राहुल के 'गढ़' से अखिलेश का पीडीए रथ

 


राहुल के 'गढ़' से अखिलेश का पीडीए रथ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव महज एक चुनावी मुकाबला नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों को फिर से गढ़ने की एक निर्णायक जंग बन चुका है। साल 2017 से सूबे की सत्ता से बाहर चल रही समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए यह चुनाव 'करो या मरो' की स्थिति पेश कर रहा है। अपनी इस राजनीतिक वापसी को अमली जामा पहनाने के लिए अखिलेश यादव ने अपने विशेष हाईटेक लाल 'पीडीए रथ' को मैदान में उतार दिया है। दिलचस्प बात यह है कि राज्यव्यापी यात्रा का यह पहला पड़ाव किसी पारंपरिक सपा गढ़ के बजाय रायबरेली को चुना गया है। रायबरेली, जिसे पारंपरिक रूप से गांधी परिवार का अभेद्य किला माना जाता रहा है और जहां से वर्तमान में राहुल गांधी सांसद हैं, वहां से सपा का चुनावी शंखनाद करना महज एक इत्तेफाक नहीं है। इसके पीछे गहरी रणनीति, सामाजिक जोड़-तोड़ और सहयोगियों के साथ भावी सौदेबाजी का एक सुचिंतित खाका छिपा है।

इस सियासी हलचल के तात्कालिक कारण रायबरेली के फिरोज गांधी डिग्री कॉलेज में 17 सितंबर को घटी उस घटना में छिपे हैं, जहां सदस्यता अभियान के दौरान समाजवादी छात्र सभा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए थे। झंडे और पोस्टर लगाने को लेकर शुरू हुई कहासुनी ने देखते ही देखते उग्र रूप ले लिया, जिसके बाद स्थानीय पुलिस और सपा के जिला स्तरीय नेताओं के बीच तीखी बहस हुई। सपा जिलाध्यक्ष वीरेंद्र यादव और शहर कोतवाली प्रभारी के बीच हुई धक्का-मुक्की और बयानों का वीडियो सामने आने के बाद मामला और गरमा गया। हरचंदपुर से सपा विधायक राहुल लोधी ने पुलिस-प्रशासन पर पक्षपात और अभद्रता का आरोप लगाया। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने इस स्थानीय टकराव को लपकते हुए इसे केवल एक प्रशासनिक या छात्र विवाद तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसे सीधे तौर पर 'पीडीए पर प्रहार' का नाम दे दिया। लखनऊ में रायबरेली के सपा नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्होंने तुरंत रायबरेली का दौरा करने और विधायक राहुल लोधी के घर चाय पीने का ऐलान करके कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंक दिया।

रायबरेली में अखिलेश यादव की यह सक्रियता अवध क्षेत्र के जातीय और चुनावी आंकड़ों पर आधारित है। उत्तर प्रदेश के 2022 के विधानसभा चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो रायबरेली लोकसभा के अंतर्गत आने वाली 6 विधानसभा सीटों में से 4 सीटों हरचंदपुर, बछरावां, सरेनी और ऊंचाहार पर समाजवादी पार्टी ने परचम लहराया था। हालांकि, बाद में ऊंचाहार से विधायक मनोज कुमार पांडेय ने पाला बदलकर सत्तारूढ़ दल का दामन थाम लिया, लेकिन इसके बावजूद रायबरेली जिले में सपा के तीन मजबूत विधायक मौजूद हैं। बछरावां से पासी (दलित) समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले श्याम सुंदर भारती, हरचंदपुर से लोधी (गैर-यादव ओबीसी) समाज के राहुल लोधी और सरेनी से देवेंद्र प्रताप सिंह सपा के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। रायबरेली सदर सीट पर भी सपा बहुत ही मामूली अंतर से चुनाव हारी थी। इन आंकड़ों से साफ है कि रायबरेली केवल कांग्रेस की पारंपरिक सीट नहीं है, बल्कि धरातल पर सपा की सांगठनिक और विधायी मौजूदगी काफी मजबूत है।

अखिलेश यादव का रायबरेली दौरा एक 'थ्री-इन-वन' रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसका पहला पहलू गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को अपने पाले में मजबूती से बांधना है। रायबरेली और आसपास के अवध क्षेत्र में लोधी और पासी मतदाताओं की अच्छी-खासी आबादी है। पारंपरिक मुस्लिम-यादव (एम-वाई) समीकरण के साथ अगर लोधी और पासी वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा जुड़ता है, तो यह सोशल इंजीनियरिंग बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के सामाजिक गठबंधन में बड़ी सेंध लगा सकती है। राहुल लोधी के आवास पर जाना और दलित विधायक श्याम सुंदर भारती को साथ लेकर चलना इसी सामाजिक संदेश का जमीनी विस्तार है।

रणनीति का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पहलू 'इंडिया गठबंधन' के भीतर चलने वाली अंदरूनी खींचतान और प्रेशर पॉलिटिक्स से जुड़ा है। लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन के बाद कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में है और 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अधिक से अधिक सीटों पर अपनी दावेदारी ठोक रही है। ऐसे में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के सबसे बड़े राजनीतिक गढ़ से बिना किसी सहयोगी दल के सहारे अपने मुख्य प्रचार वाहन 'पीडीए रथ' को रवाना करके एक स्पष्ट मनोवैज्ञानिक संदेश दिया है। सपा यह जताने की कोशिश कर रही है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने वाली मुख्य पार्टी वही है। जब आगामी महीनों में सीट-शेयरिंग की मेज पर बातचीत होगी, तो सपा रायबरेली में अपनी तीन सीटों और जमीनी कैडर के आधार पर खुद को 'बड़े भाई' की भूमिका में रखकर अपनी शर्तों पर सीटें तय कराने का दबाव बना सकेगी।

तीसरा पहलू पार्टी कैडर के मनोबल को बढ़ाना है। पुलिस प्रशासन के साथ हुए टकराव के बाद सपा प्रमुख का खुद कार्यकर्ताओं के बीच पहुंचना यह संदेश देता है कि शीर्ष नेतृत्व अपने प्रतिनिधियों के साथ खड़ा है। जीआईसी मैदान में जनसभा और कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद के जरिए अखिलेश यादव 2027 की चुनावी तैयारी का माहौल तैयार कर रहे हैं। लाल रंग का यह पीडीए रथ आने वाले महीनों में पूरे प्रदेश का दौरा करेगा, जहां बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को आधार बनाकर जनता के बीच पैठ बनाने की योजना है। रायबरेली की धरती से शुरू हुआ यह सियासी सफर यह स्पष्ट संकेत दे रहा है कि 2027 की चुनावी चौसर पर समाजवादी पार्टी किसी भी मोर्चे पर ढिलाई बरतने या बैकफुट पर रहने के मूड में बिल्कुल नहीं है।

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