ONOE के लिये अनुराग ठाकुर का लखनऊ में ब्यूरोक्रेट्स के साथ मंथन

 ONOE के लिये अनुराग ठाकुर का लखनऊ में ब्यूरोक्रेट्स के साथ मंथन

देश में 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की व्यवस्था लागू करने की कवायद अब अंतिम दौर में पहुंचती दिख रही है। इसी सिलसिले में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक अहम बैठक हुई, जिसमें संविधान (129वां संशोधन) विधेयक-2024 पर गहन विचार-विमर्श हुआ। संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी की टीम स्टडी विजिट के तहत लखनऊ पहुंची और यहां प्रदेश के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों के साथ लंबी बैठक की। इस बैठक की अगुवाई भाजपा के वरिष्ठ सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने की, जो इस समिति के अहम सदस्य भी हैं। गौरतलब है कि यह जेपीसी 31 सदस्यों की एक बड़ी समिति है, जिसमें लोकसभा से 21 और राज्यसभा से 10 सांसद शामिल हैं। समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी हैं और इसमें प्रियंका गांधी वाड्रा, मनीष तिवारी, सुखदेव भगत जैसे विपक्षी नेता भी शामिल हैं। समिति का काम पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की व्यवहारिकता और उससे जुड़ी चुनौतियों का आकलन करना है। इससे पहले समिति गोवा जैसे छोटे राज्य का दौरा कर चुकी है, जहां मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष से चर्चा की गई थी। अब उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य में आकर समिति ने प्रशासनिक स्तर की जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश की, क्योंकि यूपी की चुनावी प्रक्रिया देश में सबसे जटिल मानी जाती है।

लखनऊ की इस बैठक में उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मुख्य रूप से हिस्सा लिया। इसके अलावा अमृत अभिजात, संजय प्रसाद, दीपक कुमार और अमित कुमार घोष जैसे वरिष्ठ आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने भी अपने-अपने विभागों से जुड़े सुझाव समिति के सामने रखे। बैठक में सुरक्षा बलों की तैनाती, चुनावी लॉजिस्टिक, मतदान केंद्रों के प्रबंधन और आचार संहिता से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। अधिकारियों ने बताया कि यूपी जैसे विशाल राज्य में एक साथ चुनाव कराने के लिए सुरक्षा बलों और ईवीएम मशीनों की उपलब्धता को लेकर पहले से ठोस योजना बनानी होगी।बैठक को संबोधित करते हुए अनुराग ठाकुर ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में पांच साल के दौरान देश के किसी न किसी हिस्से में बार-बार आदर्श आचार संहिता लागू होती रहती है, जिससे शासन व्यवस्था और विकास परियोजनाओं की रफ्तार पर सीधा असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी और संसाधन चुनावी ड्यूटी में उलझे रहते हैं, जिसका खामियाजा प्रशासनिक कामकाज को भुगतना पड़ता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जेपीसी अभी अंतिम रिपोर्ट को लेकर जल्दबाजी में नहीं है, बल्कि सभी राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से सुझाव लेने के बाद ही रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जाएगा।

अब तक के परामर्श अभियान के आंकड़े भी काफी दिलचस्प हैं। समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी के मुताबिक, अब तक हुई बैठकों में शामिल करीब 99 प्रतिशत लोगों, संगठनों और विशेषज्ञों ने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के प्रस्ताव का समर्थन किया है। यही वजह है कि समिति का लक्ष्य साल 2029 के लोकसभा चुनाव तक इस व्यवस्था को अमल में लाने का है। इससे पहले जब यह विधेयक लोकसभा में पेश किया गया था, तब सदन में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक डिविजन के जरिए मतदान हुआ था। पहले दौर में विधेयक के पक्ष में 220 और विपक्ष में 149 वोट पड़े थे, लेकिन दोबारा हुई वोटिंग में पक्ष में 269 और विपक्ष में 198 वोट दर्ज हुए।आर्थिक नजरिए से देखें तो जेपीसी के अनुमान बेहद चौंकाने वाले हैं। समिति का आकलन है कि लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव एक साथ कराने से देश को करीब 7 लाख करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। साथ ही इससे भारत की जीडीपी ग्रोथ में करीब 1.6 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी होने का अनुमान भी लगाया गया है। यह आंकड़ा इसलिए भी अहम है क्योंकि साल 2024 के आम चुनाव को दुनिया के सबसे महंगे चुनाव के तौर पर दर्ज किया गया, जिसमें करीब 1.35 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए थे। बार-बार चुनाव कराने में सुरक्षा बलों की तैनाती से लेकर मतदान कर्मियों की ड्यूटी, ईवीएम की व्यवस्था और प्रचार तंत्र तक हर स्तर पर भारी सरकारी संसाधन खर्च होते हैं, जिनकी बचत एक साथ चुनाव कराने से संभव मानी जा रही है।

दिलचस्प बात यह भी है कि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने जो शुरुआती रिपोर्ट तैयार की थी, उसकी तैयारी में सरकार का खर्च महज करीब 95 हजार रुपये आया था, जबकि इसी रिपोर्ट के आधार पर आज लाखों करोड़ रुपये की बचत का खाका खींचा जा रहा है। यह आंकड़ा बताता है कि किस तरह एक छोटी सी शुरुआती कवायद देश की चुनावी व्यवस्था में बड़े बदलाव की बुनियाद बन सकती है।बैठक के अंत में अनुराग ठाकुर ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों की सक्रिय भागीदारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि यूपी जैसे विशाल और जटिल राज्य में चुनाव कराना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है, लेकिन यहां के अधिकारियों ने जिस रचनात्मक तरीके से अपने सुझाव रखे, वह समिति के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' सहकारी संघवाद की भावना से ही सफल हो सकता है, यानी केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल के बिना इसे अमल में लाना संभव नहीं है। अब सबकी निगाहें 17 जुलाई को होने वाली जेपीसी की बैठक पर टिकी हैं, जिसमें समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट को स्वीकृति देने की तैयारी में है। इसके बाद यह रिपोर्ट संसद में पेश की जाएगी, जिसमें उत्तर प्रदेश सहित देशभर से मिले सुझावों को शामिल किया जाएगा। लखनऊ की यह बैठक इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है, क्योंकि देश के सबसे बड़े राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था का समर्थन 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की राह को कहीं ज्यादा मजबूत बना सकता है।

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