यूपी की बिसात पर 32-21 का फॉर्मूला और बदलती सियासी हवा

 

यूपी की बिसात पर 32-21 का फॉर्मूला और बदलती सियासी हवा

उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने के लिए केवल गणित की आवश्यकता नहीं होती, यहाँ की गलियों में तैरते इतिहास और समाज के उन अनकहे संघर्षों को पढ़ने की ज़रूरत होती है, जो दशकों से किसी न किसी ‘खेमे’ में बँटे रहे हैं। आज जब लखनऊ की फिजाओं में फिर से राजनीतिक सरगर्मियाँ बढ़ रही हैं, तो चर्चा का केंद्र बना है 32 और 21 का वो नया ‘केमिस्ट्री फॉर्मूला’, जिसके सहारे इंडिया गठबंधन की धुरी माने जाने वाले राहुल गांधी और अखिलेश यादव सत्ता के सबसे बड़े गढ़ को फतह करने का ख्वाब देख रहे हैं। यह महज दो दलों का मिलन नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की उस जटिल सामाजिक बुनावट को फिर से साधने की कोशिश है, जिसे पिछले एक दशक में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी ‘लाभार्थी राजनीति’ और सोशल इंजीनियरिंग के चक्रव्यूह से पूरी तरह बदल दिया था। लेकिन क्या सपा का 32 फीसदी का आधार और कांग्रेस की दलितों में खोई हुई उम्मीद 21 फीसदी की बैसाखी बनकर भाजपा के उस किले को ढहा पाएगी, जिसे पिछले दो चुनावों में कोई भी भेद नहीं सका?

2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि उत्तर प्रदेश का मतदाता अब केवल पारंपरिक ढर्रे पर वोट नहीं दे रहा। समाजवादी पार्टी का वोट शेयर 33 फीसदी के करीब पहुँचना यह दर्शाता है कि अखिलेश यादव ने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का जो नारा दिया था, उसने यादव-मुस्लिम समीकरण से बाहर निकलकर गैर-यादव पिछड़ी जातियों के एक बड़े तबके को अपनी ओर आकर्षित किया है। लेकिन राजनीति का कड़वा सच यह भी है कि सपा की जड़ें आज भी यादव और मुस्लिम समुदाय में ही सबसे गहरी हैं। सपा के लिए चुनौती यह है कि वह 32 फीसदी के उस आंकड़े को 40 के पार कैसे ले जाए, क्योंकि बिना उच्च जातियों या बड़ी संख्या में गैर-यादव ओबीसी के समर्थन के, भाजपा के ‘विस्तृत आधार’ को हराना किसी पहाड़ तोड़ने जैसा है। वहीं दूसरी ओर, राहुल गांधी की सक्रियता कांग्रेस की उस पुरानी यादों को ताजा कर रही है, जब यूपी की 21 फीसदी दलित आबादी का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ खड़ा होता था। काशीराम के उदय के बाद यह वोट बैंक बसपा के पास गया और फिर पिछले दस वर्षों में भाजपा के ‘हिंदुत्व प्लस वेलफेयर’ मॉडल के चलते एक बड़ा हिस्सा भगवा रंग में रंगा गया।

अब सवाल यह उठता है कि क्या यह 32 और 21 का संगम धरातल पर संभव है? यहाँ इतिहास और वर्तमान का एक गहरा टकराव है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल में दलित और यादव समुदायों के बीच का सामाजिक तनाव एक ऐसी वास्तविकता है, जिसे नजरअंदाज करना विपक्ष के लिए महंगा पड़ सकता है। सालों से पंचायत और गांव की राजनीति में एक-दूसरे के आमने-सामने रहने वाले इन समुदायों को एक ही छतरी के नीचे लाना किसी राजनीतिक जादू से कम नहीं होगा। सपा पर अक्सर ‘यादववाद’ का आरोप लगता रहा है, जिसे भाजपा ने अपने प्रचार अभियानों में एक बड़े ‘गुंडाराज’ के विमर्श के रूप में पेश किया है। कांग्रेस ने अपनी रणनीति में यह सावधानी बरती है कि दलित सीधे सपा के साथ जाने में हिचक न महसूस करें, इसलिए वह एक ‘बफर’ के तौर पर खुद को पेश कर रही है। राहुल गांधी दलित बस्तियों में जाकर जिस तरह का संदेश दे रहे हैं संविधान की रक्षा और आरक्षण की मजबूती वह सीधे भाजपा के उस लाभार्थी वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास है, जिसे मोदी सरकार ने पिछले दस सालों में मुफ्त राशन, पक्के मकान, शौचालय और उज्ज्वला गैस जैसी योजनाओं से बांधा है।

