उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव, आरएलडी के लिए गठबंधन से आगे की परीक्षा
उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात पर अभी मोहरे पूरी तरह नहीं सजे हैं, लेकिन पश्चिमी यूपी में अब सवाल राष्ट्रीय लोक दल यानी आरएलडी की सियासी हैसियत को लेकर है। जयंत चौधरी की पार्टी ने 2024 में बीजेपी का साथ चुना और अब 2027 में उसी गठबंधन के साथ विधानसभा मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। सवाल यह है कि आरएलडी ने जिस जाट-मुस्लिम सामाजिक आधार पर दशकों तक पश्चिमी यूपी में अपनी पहचान बनाई, उसमें से कितना हिस्सा उसके साथ बचा है और वह नया सामाजिक आधार कितना जोड़ सकती है।आंकड़े बताते हैं कि आरएलडी छोटी पार्टी जरूर है, लेकिन पश्चिमी यूपी में उसका असर उसकी सीटों से बड़ा रहा है। 2022 में पार्टी ने 33 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 8 सीटें जीतीं। उसका वोट शेयर करीब 2.86 प्रतिशत रहा। पूरे प्रदेश में संख्या सीमित है, लेकिन जिन सीटों पर उसका संगठन और सामाजिक प्रभाव है, वहां वह मुकाबले का रुख बदल सकती है। यही वजह है कि बीजेपी के लिए आरएलडी केवल कुछ सीटों का सहयोगी नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी के सामाजिक समीकरण को साधने वाला राजनीतिक औजार भी है।
2024 लोकसभा चुनाव ने इस रिश्ते की उपयोगिता को और साफ किया। बीजेपी को यूपी में 33 सीटें मिलीं, जबकि समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। पश्चिमी यूपी में बीजेपी और आरएलडी के तालमेल ने यह संदेश दिया कि जाट मतदाताओं का एक हिस्सा फिर से एनडीए के साथ खड़ा हो सकता है। लेकिन विधानसभा चुनाव लोकसभा से अलग होता है। यहां उम्मीदवार, स्थानीय नाराजगी, जातीय रिश्ते और बूथ स्तर की पकड़ ज्यादा निर्णायक होती है।आरएलडी की सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम मतदाता हैं। चौधरी चरण सिंह और अजित सिंह के दौर में पश्चिमी यूपी में जाट-मुस्लिम सामाजिक गठजोड़ पार्टी की पहचान का आधार रहा। मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत, सहारनपुर, बिजनौर और आसपास इस समीकरण ने कई बार चुनावी परिणाम बदले। लेकिन 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद यह सामाजिक गठजोड़ गहरे संकट में गया और 2022 में सपा-आरएलडी गठबंधन ने इसे कुछ हद तक फिर जोड़ने की कोशिश की। अब आरएलडी बीजेपी के साथ है। इसलिए मुस्लिम मतदाता के सामने भी राजनीतिक सवाल साफ है कि वह आरएलडी को स्थानीय प्रभाव वाली पार्टी मानेगा या एनडीए का हिस्सा।यहीं जयंत चौधरी की असली परीक्षा शुरू होती है। यदि मुस्लिम वोट बड़े पैमाने पर आरएलडी से दूर रहता है, तो पार्टी को अपने जाट आधार के साथ गुर्जर, त्यागी, सैनी, ओबीसी और छोटे किसान समूहों में विस्तार करना होगा। अगर वह इन समूहों में कुछ प्रतिशत अतिरिक्त वोट भी जोड़ती है, तो कई सीटों पर उसका गणित मजबूत हो सकता है। दूसरी तरफ मुस्लिम मतदाताओं का सीमित हिस्सा भी आरएलडी के उम्मीदवारों की ओर लौटता है, तो जाट और मुस्लिम वोट का आंशिक मेल एनडीए को पश्चिमी यूपी में अतिरिक्त बढ़त दे सकता है।
