ओवैसी के बदले सुरों के पीछे छिपा है यूपी का चुनावी दांव

 ओवैसी के बदले सुरों के पीछे छिपा है यूपी का चुनावी दांव

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी मौसम जितना करीब आता है, नेताओं की भाषा और रणनीति उतनी ही बदलती दिखाई देती है। लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव से पहले एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं, वह केवल चुनावी बयानबाजी नहीं बल्कि लंबी राजनीतिक तैयारी का संकेत देती है। बिजनौर की सभा में उन्होंने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर सबसे तीखे हमले किए। समाजवाद को "यादववाद" तक सीमित बताया, पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे पर सवाल उठाए, 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों की याद दिलाई और मुस्लिम नेतृत्व की अनदेखी का आरोप लगाया। लेकिन भाषण समाप्त होने से पहले उन्होंने यह भी कह दिया कि यदि सम्मानजनक भागीदारी मिले तो भाजपा को हराने के लिए एआईएमआईएम विपक्षी गठबंधन में शामिल होने को तैयार है। पहली नजर में यह विरोधाभास लगता है, लेकिन अगर पिछले डेढ़ दशक की राजनीति की कड़ियों को जोड़कर देखा जाए तो यह विरोधाभास नहीं बल्कि ओवैसी की सबसे बड़ी राजनीतिक मजबूरी और सबसे बड़ी रणनीति दोनों है। दरअसल, ओवैसी की राजनीति को समझने के लिए केवल उत्तर प्रदेश नहीं बल्कि बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र और तेलंगाना तक जाना पड़ेगा। 2014 के बाद भाजपा जिस तरह राष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी, उसके बाद विपक्ष की राजनीति का पूरा ढांचा बदल गया। पहले क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में स्वतंत्र लड़ाई लड़ते थे, लेकिन अब भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन की राजनीति मजबूरी बन गई। दूसरी ओर मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा वर्ग भी "जीतने वाले विपक्ष" के साथ रणनीतिक मतदान करने लगा। इसका सबसे बड़ा असर एआईएमआईएम जैसी पार्टियों पर पड़ा।

ओवैसी का दावा हमेशा रहा कि मुसलमान केवल वोट देने की मशीन नहीं हैं, उन्हें राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व भी मिलना चाहिए। लेकिन हर चुनाव में उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो गया कि अगर एआईएमआईएम चुनाव लड़ती है तो क्या उसका फायदा भाजपा को होगा? यही सवाल उनकी पूरी राजनीति पर सबसे बड़ा बोझ बन गया।उत्तर प्रदेश में यह सवाल और बड़ा हो जाता है क्योंकि यहां मुस्लिम आबादी करीब 19 प्रतिशत है। राज्य के 75 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता 30 प्रतिशत से ज्यादा हैं, जबकि करीब 140 सीटों पर उनका प्रभाव इतना है कि वे चुनावी नतीजे बदल सकते हैं। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और भाजपा चारों दल मुस्लिम मतदाताओं की राजनीतिक दिशा पर लगातार नजर रखते हैं। 2012 में जब अखिलेश यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने तो समाजवादी पार्टी को मुस्लिम-यादव गठजोड़ का सबसे बड़ा लाभ मिला था। लेकिन 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति बदल दी। दंगों के बाद सामाजिक ध्रुवीकरण इतना बढ़ा कि 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीत लीं। उसके बाद 2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 312 सीटों का ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया। 2022 में भी भाजपा गठबंधन 273 सीटों के साथ सत्ता में लौटा। यानी मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी के साथ रहने के बावजूद भाजपा लगातार चुनाव जीतती रही।

यहीं से ओवैसी अपने राजनीतिक तर्क की शुरुआत करते हैं। उनका कहना है कि यदि मुस्लिम समाज पूरी तरह किसी एक पार्टी को वोट देता है और फिर भी सत्ता नहीं बदलती तो केवल "भाजपा को रोकने" की राजनीति कब तक चलेगी? वह बार-बार राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल उठाते हैं। यही कारण है कि उन्होंने हाल की सभाओं में मुख्यमंत्री पद से लेकर प्रशासनिक भागीदारी तक कई मुद्दों को सामने रखा।हालांकि ओवैसी के इस तर्क का दूसरा पक्ष भी है। विपक्षी दलों का कहना है कि भारत की चुनावी व्यवस्था में वोटों का थोड़ा-सा बंटवारा भी कई सीटों पर हार-जीत तय कर देता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव माना जाता है। सीमांचल में एआईएमआईएम ने पांच सीटें जीत लीं। किशनगंज, अमौर, जोकीहाट, बहादुरगंज और कोचाधामन जैसे इलाकों में पार्टी ने मजबूत प्रदर्शन किया। लेकिन इसके बाद राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि करीब दर्जनभर सीटों पर एआईएमआईएम को मिले वोटों के कारण महागठबंधन सरकार बनाने से चूक गया। राजनीतिक विश्लेषकों ने कई सीटों पर हार का अंतर और एआईएमआईएम के वोटों का तुलनात्मक अध्ययन भी किया। हालांकि एआईएमआईएम ने हमेशा कहा कि उसने किसी का वोट नहीं काटा बल्कि अपना जनाधार बनाया।

