पूर्वांचल में कुनबों की सियासी जंग, 2027 के टिकट पर किसका कब्जा


पूर्वांचल में कुनबों की सियासी जंग, 2027 के टिकट पर किसका कब्जा

उत्तर प्रदेश में चुनाव अभी आया नहीं है, लेकिन पूर्वांचल ने 2027 की आहट सुन ली है। बलिया, जौनपुर, मऊ, गाजीपुर, आजमगढ़ और अंबेडकरनगर तक राजनीतिक परिवारों की अगली पीढ़ी ज्यादा दिखाई देने लगी है। कहीं पत्नी गांवों में पहुंच रही है, कहीं बेटी सामाजिक कार्यक्रमों में मौजूद है, कहीं बेटा पंचायत की राजनीति से जमीन बना रहा है। यह सिर्फ टिकट की दौड़ नहीं है। यह उस राजनीतिक विरासत को बचाने की कोशिश है, जिसे पूर्वांचल के परिवार दशकों से पूंजी मानते आए हैं।बलिया में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की बहू डॉ. सुषमा शेखर चर्चित हैं। उनके पति नीरज शेखर राज्यसभा सांसद हैं और 2026 में सुषमा शेखर की फेफना क्षेत्र में सक्रियता बढ़ी है। जन्मशताब्दी कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी ने चर्चा को मजबूत किया। मार्च 2026 में उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ने के संकेत भी दिए। टिकट तय नहीं है, लेकिन राजनीति में संकेत घोषणा से पहले का संदेश होते हैं। फेफना में बढ़ता जनसंपर्क बताता है कि परिवार अपनी विरासत को सक्रिय राजनीतिक पूंजी बनाए रखना चाहता है।

जौनपुर में धनंजय सिंह परिवार की कहानी अलग लेकिन उतनी ही दिलचस्प है। उनकी पत्नी श्रीकला रेड्डी जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं और क्षेत्र में सामाजिक तथा राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। मई 2026 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनकी मुलाकात के बाद उनके अगले कदम को लेकर चर्चाएं तेज हुईं। यह बताता है कि विधानसभा चुनाव की तैयारी सिर्फ पार्टी कार्यालयों में नहीं होती। जिला पंचायत, धार्मिक आयोजन और गांवों में मौजूदगी भी चुनावी तैयारी बन चुके हैं। चंदौली-वाराणसी इलाके में बृजेश सिंह परिवार का प्रभाव भी इसी समीकरण को समझाता है। अन्नपूर्णा सिंह 2022 में वाराणसी-चंदौली-भदोही स्थानीय प्राधिकारी सीट से निर्दलीय एमएलसी चुनी गई थीं। जून 2026 में बृजेश सिंह ने 2027 विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की। यानी परिवार अगली पीढ़ी तक नेटवर्क बढ़ाता दिख रहा है। बेटे सिद्धार्थ के स्थानीय राजनीति में आगे आने की चर्चाएं इसी प्रक्रिया का हिस्सा मानी जा रही हैं।

अंबेडकरनगर में लालजी वर्मा की बेटी डॉ. छाया वर्मा का नाम कटेहरी के संदर्भ में चर्चा में है। लालजी वर्मा लंबे समय तक इसी क्षेत्र की राजनीति के केंद्र में रहे हैं और 2024 में लोकसभा जाने के बाद विधानसभा सीट खाली हुई थी। ऐसे परिवार के लिए अगली पीढ़ी तैयार करना संगठनात्मक रणनीति है। कटेहरी में परिवार की पुरानी पकड़, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क छाया वर्मा को बढ़त दे सकता है, लेकिन जीत के लिए विरासत से आगे काम करना होगा। आजमगढ़ में दुर्गा प्रसाद यादव की कहानी परिवारवादी राजनीति की लंबी उम्र दिखाती है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वे नौ बार विधायक चुने जा चुके हैं और 2022 में फिर आजमगढ़ सदर से निर्वाचित हुए। अब अगली पीढ़ी की सक्रियता महत्वपूर्ण है क्योंकि विधायक का नाम दशकों के सामाजिक संपर्क से जुड़ा है। इसी तरह रामगोविंद चौधरी के परिवार में बेटे रंजीत की सक्रियता और तूफानी सरोज परिवार में सांसद प्रिया सरोज के बाद दूसरी पीढ़ी की विधानसभा राजनीति की चर्चा बताती है कि संसदीय विरासत अब विधानसभा सीटों तक फैल रही है।