इसीलिए अखिलेश यादव की ओर से एनडीए के सहयोगियों के लिए 162 सीटों का दावा महज सीटों का आंकड़ा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। अखिलेश ने दावा किया कि 403 में से 73 सीटें आरएलडी, 39 सुभासपा, 31 निषाद पार्टी और 19 अपना दल को देने की तैयारी है। इन आंकड़ों का योग 162 होता है। हालांकि यह औपचारिक सीट बंटवारा नहीं, बल्कि अखिलेश का राजनीतिक दावा है। इसलिए इसे अंतिम समझना जल्दबाजी होगी। फिर भी इसका महत्व इसलिए है क्योंकि विपक्ष आरएलडी को बीजेपी के साथ उसकी जरूरत से ज्यादा सीटों की मांग करने वाली पार्टी के रूप में पेश करना चाहता है।आरएलडी के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे बीजेपी से ऐसी सीटें हासिल करनी हैं जहां उसका संगठन और चुनाव लड़ने की स्थिति में हो। दूसरी तरफ उसे यह साबित करना है कि वह केवल जाट प्रभाव वाले कुछ इलाकों की पार्टी नहीं रही। जुलाई 2026 की राजनीतिक चर्चाओं में आरएलडी की ओर से 33 से अधिक सीटों पर दावेदारी की खबरें सामने आईं। पश्चिमी यूपी में बीजेपी और आरएलडी के बीच सीटों को लेकर बातचीत और संगठनात्मक तालमेल भी चर्चा में रहा है। इसका मतलब साफ है कि सीटों की संख्या आरएलडी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल भी है और संगठन के विस्तार का साधन भी।
लेकिन यहां एक बड़ा जोखिम बीजेपी के लिए भी है। यदि आरएलडी को बहुत ज्यादा सीटें मिलती हैं और वह उन्हें जीत में नहीं बदल पाती, तो बीजेपी के मजबूत उम्मीदवारों को हटाकर सहयोगी को सीट देने का फैसला नुकसानदेह हो सकता है। दूसरी ओर आरएलडी को कम सीटें मिलीं तो उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों में यह संदेश जा सकता है कि पार्टी की राजनीतिक ताकत घट गई है। इसलिए सीट बंटवारा केवल गणित नहीं, मनोविज्ञान भी है।2022 के आंकड़े बीजेपी के लिए एक आधार देते हैं। बीजेपी ने 255 सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर 41.39 प्रतिशत था। एनडीए का कुल प्रदर्शन 273 सीटों तक पहुंचा। 2024 में लोकसभा चुनाव ने तस्वीर बदलने की संभावना दिखाई, जब बीजेपी की सीटें 33 रह गईं और विपक्षी दलों ने बड़ा उछाल लिया। इसका अर्थ यह नहीं कि 2027 का परिणाम तय है, लेकिन इतना जरूर है कि बीजेपी अब पश्चिमी यूपी को अपने आप सुरक्षित मानकर नहीं चल सकती।
आरएलडी के लिए असली लक्ष्य इसलिए 8 सीटों को दोहराना भर नहीं होना चाहिए। उसे ऐसी राजनीतिक जमीन तैयार करनी होगी जहां उसका उम्मीदवार जाट होने के कारण नहीं, आरएलडी के संगठन और जयंत चौधरी की पहचान के कारण वोट मांग सके। किसान, गन्ना मूल्य, रोजगार, शिक्षा, युवाओं के अवसर और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे उसे जातीय सीमाओं से बाहर ले जा सकते हैं।अखिलेश का हमला और आशीष पटेल का पलटवार इसी बड़ी लड़ाई की शुरुआती झलक है। अभी सीटों का अंतिम बंटवारा दूर है, लेकिन पश्चिमी यूपी में संदेश साफ है। बीजेपी को आरएलडी की जरूरत है, आरएलडी को बीजेपी के संसाधन और व्यापक गठबंधन की जरूरत है, जबकि आरएलडी को अपने पुराने सामाजिक भरोसे की भी जरूरत है। 2027 में जयंत चौधरी की सबसे बड़ी परीक्षा यही भी होगी कि वह गठबंधन की ताकत को अपनी पार्टी की स्वतंत्र सियासी पहचान में बदल पाते हैं या नहीं।
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