अंजना-टीचर विवाद से आगे, शिक्षा व्यवस्था के असली सवाल कौन उठाएगा


अंजना-टीचर विवाद से आगे, शिक्षा व्यवस्था के असली सवाल कौन उठाएगा

हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप के एक टीवी डिबेट में दिए गए बयान ने पूरे देश को हिला दिया है। मई 2026 के NEET-UG पेपर लीक विवाद के बीच अंजना ने कुछ लोकप्रिय YouTube टीचर्स को 'दो कौड़ी का ज्ञान' वाला और 'बड़े फ्रॉड' करार दिया, जिसके बाद खान सर, अभिनय शर्मा समेत कई ऑनलाइन शिक्षकों ने तीखा पलटवार किया और छात्रों के बीच सोशल मीडिया पर आग लग गई। यह विवाद अब सिर्फ दो पक्षों की लड़ाई नहीं रह गया है बल्कि यह हमारे परीक्षा तंत्र, रोजगार सृजन, मीडिया की भूमिका और शिक्षा की पहुंच की पूरी व्यवस्था पर गहरे सवाल उठा रहा है जिसकी समझ के लिए 2004 से अब तक के आंकड़ों और दोनों सरकारों के कार्यकाल का गहराई से विश्लेषण जरूरी है। NEET-UG 2026 की परीक्षा 3 मई को हुई थी जिसमें 22 लाख से ज्यादा छात्र शामिल हुए और कुछ दिनों बाद ही 'गेस पेपर' वायरल हुआ जिसमें 120 से ज्यादा सवाल असली पेपर से मैच कर गए, जिसके बाद CBI जांच में राजस्थान के सीकर समेत कई जगहों पर नेटवर्क पकड़ा गया और NTA ने परीक्षा रद्द करके 21 जून को दोबारा कराने का फैसला लिया। इस बीच छात्र सड़कों पर उतरे, आत्महत्या की खबरें आईं और अंजना का बयान इसी माहौल में आया जब ऑनलाइन टीचर्स छात्रों के साथ खड़े होकर सिस्टम पर सवाल उठा रहे थे।

UPA सरकार के 2004-2014 के दौरान सरकारी नौकरियों और रोजगार सृजन की स्थिति को देखें तो आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार उस दस साल में कुल करीब 2.9 करोड़ अतिरिक्त रोजगार बने थे और बेरोजगारी दर बढ़कर 4.7 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। RBI के KLEMS डेटाबेस के मुताबिक 2004 से 2014 के बीच रोजगार वृद्धि दर केवल 6 प्रतिशत रही थी जबकि मोदी सरकार में यह आंकड़ा बहुत अलग है। पेपर लीक के मामले UPA काल में भी कम नहीं थे जहां CBSE क्लास 12 अकाउंटेंसी पेपर 2006 में लीक हुआ, AIEEE 2007 में, PMT 2008 में और कई राज्य स्तर की परीक्षाओं में राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बार-बार खबरें आईं। उस समय कार्रवाई होती थी लेकिन बड़े सिस्टेमेटिक बदलाव नहीं आए और कोई राष्ट्रीय स्तर का सख्त कानून नहीं बना। मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल में 114 प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं जिनमें 2G, कोलगेट जैसे घोटालों पर खुलकर सवालों का सामना किया गया था और मीडिया उस वक्त अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्र माना जाता था हालांकि कुछ चैनलों पर सरकार के करीबी होने के आरोप लगे थे। कोचिंग इंडस्ट्री मुख्य रूप से ऑफलाइन थी जहां दिल्ली, कोटा, जयपुर जैसे शहर हब थे और YouTube या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स लगभग नदारद थे। 2010 के आसपास कोचिंग का बाजार कुछ हजार करोड़ का था और कोटा-सीकर में ऑफलाइन कोचिंग की फीस 2 से 5 लाख तक थी जबकि एक छात्र का रहने-खाने का खर्च सालाना करीब डेढ़ लाख से 3 लाख रुपये तक पहुंच जाता था।

2014 के बाद मोदी सरकार में तस्वीर पूरी तरह बदली और RBI व श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2014-2024 के बीच 17.9 करोड़ अतिरिक्त रोजगार सृजित हुए जिनमें से अकेले 2023-24 में 4.6 करोड़ नौकरियां बनीं। रोजगार वृद्धि दर 36 प्रतिशत रही जबकि UPA में सिर्फ 6 प्रतिशत थी और SSC, UPSC, रेलवे, बैंक जैसी भर्तियों की संख्या बढ़ी। लेकिन परीक्षा प्रणाली पर दबाव भी बढ़ा और 2014 से 2024 तक मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 89 से ज्यादा पेपर लीक के मामले दर्ज हुए जिनमें 21 केंद्र स्तर के थे और 48 बार दोबारा परीक्षा करानी पड़ी। NEET, UGC-NET, SSC GD, UP पुलिस कांस्टेबल जैसे बड़े एग्जाम प्रभावित हुए और BJP शासित राज्यों में भी कई मामले आए। सरकार ने 2024 में पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट लाया जिसमें पेपर लीक करने या उत्तर पुस्तिकाओं के साथ छेड़छाड़ करने पर न्यूनतम तीन साल की जेल की सजा और 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई हुई लेकिन बड़े मंत्रिस्तरीय इस्तीफे कम देखने को मिले और विपक्ष का कहना है कि 89 लीक में BJP की जिम्मेदारी ज्यादा है। सच्चाई ये है कि पेपर लीक की समस्या पुरानी है और दोनों काल में रही है लेकिन फर्क शायद स्केल और डिजिटल फैलाव का है जहां UPA में कम से कम 11 बड़े मामले दर्ज थे जबकि NDA में संख्या ज्यादा है लेकिन सरकार का दावा है कि कार्रवाई भी तेज हुई।

