हिमाचल में कांग्रेस की ढीली पड़ती पकड़, क्या 2027 में बचेगा आखिरी उत्तर भारतीय किला
हिमाचल प्रदेश की राजनीति में आए ताजा चुनावी संकेतों ने कांग्रेस नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। नगर निगम चुनावों के नतीजे भले स्थानीय निकायों से जुड़े हों, लेकिन उनके राजनीतिक संदेश को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। मंडी, धर्मशाला और सोलन नगर निगम में भाजपा की जीत और पालमपुर में कांग्रेस की सीमित सफलता ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या उत्तर भारत में कांग्रेस का आखिरी मजबूत गढ़ भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। जिस राज्य ने दिसंबर 2022 में कांग्रेस को सत्ता की वापसी कराई थी, वहीं अब पार्टी के सामने जनाधार बचाए रखने की चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है।चार नगर निगमों की 63 सीटों में भाजपा ने 37 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस 23 सीटों तक सिमट गई। राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल स्थानीय चुनावी नतीजा नहीं मान रहे। इसकी वजह यह है कि पिछले दो वर्षों के दौरान हिमाचल प्रदेश में जो राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं, वे लगातार कांग्रेस के लिए चेतावनी का संकेत देते रहे हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में 68 सदस्यीय सदन में कांग्रेस ने 40 सीटें जीतकर भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया था। उस समय पुरानी पेंशन योजना, महंगाई, बेरोजगारी और कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों ने कांग्रेस को बड़ी बढ़त दिलाई थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद पार्टी उस जनसमर्थन को स्थायी राजनीतिक ताकत में बदलने में संघर्ष करती दिखाई दी।
लोकसभा चुनावों ने इस बदलाव का पहला बड़ा संकेत दिया था। 2024 में भाजपा ने हिमाचल प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज कर यह स्पष्ट कर दिया कि विधानसभा चुनाव का जनादेश स्थायी नहीं था। इसके बाद हुए उपचुनावों और राजनीतिक घटनाक्रमों ने भी कांग्रेस की स्थिति को चुनौतीपूर्ण बनाया। अब नगर निगम चुनावों के नतीजे उस राजनीतिक प्रवृत्ति को और मजबूत करते दिखाई दे रहे हैं। भाजपा इन्हें मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस इन्हें स्थानीय परिस्थितियों से जोड़कर देख रही है। लेकिन सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं मौजूद है।हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार की सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक मोर्चे पर दिखाई देती है। राज्य लंबे समय से वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। सीमित संसाधनों वाले इस पहाड़ी राज्य पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य की कुल देनदारियां एक लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुकी हैं। राजस्व संग्रह की सीमाएं और बढ़ते खर्च ने सरकार के सामने मुश्किल हालात पैदा किए हैं। कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, विकास योजनाओं और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं रहा। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि सरकार के पास विकास कार्यों को गति देने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।
आर्थिक संकट का राजनीतिक असर इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि हिमाचल प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की बड़ी संख्या चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। कांग्रेस ने सत्ता में आते ही पुरानी पेंशन योजना लागू कर कर्मचारियों का भरोसा जीतने की कोशिश की थी, लेकिन अब जनता केवल चुनावी वादों से आगे बढ़कर ठोस परिणाम देखना चाहती है। यदि आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं होता और विकास कार्यों की गति प्रभावित होती है तो यह सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक जोखिम बन सकता है।प्राकृतिक आपदाओं ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ाई हैं। पिछले कुछ वर्षों में बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाओं ने राज्य के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। हजारों करोड़ रुपये की क्षति ने वित्तीय दबाव को और बढ़ा दिया। सड़कों, पुलों और सार्वजनिक सुविधाओं के पुनर्निर्माण पर सरकार को लगातार खर्च करना पड़ा। ऐसे में विकास और वित्तीय अनुशासन दोनों को साथ लेकर चलना सरकार के लिए कठिन साबित हो रहा है।कांग्रेस की परेशानी केवल सरकार चलाने तक सीमित नहीं है। पार्टी के भीतर की राजनीति भी उसके लिए चुनौती बनी हुई है। हिमाचल कांग्रेस लंबे समय से कई शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन पर टिकी रही है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की राजनीतिक विरासत आज भी प्रदेश की राजनीति में प्रभाव रखती है। उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे विक्रमादित्य सिंह का समर्थक वर्ग अलग पहचान रखता है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू अपने नेतृत्व को मजबूत करने की कोशिश में हैं। समय-समय पर सामने आए मतभेदों ने यह संकेत दिया है कि संगठनात्मक एकजुटता अभी भी पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी है। राज्यसभा चुनाव के दौरान पैदा हुआ राजनीतिक संकट इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
भाजपा ने कांग्रेस की इन कमजोरियों को अपनी ताकत में बदलने की रणनीति बनाई है। विपक्ष में रहने के बावजूद पार्टी का संगठन लगातार सक्रिय रहा है। नगर निगम चुनावों में मिली सफलता ने भाजपा कार्यकर्ताओं के आत्मविश्वास को बढ़ाया है। मंडी में मिली जीत को विशेष महत्व दिया जा रहा है क्योंकि यह क्षेत्र राजनीतिक दृष्टि से बेहद प्रभावशाली माना जाता है। धर्मशाला और सोलन जैसे शहरी इलाकों में भाजपा की सफलता यह दर्शाती है कि शहरी मतदाता कांग्रेस सरकार के प्रदर्शन को लेकर पूरी तरह संतुष्ट नहीं है।हालांकि राजनीति में डेढ़ वर्ष का समय बहुत लंबा माना जाता है। विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं और हिमाचल प्रदेश का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां मतदाता अंतिम समय में भी अपना रुख बदल सकते हैं। नगर निगम और विधानसभा चुनावों के मुद्दे भी अलग-अलग होते हैं। स्थानीय चुनावों में पानी, सड़क, सफाई और नगर विकास जैसे विषय हावी रहते हैं, जबकि विधानसभा चुनाव में नेतृत्व, राज्य की अर्थव्यवस्था, विकास और व्यापक राजनीतिक माहौल अधिक प्रभाव डालते हैं।फिर भी कांग्रेस के लिए यह समय आत्ममंथन का है।
यदि पार्टी इन नतीजों को केवल स्थानीय असंतोष मानकर आगे बढ़ती है तो यह उसके लिए खतरनाक साबित हो सकता है। मुख्यमंत्री सुक्खू के सामने अब दोहरी चुनौती है। उन्हें आर्थिक मोर्चे पर परिणाम देने होंगे और संगठन के भीतर एकजुटता भी कायम रखनी होगी। यदि अगले डेढ़ साल में सरकार विकास, रोजगार और वित्तीय प्रबंधन के क्षेत्र में ठोस उपलब्धियां दिखाने में सफल रहती है तो राजनीतिक तस्वीर बदल सकती है। लेकिन यदि मौजूदा हालात जारी रहते हैं तो भाजपा को सत्ता में वापसी का मजबूत अवसर मिल सकता है।उत्तर भारत में कांग्रेस पहले ही लगातार कमजोर होती गई है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में पार्टी सत्ता से बाहर है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश केवल एक राज्य नहीं, बल्कि कांग्रेस की उत्तर भारतीय राजनीति का आखिरी बड़ा आधार है। यही वजह है कि 2027 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए सामान्य चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व और साख की लड़ाई होगा। नगर निगम चुनावों ने खतरे की घंटी जरूर बजा दी है। अब देखना यह है कि कांग्रेस इस चेतावनी को समय रहते समझती है या फिर उत्तर भारत में उसका आखिरी किला भी इतिहास का हिस्सा बन जाता है।
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