़कों पर आकर बहुत कुछ कर सकते हैं, 15 मई को देश के मुख्य न्यायाधीश का बयान आना और ठीक अगले ही दिन यानी 16 मई को इस विशाल डिजिटल नेटवर्क का लाइव हो जाना यह सब एक सोची-समझी और गहरे स्तर पर प्लान की गई रणनीति की तरफ इशारा करता है। सुरक्षा एजेंसियों और इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की जांच में सबसे बड़ा खुलासा इसके फॉलोअर्स के बेस को लेकर हुआ है। जब इस पेज के लाखों-करोड़ों फॉलोअर्स के प्रोफाइल्स की पड़ताल की गई, तो पाया गया कि जिनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत का है ही नहीं। इन अकाउंट्स पर बांग्लादेश, पाकिस्तान, टर्की और सऊदी अरब के झंडे और मैप लगे हुए थे। यानी भारत के युवाओं के जायज गुस्से और उनकी चिंताओं की आड़ में एक ऐसा ग्लोबल इकोसिस्टम सक्रिय किया गया, जिसका मकसद भारत के भीतर एक कृत्रिम जन-आक्रोश पैदा करना था।

डिजिटल वर्ल्ड में पैसे के दम पर रातों-रात लाखों बोट्स (नकली अकाउंट्स) और विदेशी फॉलोअर्स खरीदना कोई मुश्किल काम नहीं है। चिंता की बात यह है कि इस मुहिम के जरिए अब आम भारतीय युवाओं से ऑनलाइन फॉर्म भरवाकर उनकी बेहद संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारियां जैसे उनका नाम, पता, फोन नंबर और उनकी राजनीतिक विचारधारा का डेटा इकट्ठा किया जा रहा है। जो लोग सरकार के डेटा प्राइवेसी बिल या एनआरसी जैसी प्रक्रियाओं पर अपनी प्राइवेसी के उल्लंघन का हवाला देकर सवाल उठाते थे, वे आज बेहद आसानी से अपना पूरा डेटा अमेरिका और विदेशों में बैठे अज्ञात सर्वरों और एडमिन्स के हाथों में सौंप रहे हैं। इस डेटा का इस्तेमाल भविष्य में युवाओं के दिमाग को मैनिपुलेट करने, उन्हें देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ भड़काने और किसी भी वक्त सड़कों पर दंगा या अराजकता फैलाने के लिए किया जा सकता है।

सुरक्षा अधिकारियों की सबसे बड़ी आशंका यही है कि यह आंदोलन हास्य और व्यंग्य की आड़ में युवाओं को व्यवस्था के खिलाफ इस कदर उदासीन और हिंसक बना देना चाहता है कि उनका देश की न्यायपालिका, चुनाव आयोग और चुनी हुई सरकार से भरोसा ही उठ जाए। जैसा कि हमने हाल के वर्षों में नेपाल और बांग्लादेश में देखा, जहां छात्र आंदोलनों के नाम पर पूरे देश की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता को तबाह कर दिया गया और अंततः वहां विदेशी हितों को साधने वाले चेहरों को सत्ता की कमान सौंप दी गई। भारत एक तेजी से उभरती हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था है, जिसने वैश्विक संकटों के दौर में भी अपनी स्थिरता को बनाए रखा है। ऐसे में कई वैश्विक ताकतें और उनके इशारों पर काम करने वाले अराजकतावादी विचारक इस देश को आंतरिक रूप से अस्थिर करने के नए-नए हथकंडे खोज रहे हैं। किसान आंदोलन से लेकर मणिपुर और अब इस ‘कॉकरोच मूवमेंट’ तक, हर जगह पैटर्न एक ही है सिस्टम की किसी एक वास्तविक विफलता को पकड़ो, युवाओं के असंतोष को हवा दें, और फिर विदेशों में बैठकर देश में अस्थिरता पैदा करने की साजिश रचो। सरकार द्वारा इस पेज के एक्स अकाउंट को ब्लॉक करना अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं, बल्कि इसी राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे को रोकने का एक प्रशासनिक कदम है। युवाओं को यह समझना होगा कि वे बदलाव की चाह में किसी ऐसी विदेशी और राजनीतिक बिसात के मोहरे न बन जाएं, जिसका अंतिम मकसद सिर्फ और सिर्फ भारत को कमजोर करना है।

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