यूपी की सियासत में ई-20 पेट्रोल बना नया दांव


यूपी की सियासत में ई-20 पेट्रोल बना नया दांव

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुद्दे अक्सर सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था और जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं, लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल यानी ई-20 नई राजनीतिक बहस बनकर उभर रहा है। सोशल मीडिया पर कुछ वाहन चालकों द्वारा इंजन, माइलेज और मेंटेनेंस को लेकर उठाई जा रही शिकायतों ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस इसे आम उपभोक्ता की जेब और वाहन सुरक्षा का सवाल बता रही हैं, जबकि भाजपा इसे किसानों की आय, ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत से जोड़कर देख रही है। यही वजह है कि ई-20 अब केवल ईंधन नीति नहीं, बल्कि चुनावी विमर्श का हिस्सा बन चुका है।असल में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है। इसकी शुरुआत एक दशक पहले हुई थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसकी रफ्तार तेज हुई। वर्ष 2013-14 में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण महज 1.5 प्रतिशत के आसपास था। सरकार ने 2030 तक 20 प्रतिशत मिश्रण का लक्ष्य रखा था, जिसे बाद में आगे बढ़ाकर 2025-26 कर दिया गया और अब देश औसतन 20 प्रतिशत मिश्रण के स्तर तक पहुंच चुका है। सरकार का दावा है कि इस पूरी नीति से 2014-15 के बाद से 1.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बची, लगभग 310 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल का आयात कम हुआ, करीब 930 लाख मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन घटा और किसानों को 1.60 लाख करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त भुगतान मिला।

यही आंकड़े भाजपा के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी लगातार कह रहे हैं कि यदि किसी की गाड़ी केवल ई-20 की वजह से खराब हुई हो तो वह सामने लाकर दिखाए। उनका दावा है कि मक्के से एथेनॉल उत्पादन बढ़ने के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों की आय में लगभग 45 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त बढ़ोतरी हुई तथा मक्के का बाजार भाव लगभग 1,200 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 2,800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया। भाजपा नेताओं का कहना है कि एथेनॉल केवल गन्ने से नहीं बल्कि मक्का, टूटे चावल और अन्य कृषि उत्पादों से भी बनता है, इसलिए यह सीधे किसानों की आय से जुड़ा हुआ है।लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष का तर्क बिल्कुल अलग है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को एक साथ जोड़कर सरकार को घेर रहे हैं। उनका आरोप है कि मक्का खरीद में बड़ी कंपनियों और प्रभावशाली लोगों की भूमिका से किसानों को वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा। साथ ही कई वाहन मालिकों की शिकायतों का हवाला देते हुए वह दावा कर रहे हैं कि ई-20 पेट्रोल से माइलेज घट रहा है और रखरखाव का खर्च बढ़ रहा है। कांग्रेस भी इसी लाइन पर आगे बढ़ रही है। उसका कहना है कि यदि सभी वाहन ई-20 के अनुरूप नहीं हैं तो उपभोक्ताओं को विकल्प मिलना चाहिए। पुरानी गाड़ियों के मालिकों को बिना विकल्प के नया ईंधन देने का फैसला उचित नहीं माना जा सकता।

यही वह बिंदु है जहां चुनावी राजनीति और तकनीकी बहस एक-दूसरे से टकराती दिखाई देती है। ऑटोमोबाइल उद्योग और सरकार का दावा है कि वर्षों के परीक्षण के बाद ई-20 लागू किया गया है और बड़े पैमाने पर किसी इंजन क्षति के प्रमाण नहीं मिले हैं। हालांकि उद्योग यह भी स्वीकार करता है कि एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होने के कारण माइलेज में लगभग 3 से 3.5 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है, लेकिन इसे इंजन खराब होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर वायरल हो रही कई शिकायतों की जांच के बाद भी सरकार और वाहन निर्माता कंपनियां ई-20 को सुरक्षित बता रही हैं।दरअसल उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस मुद्दे की अहमियत इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि राज्य देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक है और मक्का उत्पादन भी लगातार बढ़ रहा है। यदि एथेनॉल उद्योग का विस्तार होता है तो चीनी मिलों, डिस्टिलरियों और कृषि बाजार को सीधा फायदा मिल सकता है। दूसरी ओर प्रदेश में करोड़ों ऐसे दोपहिया और चारपहिया वाहन भी हैं जो कई वर्ष पुराने हैं। यदि उनके मालिकों के बीच यह धारणा मजबूत होती है कि ई-20 से माइलेज घट रहा है या खर्च बढ़ रहा है, तो विपक्ष इसे चुनावी मुद्दे में बदलने की पूरी कोशिश करेगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह किसानों और वाहन उपभोक्ताओं के बीच संतुलन कैसे बनाए। यदि वह केवल ई-20 का विरोध करता है तो भाजपा इसे किसान विरोधी अभियान बताकर पलटवार करेगी। वहीं यदि वह केवल उपभोक्ताओं की बात करेगा तो ग्रामीण इलाकों में उसका संदेश कमजोर पड़ सकता है। भाजपा भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं है, क्योंकि यदि लोगों में यह धारणा बनी कि उन्हें महंगा ईंधन मिल रहा है और उसका असर वाहन पर पड़ रहा है, तो इसका राजनीतिक असर भी हो सकता है।इसी बीच सरकार ई-20 के बाद भविष्य में ई-25 और उच्च मिश्रण वाले ईंधन की दिशा में भी तैयारी कर रही है, हालांकि केंद्र का कहना है कि अगला कदम वाहन कंपनियों के साथ व्यापक परीक्षण और वैज्ञानिक मूल्यांकन के बाद ही उठाया जाएगा। हाल के दिनों में कुछ वाहन कंपनियों ने भी उच्च मिश्रण लागू करने में जल्दबाजी नहीं करने की सलाह दी है।उत्तर प्रदेश के चुनावी परिदृश्य में फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है। एक तरफ भाजपा किसानों की बढ़ी आय, विदेशी मुद्रा बचत और ऊर्जा आत्मनिर्भरता के आंकड़े सामने रख रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष उपभोक्ता हित, पुराने वाहनों और बढ़ती लागत का सवाल उठा रहा है। आने वाले महीनों में यह बहस केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि गांव की चौपाल, शहर के गैराज, किसान मंडी और चुनावी मंचों तक पहुंचेगी। आखिरकार फैसला आंकड़ों से कम और मतदाताओं के अनुभव से ज्यादा तय होगा। यदि सरकार लोगों को भरोसा दिलाने में सफल रहती है कि E20 से दीर्घकालिक लाभ अधिक हैं तो विपक्ष की रणनीति कमजोर पड़ सकती है। लेकिन यदि वाहन चालकों की शिकायतें लगातार बढ़ती रहीं और उनका समाधान समय पर नहीं हुआ, तो यही मुद्दा 2027 के चुनाव में एक नए राजनीतिक नैरेटिव की नींव भी बन सकता है।


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