राहुल का ‘मोदी के बाद कौन’ वाला दांव

 राहुल का ‘मोदी के बाद कौन’ वाला दांव 

राहुल गांधी ने मोदी के बाद कौन वाला सवाल उछालकर भारतीय राजनीति में एक सवाल उछाला है, जिसकी गूंज से बीजेपी बच नहीं सकती। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल ने दावा किया कि नरेंद्र मोदी का राजनीतिक दौर अंतिम चरण में है और उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हो चुकी है। यह केवल बयान नहीं है। यह मोदी केंद्रित राजनीति के किले पर सीधे भविष्य का गोला है। राहुल जानते हैं कि आज की लड़ाई सिर्फ सरकार की आलोचना से नहीं जीती जाएगी। विपक्ष को उस धारणा पर चोट करनी होगी कि मोदी ही बीजेपी हैं और बीजेपी का अगला अध्याय भी मोदी के नाम से ही लिखा जाएगा।2014 में बीजेपी ने 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत पाया। 2019 में आंकड़ा 303 तक पहुंच गया। लेकिन 2024 में पार्टी 240 सीटों पर रुक गई। यानी अपने दम पर बहुमत से 32 सीट पीछे। कांग्रेस 52 से बढ़कर 99 सीटों तक पहुंची। एनडीए सरकार तो बना गया, लेकिन 293 सीटों की ताकत के पीछे सहयोगियों की जरूरत साफ दिखाई दी। यही वह मोड़ है, जहां राहुल गांधी अपनी राजनीति की नई पटकथा लिखना चाहते हैं। उनका संदेश है कि मोदी अजेय नहीं हैं और अगर अजेयता का मिथक टूट चुका है तो अगला सवाल स्वाभाविक है आगे क्या?राहुल का निशाना किसी नाम पर नहीं है। यही इस चाल की धार है। अगर वह अमित शाह, योगी आदित्यनाथ या किसी दूसरे नेता का नाम लेते, तो बहस व्यक्तियों तक सिमट जाती। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि उत्तराधिकारी की तलाश चल रही है। अब सवाल बीजेपी के भीतर चला गया। कौन? कब? क्यों? और क्या मोदी के बाद वही चुनावी मशीन उसी रफ्तार से चलेगी? सत्ता पक्ष चाहे जवाब न दे, लेकिन राजनीति में कई बार सबसे खतरनाक सवाल वही होता है, जिसका जवाब देने से भी नुकसान हो और खामोश रहने से भी।

मोदी ने 2014 में कांग्रेस के सामने यही मनोवैज्ञानिक जंग लड़ी थी। तब सवाल केवल महंगाई, भ्रष्टाचार या नीति पक्षाघात का नहीं था। मोदी ने मतदाता के सामने यह तस्वीर रखी कि दिल्ली में सत्ता बदल सकती है और उसके पास बदलाव का चेहरा मौजूद है। आज राहुल उस फार्मूले को उलट रहे हैं। वह कह रहे हैं कि बदलाव की घड़ी कभी न कभी बीजेपी के दरवाजे पर भी आएगी। फर्क सिर्फ इतना है कि राहुल के पास अभी उस बदलाव का एकल चेहरा नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति का बिखरा हुआ मैदान है।यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है। मोदी के बाद कौन पूछना आसान है, मोदी के मुकाबले कौन और किस कार्यक्रम के साथ पूछना मुश्किल। 2024 में कांग्रेस की 99 सीटों ने पार्टी को सांस दी, लेकिन उसे राष्ट्रीय सत्ता का दावेदार घोषित नहीं किया। विपक्षी गठबंधन 234 सीटों तक पहुंचा, पर गठबंधन के भीतर क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं भी उतनी ही मजबूत हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र की राजनीति एक ही केंद्रीय चेहरे से नहीं चलती। इसलिए राहुल का नया नैरेटिव तभी टिकेगा, जब कांग्रेस सवाल उठाने के साथ अपना जवाब भी तैयार करेगी।बीजेपी के लिए भी यह सवाल बेअसर नहीं कहा जा सकता। पिछले दो लोकसभा चुनावों में मोदी पार्टी के सबसे बड़े स्टार प्रचारक और राष्ट्रीय चुनाव अभियान के केंद्र रहे। 2024 में भी बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी, उसे 36 प्रतिशत से अधिक वोट मिले, लेकिन सीटों की गिरावट ने यह दिखा दिया कि वोट प्रतिशत की ताकत हमेशा सीटों की सुरक्षा की गारंटी नहीं होती। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में विपक्षी समीकरण ने बीजेपी को बड़ा नुकसान पहुंचाया। यही कारण है कि 2024 के बाद संगठन, राज्यों और सहयोगियों की राजनीति का महत्व पहले से बढ़ गया।राहुल गांधी इसी बदलती जमीन पर अपनी कील ठोक रहे हैं। उनका मकसद शायद यह साबित करना नहीं कि मोदी कल हटने वाले हैं। उनका उद्देश्य यह है कि मतदाता के दिमाग में मोदी के बाद का दृश्य पैदा हो। राजनीति में नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत केवल मौजूद रहना नहीं, बल्कि यह विश्वास होना भी है कि उसके बिना विकल्प नहीं है। राहुल उसी विश्वास पर हमला कर रहे हैं। वह बीजेपी के समर्थक से पूछना चाहते हैं कि अगर मोदी चुनावी केंद्र नहीं रहेंगे तो पार्टी का केंद्र कौन होगा?