कोचिंग सेक्टर में 2014 के बाद विस्फोट हुआ और इंटरनेट सस्ता होने से YouTube चैनल्स की बाढ़ आ गई जहां 2014 से पहले मुट्ठी भर चैनल थे अब हजारों चैनल लाखों छात्रों को रोज पढ़ा रहे हैं। देश में YouTube चैनल्स की संख्या तेजी से बढ़कर लगभग 2.5 करोड़ तक पहुंच गई है लेकिन इनमें से केवल करीब 30 लाख चैनल ही प्रोफेशनल स्तर पर काम कर रहे हैं। PhysicsWallah जैसे ब्रांड्स ने करोड़ों का बिजनेस खड़ा किया जिसकी वैल्यूएशन करीब 2.8 अरब डॉलर है और यह देश की 101वीं यूनिकॉर्न कंपनियों में शामिल हो चुकी है। इससे ग्रामीण और गरीब छात्रों को फायदा हुआ जहां बिहार, UP, राजस्थान के गांवों से UPSC, NEET में सफलता मिली और YouTube पर सैकड़ों रुपये में पूरा कोर्स मिलता है जबकि कोटा में फीस 1.5 लाख से 2.5 लाख रुपये के बीच होती है।लेकिन क्वालिटी का सवाल भी खड़ा हुआ जहां कुछ टीचर्स सरलीकरण करते हैं, सनसनी फैलाते हैं और अंजना ने यही पकड़ा लेकिन सामान्यीकरण गलत है क्योंकि खान सर जैसे टीचर लाखों को प्रेरित करते हैं और सस्ती शिक्षा देते हैं। मीडिया की भूमिका पर बहस पुरानी है जहां कांग्रेस काल में कुछ कहते हैं कि मीडिया निष्पक्ष था क्योंकि सरकार गठबंधन वाली थी लेकिन घोटालों में भी मीडिया ने घेरा था और 2G, कोल घोटालों में कुछ चैनलों पर सरकार के करीबी होने के आरोप लगे। मोदी काल में आरोप है कि कई चैनल सरकार के प्रति नरम हैं और 'भक्त' कहकर ट्रोलिंग होती है लेकिन YouTube और सोशल मीडिया ने वैकल्पिक आवाज दी।

अंजना विवाद में टीचर्स ने कहा कि मीडिया पेपर लीक की जड़ों पर गहरी छानबीन की बजाय टीचर्स को निशाना बना रही है और दोनों सरकारों में मीडिया ने छात्रों के हक की आवाज उठाई जहां UPA में कोटा सुसाइड के मामलों पर रिपोर्टिंग हुई और मोदी काल में NEET विवाद में भी कवरेज रहा। लेकिन विश्वास की कमी बढ़ी और छात्र पूछते हैं कि लीक क्यों होता है, कार्रवाई क्यों धीमी है, सरकारी स्कूलों की हालत खराब है, शिक्षक भर्ती में देरी है, सिलेबस बोझिल है और लाखों युवा सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं पर निर्भर हैं जहां एक लीक लाखों सपनों को चूर कर देता है।अंजना ओम कश्यप का बयान इस पूरे सिस्टम की नाकामी को उजागर करता है जिसमें आंशिक सच्चाई है क्योंकि कुछ YouTube टीचर्स व्यूज के चक्कर में गलत तरीके अपनाते हैं लेकिन हजारों ईमानदार टीचर्स हैं जिन्होंने ऑफलाइन कोचिंग के महंगे मॉडल को तोड़ा और ग्रामीण भारत को शिक्षा दी। इस विवाद से शिक्षा पर नई बहस शुरू होनी चाहिए जहां ऑनलाइन-ऑफलाइन दोनों को रेगुलेट करने की जरूरत है, टीचर्स की ट्रेनिंग, कंटेंट क्वालिटी चेक, NTA जैसी संस्थाओं में सुधार, परीक्षा प्रणाली को डिजिटल और पारदर्शी बनाना, रोजगार बढ़ाने के साथ स्किल एजुकेशन पर जोर देना जरूरी है।

शिक्षा राष्ट्र का भविष्य है और अंजना का बयान चाहे जितना विवादास्पद हो लेकिन इससे चर्चा शुरू हुई जिसमें टीचर्स, मीडिया, सरकार और छात्र  सबको अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी ताकि पेपर लीक माफिया पर सख्ती, परीक्षाओं की संख्या बढ़ाने के साथ गुणवत्ता सुनिश्चित करना और छात्रों का भरोसा बनाए रखा जा सके। तभी विकसित भारत का सपना साकार हो सकेगा क्योंकि यह विवाद केवल दो पक्षों की लड़ाई नहीं बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था की जड़ों तक की चुनौतियों को उजागर करता है जिसे समझना और सुधारना अब समय की सबसे बड़ी जरूरत है। दोनों सरकारों के दौरान मीडिया ने छात्रों के हक की बात की लेकिन विश्वास की कमी बढ़ती गई और अब जरूरत है कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाई जाए, पेपर लीक माफिया पर कड़ी कार्रवाई हो और लाखों मेहनत करने वाले छात्रों के सपनों की रक्षा हो सके।

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