भाजपा का सोशल इंजीनियरिंग मॉडल इतना सूक्ष्म है कि उसने जातिगत पहचान को लाभार्थी पहचान के नीचे दबा दिया है। अंबेडकर और रविदास जैसे महापुरुषों की जयंती को सरकारी स्तर पर मनाना और उन स्थलों का कायाकल्प करना यह केवल प्रतीकवाद नहीं है, बल्कि उस दलित मानस को सम्मान देने की कोशिश है जो बसपा के दौर में महसूस होता था। भाजपा ने ‘समरसता सहभोज’ और ‘दलित संपर्क अभियानों’ के जरिए उस खाई को पाटने का काम किया है जो कभी समाज के निचले पायदान पर खड़े लोगों के बीच थी। आज का दलित वोटर यह देखता है कि उसे सरकारी योजनाएं बिना किसी बिचौलिए के मिल रही हैं। जब आप 21 फीसदी के गणित की बात करते हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि दलित समाज एक ब्लॉक नहीं है। इसमें जाटव, पासी, वाल्मीकि, कोरी और धोबी जैसी अनेक उपजातियां हैं, जिनका राजनीतिक व्यवहार अलग-अलग है। बसपा का आधार जरूर कमजोर हुआ है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसका वोट बैंक खाली पड़ा है। वह वोट अब बिखर गया है, और उसे वापस समेटना एक बहुत बड़े विश्वास के निर्माण की मांग करता है।

इतिहास गवाह है कि यूपी में जब भी किसी बड़े बदलाव की आहट हुई है, उसमें विकास की चर्चा हमेशा हावी रही है। आज का युवा वोटर, चाहे वह किसी भी जाति से हो, यह भी तौल रहा है कि कानून-व्यवस्था की स्थिति क्या है, रोजगार के क्या अवसर हैं और महंगाई की मार कितनी गहरी है। केवल जाति का गणित कागजों पर जीत तो दिला सकता है, लेकिन मैदान में उतरने के लिए ठोस कार्यक्रमों की जरूरत होती है। सपा और कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि उनका गठबंधन केवल ‘मोदी विरोध’ के लिए नहीं है, बल्कि उनके पास यूपी के उस नौजवान के लिए एक विजन है जो भविष्य की ओर देख रहा है। 32-21 का फॉर्मूला एक मजबूत शुरुआत हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या ये दोनों दल अपनी पुरानी इमेज से बाहर निकलकर एक नया विश्वास पैदा कर पाते हैं। उत्तर प्रदेश की सियासत अब उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ धारणाएं वास्तविकता को पीछे छोड़ देती हैं। बीजेपी का संगठन तंत्र आज भी यूपी में सबसे मजबूत है, उनके पास कार्यकर्ताओं की ऐसी फौज है जो हर बूथ पर लाभार्थी से सीधा जुड़ाव रखती है।

अत: अंत में यही कहा जा सकता है कि यूपी के इन ‘दो लड़कों’ की राह इतनी आसान नहीं है। एक तरफ भाजपा का आधुनिक सोशल इंजीनियरिंग का चक्रव्यूह है, तो दूसरी तरफ दशकों से चले आ रहे सामाजिक समीकरणों का जंजाल। राहुल गांधी की यात्राएं और अखिलेश यादव का पीडीए मंत्र एक नई ऊर्जा तो पैदा कर रहे हैं, लेकिन चुनावी महासंग्राम में जीत उसी की होगी जो वोटर के केवल वोट बैंक के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के रूप में सम्मान और उम्मीद को समझेगा। 32 और 21 का यह योग अगर अपनी सीमाओं को तोड़कर 50 के करीब नहीं पहुँचता, तो भाजपा के मजबूत किलों को हिलाना किसी भी गठबंधन के लिए सपना ही बना रहेगा। यूपी की जनता अब यह देख रही है कि वादों के झोले में क्या है और भविष्य के रास्ते में कौन सा साथी अधिक भरोसेमंद है। आने वाले दिन न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश की सत्ता की दिशा तय करने वाले होंगे, जहाँ हर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा।

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