यूपी में तावड़े की एंट्री, क्या बीजेपी 2027 में फिर दोहराएगी इतिहास?

 

 यूपी में तावड़े की एंट्री, क्या बीजेपी 2027 में फिर दोहराएगी इतिहास? 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी नेता को चुनाव प्रभारी बनाना सिर्फ संगठनात्मक नियुक्ति नहीं होता, खासकर तब जब सामने 403 विधानसभा सीटों वाला ऐसा राज्य हो, जहां एक वोट का रुख सत्ता और विपक्ष के बीच पूरा गणित बदल सकता है। बीजेपी ने राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े को 2027 विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाकर संकेत दे दिया है कि अगली लड़ाई को पार्टी सिर्फ नारों से नहीं, संगठन और सामाजिक समीकरणों की बारीक इंजीनियरिंग से लड़ना चाहती है। उनके साथ जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह-प्रभारी बनाया गया है। सवाल इसलिए बड़ा है कि क्या तावड़े वह काम कर पाएंगे, जो एक दशक पहले अमित शाह ने किया था?2014 में अमित शाह जब उत्तर प्रदेश आए थे, तब बीजेपी के सामने लंबा राजनीतिक सूखा था। 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यूपी में केवल 10 सीटें मिली थीं। 2012 विधानसभा चुनाव में पार्टी 47 सीटों पर सिमट गई थी। लेकिन 2014 में तस्वीर पलट गई। बीजेपी ने 71 लोकसभा सीटें जीतीं और अपना दल के साथ एनडीए 73 तक पहुंच गया। वोट शेयर करीब 42 फीसदी रहा। 2017 में इसी संगठनात्मक मॉडल ने विधानसभा में 312 सीटों का विस्फोटक नतीजा दिया। यह केवल मोदी लहर नहीं थी। बूथ प्रबंधन, गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित, सवर्ण और छोटे सामाजिक समूहों को एक बड़े राजनीतिक गठजोड़ में जोड़ना उस जीत की असली ताकत थी।

दस साल बाद वही समीकरण दरक चुका है। 2022 में बीजेपी ने 255 सीटें जीतकर सरकार तो बचा ली, लेकिन 2017 के 312 के मुकाबले 57 सीटों का नुकसान हुआ। फिर 2024 लोकसभा चुनाव ने चेतावनी को खतरे की घंटी में बदल दिया। बीजेपी यूपी में 33 सीटों पर रह गई, जबकि समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गई। कांग्रेस को छह सीटें मिलीं। बीजेपी का वोट शेयर लगभग 41 फीसदी रहा, यानी पार्टी का मूल आधार गायब नहीं हुआ, लेकिन वोट को सीट में बदलने की क्षमता कमजोर हुई। यही वह दरार है, जिसे 2027 से पहले भरना तावड़े की पहली परीक्षा है।अखिलेश यादव ने 2024 में पीडीए की राजनीति को नारे से चुनावी गठजोड़ में बदलने की कोशिश की। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक को एक साझा राजनीतिक पहचान देने की रणनीति ने बीजेपी के उस सामाजिक विस्तार को चुनौती दी, जिसे शाह के दौर में तैयार किया गया था। खासकर गैर-यादव ओबीसी और कुछ दलित समूहों में बीजेपी के खिलाफ मतदान बढ़ा। अब तावड़े के सामने सिर्फ यादव वोट को रोकने की चुनौती नहीं है। असली सवाल यह है कि कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, सैनी, निषाद, राजभर, पाल, लोधी और दूसरी पिछड़ी जातियों के बीच बीजेपी अपनी पुरानी पकड़ कितनी मजबूत कर पाती है। दलितों में भी गैर-जाटव समूहों तक पहुंच दोबारा बनानी होगी।

यहीं तावड़े की राजनीतिक शैली महत्वपूर्ण हो जाती है। वह भाषणों के आक्रामक चेहरे से ज्यादा संगठन के शांत रणनीतिकार माने जाते हैं। एबीवीपी से निकले तावड़े ने संगठन के कई स्तरों पर काम किया है। महाराष्ट्र में पार्टी संगठन संभालने का अनुभव और बिहार चुनाव में माइक्रो-मैनेजमेंट की भूमिका ने उन्हें चुनावी मशीनरी चलाने का अनुभव दिया है। उनका तरीका सुर्खियां बनाने से ज्यादा सीट, बूथ और कार्यकर्ता की रिपोर्ट पढ़ने वाला है। यूपी जैसे राज्य में यही शैली निर्णायक हो सकती है, क्योंकि यहां लखनऊ की राजनीति और गांव के बूथ का गणित अक्सर अलग होता है।लेकिन तावड़े के सामने सबसे मुश्किल काम बीजेपी के भीतर है। दस साल की सत्ता के बाद पार्टी के पास सरकार की उपलब्धियां हैं, मगर स्थानीय नाराजगी भी है। कई विधायकों के खिलाफ असंतोष, टिकट के दावेदारों की लंबी कतार और संगठन में गुटबाजी चुनाव के समय खुलकर सामने आ सकती है। 403 सीटों में उम्मीदवार चयन की एक गलती सिर्फ एक सीट नहीं बिगाड़ती; वह आसपास की सीटों पर भी बगावत और जातीय ध्रुवीकरण पैदा कर सकती है। इसलिए तावड़े को सबसे पहले पार्टी के भीतर चुनाव लड़ने की इच्छा को पार्टी के पक्ष में वोट में बदलना होगा।

