ममता के जाते ही तसलीमा की बंगाल वापसी !


 ममता के जाते ही तसलीमा की बंगाल वापसी !

मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन पश्चिम बंगाल में बदले सियासी माहौल और बीजेपी सरकार के बनने के लगभग दो दशक बाद कोलकाता वापसी कर रही हैं।  तसलीमा 1 अगस्त को वे शहर में एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी। 2007 में उनकी किताब श्द्विखंडितोश् को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद उन्हें वह शहर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था, जिसे उन्होंने बांग्लादेश से निर्वासन के बाद अपना घर मान लिया था। सेक्युलर मिशन के उस्मान मलिक ने बताया, कोलकाता भारत की सांस्कृतिक राजधानी है। कट्टरपंथियों के विरोध के कारण तसलीमा को यहां से भगा दिया गया था, जिसका हमें गहरा दुख है। हमने पिछली सरकार के कार्यकाल में भी उनके दौरे की योजना बनाई थी, लेकिन हम सफल नहीं हो सके।मलिक ने आगे कहा, इस बार हमने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से संपर्क किया, जिन्होंने सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था का पूरा भरोसा दिया। इसके बाद लेखिका ने भी कोलकाता आने पर सहमति जता दी। कार्यक्रम में तसलीमा अपने निर्वासन के दिनों और कोलकाता छोड़ने के हालातों पर खुलकर बात करेंगी।

बता दें तसलीमा नसरीन का लेखन हमेशा से महिला अधिकारों, लैंगिक समानता और पितृसत्तात्मक हिंसा पर केंद्रित रहा है। 1993 में आए उनके उपन्यास लज्जा ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, लेकिन जान से मारने की धमकियों के बाद 1994 में उन्हें बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। स्वीडन की नागरिकता के साथ यूरोप में रहने के बाद उन्होंने अपनी संस्कृति के करीब होने के चलते कोलकाता में शरण ली। हालात तब बिगड़े जब 2003 में उनकी आत्मकथा का दूसरा भाग द्विखंडितो प्रकाशित हुआ। इस किताब के कुछ हिस्सों को धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला माना गया। 2003 में ही कवि सैयद हसमत जलाल के मानहानि मुकदमे के बाद, बुद्धदेब भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने के डर से इस पर बैन लगा दिया। हालांकि 2005 में हाई कोर्ट ने बैन हटा लिया था।

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