लड़ते पति-पत्नी सहमे-सहमे बच्चे


 लड़ते पति-पत्नी सहमे-सहमे बच्चे

‘घर में दो बर्तन होंगे तो टकराएंगे ही।’ भारतीय समाज ने इस कहावत के सहारे घरेलू झगड़ों को बरसों तक सामान्य मान लिया। लेकिन अब सवाल बदल चुका है दो बर्तन टकरा रहे हैं तो चार बर्तन क्यों टूट रहे हैं? पति-पत्नी का रिश्ता बिगड़ता है और उसकी कीमत बच्चे अपनी जान देकर क्यों चुका रहे हैं? कलबुर्गी में पत्नी से अलग रह रहे एक व्यक्ति ने कमर में जिलेटिन की छड़ें बांधकर उसके घर में खुद को उड़ा लिया। धमाके में 15 साल की बेटी की मौत हो गई, जबकि पत्नी और बेटा गंभीर रूप से घायल हुए। एक दिन पहले बेंगलुरु के होटल में पांच और दस साल की दो बच्चियों की हत्या का मामला सामने आया। पुलिस के मुताबिक पिता ने दोनों की हत्या की और फिर खुद की जान लेने की कोशिश की। कथित नोट में पत्नी के खिलाफ आरोपों का जिक्र बताया गया। लेकिन जांच चाहे जो सच सामने लाए, एक सवाल का जवाब कौन देगा दो वयस्कों के बीच जो हुआ, उसकी सजा दो बच्चियों को क्यों मिली?फतेहाबाद की घटना ने इस सवाल को और भयावह बना दिया। पुलिस के मुताबिक 31 वर्षीय महिला ने अपने 10 साल के बेटी और 8 साल के बेटे को जहरीला पदार्थ दिया और फिर खुद भी जहर खा लिया। केरल में आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार में दो साल के बच्चे और सात साल की बच्ची समेत चार लोगों की मौत हुई। आंध्र प्रदेश में पत्नी की बीमारी और उससे जुड़े तनाव के बीच दंपती और उनके दो स्कूली बच्चों की मौत हो गई। चार घटनाएं, चार अलग-अलग संकट कहीं वैवाहिक विवाद, कहीं कथित बेवफाई, कहीं घरेलू तनाव, कहीं आर्थिक बदहाली और कहीं बीमारी। मगर हर कहानी का सबसे कड़वा हिस्सा एक ही है बच्चे उस संकट में मारे गए, जिसे उन्होंने पैदा ही नहीं किया था।

यहीं ‘आत्महत्या’ शब्द भी पूरी सच्चाई को ढक देता है। जब कोई वयस्क अपने साथ बच्चे को मौत की तरफ ले जाता है, तो यह केवल खुदकुशी नहीं है। यह उस बच्चे की जिंदगी पर जबरन लिया गया फैसला है। वह बच्चा न विवाह का पक्षकार था, न तलाक का, न किसी कथित अफेयर का, न घर की आर्थिक समस्या का जिम्मेदार। उसने किसी के साथ विश्वासघात नहीं किया था। उसने किसी को धोखा नहीं दिया था। उसने कोई कर्ज नहीं लिया था। फिर उसके जीवन की कीमत क्यों तय कर दी गई? बच्चे को जन्म देने का अधिकार माता-पिता को मिला है, लेकिन उसकी जिंदगी खत्म करने का अधिकार किसी को नहीं मिला।राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2023 के आंकड़े इस संकट की भयावहता का दूसरा चेहरा दिखाते हैं। देश में उस वर्ष 1,71,418 आत्महत्याएं दर्ज हुईं। इनमें 31.9 प्रतिशत मामलों में पारिवारिक समस्याएं प्रमुख कारण के रूप में दर्ज की गईं। यानी हर तीन आत्महत्याओं में लगभग एक के पीछे परिवार से जुड़ा संकट मौजूद था। 18 वर्ष से कम उम्र के 2,568 बच्चों ने भी आत्महत्या की। ये आंकड़े सिर्फ मौतों की गिनती नहीं हैं; ये उस सामाजिक दबाव का संकेत हैं जो घर की चारदीवारी के भीतर बढ़ रहा है। परिवार, जिसे बच्चे की पहली सुरक्षा दीवार होना चाहिए, कई बार उसी के भीतर तनाव, डर और हिंसा की सबसे गहरी दरार पैदा हो रही है।लेकिन इस संकट को सिर्फ मानसिक बीमारी कहकर भी खत्म नहीं किया जा सकता। हर पारिवारिक त्रासदी के पीछे अलग परत होती है। कहीं घरेलू हिंसा है, कहीं नशा, कहीं बेरोजगारी, कहीं कर्ज, कहीं विवाह टूटने का डर, कहीं बीमारी और कहीं अपमान या बदले की भावना। समस्या यह है कि भारतीय समाज अभी भी इन संकेतों को गंभीर संकट की तरह देखने के बजाय उन्हें ‘घर की बात’ मानता है। पति-पत्नी के बीच रोज झगड़ा हो रहा है, बच्चों के सामने धमकियां दी जा रही हैं, कोई बार-बार कह रहा है कि वह खुद को या परिवार को खत्म कर देगा, घर में नशा बढ़ रहा है फिर भी आसपास के लोग कहते हैं, ‘कल ठीक हो जाएगा।’ कई बार कल आता ही नहीं।