दूसरी चुनौती योगी सरकार और केंद्रीय नेतृत्व के बीच राजनीतिक तालमेल की है। 2027 का चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए भी बड़ा जनादेश होगा और बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के लिए भी। तावड़े को संगठन, सरकार और सहयोगी दलों के बीच ऐसी दूरी नहीं बनने देनी होगी, जिसका फायदा विपक्ष उठाए। अपना दल, निषाद पार्टी, सुभासपा और आरएलडी जैसे सहयोगियों के साथ सीट बंटवारा भी आसान नहीं होगा। हर सहयोगी केवल सीट नहीं मांगता, वह अपने सामाजिक प्रभाव के मुताबिक राजनीतिक वजन मांगता है। बिहार में गठबंधन प्रबंधन का अनुभव यहां काम आ सकता है, लेकिन यूपी का पैमाना कई गुना बड़ा है।तीसरी और सबसे खतरनाक चुनौती सत्ता विरोधी भावना है। बीजेपी के लिए 2027 में केवल हिंदुत्व का मुद्दा पर्याप्त नहीं होगा। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, पेपर लीक, युवाओं की नाराजगी, स्थानीय विकास और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ जैसे मुद्दे जातीय समीकरणों के साथ मिलकर चुनावी फैसला प्रभावित करेंगे। विपक्ष अगर इन सवालों को पीडीए के सामाजिक गठजोड़ से जोड़ देता है, तो बीजेपी का चुनावी मॉडल दबाव में आ सकता है। तावड़े को इसी वजह से हर क्षेत्र के स्थानीय मुद्दों का अलग चुनावी जवाब तैयार करना होगा।

अमित शाह से तुलना आसान है, लेकिन 2014 जैसी परिस्थितियां लौटना मुश्किल है। तब मोदी की राष्ट्रीय लहर थी, विपक्ष बिखरा हुआ था और बीजेपी पहली बार बड़े पैमाने पर गैर-पारंपरिक सामाजिक समूहों में घुस रही थी। आज बीजेपी सत्ता में है, विपक्ष 2024 के नतीजे से उत्साहित है और सामाजिक ध्रुवीकरण कहीं ज्यादा स्पष्ट है। इसलिए तावड़े अगर शाह की सफलता दोहराना चाहते हैं तो उन्हें शाह की नकल नहीं करनी होगी। उन्हें उसी सिद्धांत पर नया मॉडल बनाना होगा हर बूथ का डेटा, हर जाति का गणित, हर सीट की कमजोरी और हर कार्यकर्ता की जिम्मेदारी।2027 में बीजेपी के सामने असली मुकाबला अखिलेश यादव से ज्यादा उस धारणा से है कि क्या पार्टी का पुराना सामाजिक गठजोड़ अभी भी उतना ही मजबूत है। 2024 ने बता दिया कि करीब 41 फीसदी वोट शेयर भी 33 लोकसभा सीटों में बदल सकता है, अगर विपक्षी वोट एकजुट हो जाएं। विधानसभा चुनाव में यही गणित और खतरनाक हो सकता है। तावड़े को वोट प्रतिशत नहीं, वोट का भौगोलिक और सामाजिक वितरण बदलना होगा।इसलिए यूपी की कमान तावड़े को देना बीजेपी का सामान्य फैसला नहीं है। यह उस चुनावी मॉडल की मरम्मत का प्रयास है, जिसने 2014 और 2017 में पार्टी को अभूतपूर्व सफलता दी थी। अगर तावड़े बूथ नेटवर्क को फिर धार देते हैं, गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों का भरोसा लौटाते हैं, सहयोगियों को साधते हैं और सत्ता विरोधी नाराजगी को उम्मीदवारों तक सीमित रखते हैं, तो बीजेपी 2027 में वापसी कर सकती है। लेकिन अगर पीडीए की पकड़ मजबूत रही और संगठन की अंदरूनी दरारें खुल गईं, तो यूपी में शाह की कहानी दोहराना आसान नहीं होगा। तावड़े के सामने चुनाव नहीं, बीजेपी के पुराने साम्राज्य को बचाने की लड़ाई है।

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