मगर राहुल के दांव में जोखिम भी कम नहीं। बीजेपी पलटकर पूछ सकती है कि विपक्ष के पास कौन सा सर्वमान्य नेता है। कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी प्रमुख चेहरा हैं, लेकिन विपक्षी गठबंधन में ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और दूसरे क्षेत्रीय नेताओं की अपनी राजनीति है। इसलिए राहुल का हमला तभी असरदार बनेगा, जब वह विपक्षी एकता को केवल सीटों के समझौते से आगे ले जाकर साझा राजनीतिक कहानी में बदलें।सीडब्ल्यूसी की बैठक में राहुल ने पार्टी नेताओं को ज्यादा आक्रामक होने का संदेश दिया। साथ ही कांग्रेस के भीतर सामाजिक न्याय, परीक्षा सुधार और युवाओं के मुद्दों को लेकर भी रणनीति पर चर्चा हुई। यह संकेत महत्वपूर्ण है। केवल मोदी के बाद कौन पूछने से राजनीति नहीं बदलती। उस सवाल के नीचे बेरोजगारी, शिक्षा, परीक्षा, सामाजिक प्रतिनिधित्व और राज्यों की सत्ता का ठोस एजेंडा चाहिए। वरना उत्तराधिकारी की बहस स्टूडियो से आगे नहीं जाएगी और जनता अपनी पुरानी प्राथमिकताओं पर लौट जाएगी।राहुल का यह दांव दरअसल सत्ता परिवर्तन की भविष्यवाणी से ज्यादा राजनीतिक मनोविज्ञान का प्रयोग है। वह मोदी सरकार की उम्र नहीं गिन रहे, बल्कि मोदी की राजनीतिक अपरिहार्यता पर सवाल उठा रहे हैं। 2024 ने बीजेपी को सत्ता से बाहर नहीं किया, लेकिन उसके चारों तरफ बनी अजेयता की चमक जरूर कम की। कांग्रेस की चुनौती अब उस दरार को चौड़ा करने की है।असली मुकाबला इसलिए मोदी बनाम राहुल भर नहीं है। सवाल है कि क्या भारतीय राजनीति अगले कुछ वर्षों में एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां व्यक्तित्व से ज्यादा उत्तराधिकार, गठबंधन और राज्यों की ताकत निर्णायक होगी? राहुल ने यह सवाल जानबूझकर बीजेपी के पाले में फेंका है। जवाब चाहे आज न मिले, लेकिन बहस शुरू हो चुकी है। और राजनीति में बहस पर कब्जा अक्सर आधी लड़ाई जीतने जैसा होता है। राहुल का ‘मोदी के बाद कौन’ वाला दांव इसी आधी लड़ाई को पहले ही छीन लेने की कोशिश है।

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