सबसे खतरनाक हमारी यही सामाजिक भाषा है‘पति-पत्नी में झगड़ा तो होता रहता है’, ‘बच्चों के लिए समझौता कर लो’, ‘लोग क्या कहेंगे’, ‘घर की इज्जत घर में रखो।’ इन वाक्यों ने पीढ़ियों को हिंसा सहना सिखाया है। परिवार बचाने के नाम पर अगर बच्चे डर में जी रहे हैं, मां मार खा रही है, पिता नशे में हिंसक हो रहा है या कोई आत्महत्या की धमकी दे रहा है, तो यह परिवार बचाना नहीं है। यह खतरे को लंबा खींचना है। हर झगड़ा पुलिस का मामला नहीं, लेकिन हर हिंसक झगड़े को निजी मामला मानना भी अपराध से कम नहीं।न्यूक्लियर परिवार ने निजता और स्वतंत्रता दी, लेकिन संकट के समय अकेलापन भी बढ़ाया। संयुक्त परिवार आदर्श नहीं थे। उनमें हस्तक्षेप, दबाव और अन्याय की अपनी दुनिया थी। लेकिन संकट आने पर घर में कोई न कोई बीच में पड़ जाता था। दादा-दादी, चाचा-मामा, पड़ोसी या रिश्तेदार कम से कम यह देख लेते थे कि घर के भीतर कुछ असामान्य तो नहीं हो रहा। आज महानगरों के बंद फ्लैटों में एक परिवार कई बार अपने संकट के साथ बिल्कुल अकेला है। दरवाजा बंद है, झगड़ा अंदर है और बाहर की दुनिया को तब पता चलता है जब पुलिस पहुंचती है।इसलिए समाधान पुराने परिवार ढांचे में लौटना नहीं, बल्कि नए सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना है। स्कूलों को बच्चों के व्यवहार में अचानक आए बदलावों को गंभीरता से लेना होगा। 

पुलिस को घरेलू हिंसा की शिकायत में सिर्फ पति-पत्नी नहीं, बच्चों की सुरक्षा को भी देखना होगा। अस्पतालों और स्थानीय प्रशासन को आत्महत्या की धमकी, हिंसा और नशे के मामलों में परिवार की जोखिम स्थिति का आकलन करना होगा। अलग हो रहे माता-पिता के विवाद में बच्चे को संदेशवाहक, जासूस या बदले का हथियार बनने से रोकना होगा। और जिस व्यक्ति ने बच्चों को मारने या खुद को खत्म करने की धमकी दी है, उसकी बात को गुस्से की भाषा समझकर छोड़ना सबसे बड़ी भूल होगी।क्योंकि बच्चा किसी का हथियार नहीं है। न पति का, न पत्नी का, न परिवार की इज्जत का, न बदले का और न किसी टूटे हुए रिश्ते का। विवाह टूट सकता है। भरोसा खत्म हो सकता है। पति-पत्नी अलग हो सकते हैं। घर बंट सकता है। लेकिन बच्चे की जिंदगी किसी वयस्क के टूटे अहंकार, गुस्से, गरीबी, शक या निराशा की कीमत नहीं हो सकती। अब समय आ गया है कि ‘बच्चों के लिए साथ रहो’ की पुरानी सलाह से आगे बढ़कर समाज कहे ‘बच्चों को सुरक्षित रखो।’ क्योंकि हर शादी बचाना जरूरी नहीं, लेकिन हर बच्चे को बचाना जरूरी है।और आखिर में वही सवाल बचता है, जिससे अब समाज भाग नहीं सकता जब झगड़ा दो लोगों का था, तो मौत बच्चों की क्यों हुई? पति-पत्नी के रिश्ते में दरार उनकी अपनी हो सकती है, लेकिन उस दरार में किसी बच्चे का बचपन और सांसें नहीं गिरनी चाहिए। दो बर्तन टकराएं तो आवाज आए, गुस्सा आए, रिश्ता टूटे तो टूट जाए लेकिन चार बर्तन क्यों टूटें? बच्चे क्यों मरें? जिस दिन इस सवाल को ‘घर की बात’ नहीं बल्कि समाज की जिम्मेदारी माना जाएगा, शायद उस दिन परिवार सचमुच बच्चों के लिए सुरक्षित जगह बनना शुरू होगा।

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