इसके बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव आया। वहां भी ममता बनर्जी और कांग्रेस ने यही आरोप दोहराया कि ओवैसी की सक्रियता का सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। हालांकि एआईएमआईएम चुनावी सफलता हासिल नहीं कर सकी, लेकिन "भाजपा की बी टीम" वाला आरोप और मजबूत हो गया।यही वह दौर था जब ओवैसी को पहली बार महसूस हुआ कि केवल मुस्लिम असंतोष के सहारे राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाना आसान नहीं होगा। जब तक विपक्ष उन्हें स्वीकार नहीं करेगा, तब तक वह बड़े राज्यों में सीमित प्रभाव वाली पार्टी बने रहेंगे। शायद यही कारण है कि पिछले दो वर्षों में उनकी भाषा पहले जैसी आक्रामक नहीं रही। अब वह विपक्ष की आलोचना जरूर करते हैं लेकिन गठबंधन का रास्ता भी खुला रखते हैं।बिजनौर की सभा में उन्होंने अखिलेश यादव पर सबसे ज्यादा हमला पीडीए फॉर्मूले को लेकर किया। समाजवादी पार्टी पिछले दो वर्षों से पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। लोकसभा चुनाव में इसी रणनीति का असर भी दिखाई दिया। भाजपा का सीट आंकड़ा घटा और समाजवादी पार्टी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। लेकिन ओवैसी का तर्क है कि पीडीए का नारा केवल चुनावी मंचों तक सीमित है, वास्तविक राजनीतिक हिस्सेदारी अब भी सीमित वर्ग के हाथ में है।उन्होंने जिस तरह मोहन यादव का उदाहरण दिया, वह भी केवल एक बयान नहीं था। उसके जरिए वह यह संदेश देना चाहते थे कि समाजवादी पार्टी की राजनीति में जातीय समीकरण अब भी सबसे ऊपर हैं। मुस्लिम नेतृत्व को बराबरी का स्थान नहीं दिया जा रहा।लेकिन अगर ओवैसी वास्तव में समाजवादी पार्टी को इतना ही कमजोर मानते हैं तो फिर गठबंधन की बात क्यों करते हैं?

उत्तर प्रदेश में एआईएमआईएम का संगठन अभी भी सीमित है। 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी लगभग सौ सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में थी, लेकिन अंततः बहुत कम सीटों पर प्रभावी मुकाबला कर सकी। उसे राज्यव्यापी वोट प्रतिशत भी एक फीसदी से कम मिला। इसका मतलब साफ था कि केवल मुस्लिम वोटों के भरोसे पार्टी उत्तर प्रदेश में बड़ा राजनीतिक आधार नहीं बना सकती।दूसरी ओर समाजवादी पार्टी की भी मजबूरी कम नहीं है। वह जानती है कि यदि एआईएमआईएम को गठबंधन में जगह देती है तो भाजपा इसे मुस्लिम तुष्टिकरण का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना देगी। साथ ही मुस्लिम समाज के भीतर एक वैकल्पिक नेतृत्व भी खड़ा हो सकता है, जो भविष्य में समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती बन जाएगा। इसलिए सपा के लिए ओवैसी को साथ लेना जितना मुश्किल है, उतना ही उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।यही वजह है कि ओवैसी की मौजूदा राजनीति दो समानांतर रास्तों पर चल रही है। पहला रास्ता मुस्लिम समाज के भीतर यह संदेश देना है कि एआईएमआईएम ही उनकी राजनीतिक आवाज बन सकती है। दूसरा रास्ता विपक्षी दलों पर दबाव बनाना है कि यदि भाजपा को हराना है तो एआईएमआईएम को बराबरी की भागीदारी देनी होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी अब केवल 2027 का चुनाव नहीं लड़ रहे। वह 2032 और उसके बाद की राजनीति की नींव भी रख रहे हैं। उनका लक्ष्य अभी सत्ता हासिल करना नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के उन इलाकों में स्थायी संगठन तैयार करना है जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रोहिलखंड, तराई और पूर्वांचल में लगातार सभाएं इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं।इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि ओवैसी और समाजवादी पार्टी दोनों एक-दूसरे को राजनीतिक नुकसान पहुंचाने की स्थिति में भी नहीं हैं और पूरी तरह साथ आने की स्थिति में भी नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे के वोट बैंक पर नजर रखे हुए हैं। दोनों भाजपा को चुनौती देना चाहते हैं, लेकिन दोनों ही मुस्लिम नेतृत्व का केंद्र भी बनना चाहते हैं। यही संघर्ष आने वाले महीनों में और तेज होगा।इसलिए बिजनौर की सभा में ओवैसी के दो अलग-अलग संदेश दरअसल दो अलग-अलग राजनीति नहीं थे। अखिलेश यादव पर हमला उनका राजनीतिक विस्तार था, जबकि गठबंधन की पेशकश उनकी राजनीतिक जरूरत। एक तरफ वह मुस्लिम मतदाताओं को यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि एआईएमआईएम किसी के पीछे चलने वाली पार्टी नहीं है, वहीं दूसरी तरफ वह विपक्ष के सामने यह विकल्प भी खुला रखना चाहते हैं कि यदि सम्मानजनक समझौता हो तो भाजपा के खिलाफ साझा लड़ाई संभव है।यही कारण है कि 2027 के चुनाव की शुरुआत से पहले ओवैसी ने जो नई राजनीतिक लाइन खींची है, वह केवल एक भाषण की कहानी नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की बदलती चुनावी राजनीति, मुस्लिम नेतृत्व की नई लड़ाई, विपक्ष की मजबूरियों और भाजपा के खिलाफ बनने वाले संभावित समीकरणों की पूरी पटकथा का शुरुआती अध्याय बन चुकी है।

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