मऊ की राजनीति में कल्पनाथ राय का परिवार भी पुराने प्रभाव की वापसी का उदाहरण बन रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय की विरासत आज भी क्षेत्र की राजनीतिक स्मृति का हिस्सा है। परिवार की बहू के सार्वजनिक कार्यक्रमों से 2027 की चर्चा हुई है, लेकिन इसे उम्मीदवारी की घोषणा कहना जल्दबाजी होगी। यही सावधानी अंसारी परिवार पर भी लागू होती है। मुख्तार अंसारी के निधन के बाद परिवार की राजनीतिक भूमिका बदली है और अब अफशां अंसारी या निकहत अंसारी जैसे नामों को लेकर चर्चाएं होती हैं। मगर चर्चा और पार्टी का आधिकारिक निर्णय दो अलग बातें हैं। अब पूर्वांचल की इस सूची में अपर्णा यादव का नाम सबसे अलग राजनीतिक अर्थ पैदा करता है। मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा यादव 2022 में भाजपा में शामिल हुईं और 2024 में उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष नियुक्त हुईं। 2026 में भी वह राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। 2027 में उनका नाम किसी सीट के लिए चर्चा में आए तो राजनीतिक संदेश होगा। खासकर आजमगढ़ जैसे समाजवादी प्रभाव वाले इलाके में उनकी संभावित मौजूदगी भाजपा के लिए यादव परिवार की विरासत के भीतर अलग राजनीतिक प्रतीक तैयार कर सकती है। हालांकि किसी सीट से उनका टिकट तय नहीं है।

गोंडा से जुड़े बृजभूषण शरण सिंह की बेटी शालिनी सिंह का नाम भी संभावित दावेदारों की चर्चाओं में आता है। उनका मुख्य संदर्भ गोंडा है, इसलिए उन्हें पूर्वांचल की किसी सीट का उम्मीदवार मानना अनुमान होगा। भाजपा परिवारों की अगली पीढ़ी को अलग क्षेत्रों में आजमाए तो ऐसे नामों की भूमिका बढ़ सकती है। यही बात अपना दल एस और निषाद पार्टी के नेताओं के परिवारों पर भी लागू होती है। अनुप्रिया पटेल और संजय निषाद के इलाकों में परिवारों की सामाजिक मौजूदगी संगठन के लिए उपयोगी हो सकती है।सपा के भीतर भी यह दौड़ कम नहीं है। लालजी वर्मा, अंबिका चौधरी, रामअचल राजभर जैसे पुराने नेताओं के परिवारों की नई पीढ़ी को लेकर चर्चाएं बताती हैं कि टिकट की राजनीति अब व्यक्तिगत सीट से ज्यादा राजनीतिक घराने की ताकत का सवाल बनती जा रही है। कांग्रेस भी पुराने सामाजिक संपर्क वाले परिवारों को नजरअंदाज नहीं कर सकती। बसपा की चुनौती कठिन है। अगस्त 2026 में उमाशंकर सिंह के निधन के बाद पार्टी उत्तर प्रदेश विधानसभा में अपना एकमात्र विधायक खो चुकी है। रसड़ा में उनके परिवार की राजनीतिक भूमिका निगाह में रहेगी, लेकिन उत्तराधिकारी कौन होगा, इसे अभी तय मानना सही नहीं है।

आंकड़े बताते हैं कि 2022 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 255 विधानसभा सीटें जीती थीं, जबकि सपा 111 पर रही थी। बसपा और कांग्रेस क्रमशः एक और दो सीटों तक सिमट गई थीं। फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा 37 और भाजपा 33 सीटों पर रही। यही बदलाव 2027 की कहानी को कठिन बनाता है। कोई परिवार कितना भी मजबूत हो, उसे बदलते मतदाता, गठबंधन और स्थानीय मुद्दों के बीच खुद को साबित करना होगा।यही कारण है कि 2027 में टिकट मांगने वाले परिवारों की संख्या बढ़ सकती है, लेकिन टिकट पाने वालों और जीतने वालों की सूची एक जैसी नहीं होगी, बिल्कुल नहीं। पूर्वांचल में परिवारवाद की सबसे बड़ी ताकत उसका तैयार नेटवर्क है और सबसे बड़ी कमजोरी जनता की बढ़ती अपेक्षा। बेटा हो, बेटी हो, पत्नी हो या बहू, मतदाता अब सिर्फ उपनाम देखकर वोट नहीं देता। बेरोजगारी, सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था, किसान और शिक्षा जैसे मुद्दे हर विरासत की परीक्षा लेंगे। इसलिए 2027 से पहले उड़ती धूल सिर्फ काफिलों की नहीं है। यह उस संघर्ष की धूल है जिसमें पुराने नाम अपनी अगली पीढ़ी के लिए जगह मांग रहे हैं। असली फैसला टिकट मिलने पर नहीं, मतदान के दिन होगा। तब पूर्वांचल बताएगा कि उसने विरासत को चुना है या प्रदर्शन को।

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