संकट के दौर में सुपरहीरो इंसाफ की सबसे बड़ी उम्मीद


 संकट के दौर में सुपरहीरो इंसाफ की सबसे बड़ी उम्मीद

दुनिया जब भी किसी बड़े संकट से गुजरती है, एक दिलचस्प चीज बार-बार दिखाई देती है। लोग सिर्फ समाधान नहीं खोजते, वे एक नायक भी तलाशने लगते हैं। ऐसा नायक जो कानून की सीमाओं से परे जाकर न्याय कर सके, जो डर के बीच उम्मीद जगा सके और जो यह भरोसा दिला सके कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, अंत में रोशनी लौटेगी। यही वजह है कि सुपरहीरो कभी सिर्फ कॉमिक्स के किरदार नहीं रहे। वे हर दौर के समाज की बेचैनी, डर, उम्मीद और सपनों का चेहरा बनते रहे हैं। शायद इसीलिए 90 साल बाद भी सुपरमैन, बैटमैन और स्पाइडर-मैन बूढ़े नहीं हुए। वे हर पीढ़ी के साथ फिर से जन्म लेते हैं।आधुनिक सुपरहीरो की कहानी 1938 में शुरू होती है, लेकिन उसकी जड़ें हजारों साल पुरानी हैं। जब इंसान ने पहली बार प्रकृति के सामने खुद को असहाय पाया होगा, तब उसने अपने से अधिक शक्तिशाली किसी रक्षक की कल्पना की होगी। भारत में राम, कृष्ण और हनुमान, यूनान में हरक्यूलिस और पर्सियस, मेसोपोटामिया में गिलगमेश और नॉर्स सभ्यता में थॉर जैसे नायक इसी कल्पना का विस्तार थे। इन पात्रों में अलौकिक शक्ति थी, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि वे संकट की घड़ी में समाज के साथ खड़े होते थे। आधुनिक सुपरहीरो इन्हीं मिथकीय परंपराओं का नया रूप हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वे धर्म नहीं, बल्कि आधुनिक समाज की चुनौतियों से पैदा हुए।

बीसवीं सदी की शुरुआत में दुनिया तेजी से बदल रही थी। औद्योगिक क्रांति ने शहरों को फैलाया, मशीनों ने इंसानों की जगह लेनी शुरू की, आर्थिक असमानता बढ़ी और अपराध भी पहले से ज्यादा संगठित हो गए। इसी दौर में पल्प मैगजीन और चित्रकथाओं ने ऐसे काल्पनिक नायकों की नींव रखी जो अपराधियों से लड़ते थे। लेकिन आधुनिक सुपरहीरो का असली जन्म तब हुआ, जब दुनिया खुद सबसे बड़े संकट से गुजर रही थी।1930 के दशक की महामंदी ने अमेरिका की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया था। लाखों लोग बेरोजगार थे। दूसरी तरफ यूरोप में नाजीवाद और फासीवाद तेजी से फैल रहा था। आम आदमी को लगने लगा था कि सरकारें और संस्थाएं हर बार उसकी रक्षा नहीं कर पाएंगी। ऐसे समय में दो युवा लेखक, जेरी सीगल और जो शस्टर, एक ऐसे किरदार की कल्पना कर रहे थे जो किसी सरकार का हिस्सा नहीं था, लेकिन न्याय के लिए हमेशा खड़ा रहता था। 1938 में जब एक्शन कॉमिक्स का पहला अंक प्रकाशित हुआ, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि सुपरमैन आने वाले दशकों में दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक प्रतीक बन जाएगा।

सुपरमैन की कहानी सिर्फ एक एलियन की कहानी नहीं थी। उसके रचनाकार यहूदी मूल के थे और यूरोप में यहूदियों पर बढ़ते अत्याचारों को करीब से देख रहे थे। कई इतिहासकार मानते हैं कि नष्ट हुए ग्रह क्रिप्टन से पृथ्वी पर आया सुपरमैन विस्थापन, शरण और नए जीवन की उम्मीद का भी प्रतीक था। वह सिर्फ अपराधियों से नहीं लड़ता था, बल्कि उन लोगों की रक्षा करता था जिनकी आवाज कोई नहीं सुनता था। शायद यही कारण था कि आर्थिक संकट से जूझ रहे समाज ने उसे तुरंत अपना लिया।सुपरमैन की सफलता के बाद 1939 में बैटमैन आया। उसके पास कोई सुपरपावर नहीं थी। वह उड़ नहीं सकता था, उसकी आंखों से लेजर नहीं निकलती थी और न ही वह किसी दूसरे ग्रह से आया था। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसका दिमाग, अनुशासन और इच्छाशक्ति थी। उसने यह साबित किया कि असली नायक वही है, जो अपने डर को जीत ले। इसके बाद वंडर वुमन और कैप्टन अमेरिका जैसे किरदार सामने आए। कैप्टन अमेरिका के पहले कवर पर उसे हिटलर को मुक्का मारते हुए दिखाया गया था। यह उस समय की राजनीति पर सीधी टिप्पणी थी। सुपरहीरो अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रहे, बल्कि समाज की भावनाओं और प्रतिरोध की आवाज भी बन गए थे।

1960 का दशक सुपरहीरो इतिहास का दूसरा बड़ा मोड़ था। मार्वल कॉमिक्स ने स्पाइडर-मैन, आयरन मैन, एक्स-मैन और हल्क जैसे किरदार बनाए। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे परफेक्ट नहीं थे। स्पाइडर-मैन फीस भरने की चिंता करता था, आयरन मैन अपने अहंकार और अपराधबोध से लड़ता था, जबकि एक्स-मैन नस्लीय भेदभाव और सामाजिक अस्वीकार का प्रतीक बन गए। पहली बार सुपरहीरो भी रोते, टूटते और गलतियां करते दिखाई दिए। यही वजह थी कि वे लोगों के और करीब आ गए।मनोविज्ञान इस लोकप्रियता को और गहराई से समझाता है। स्विस मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग ने कहा था कि हर इंसान के भीतर एक "हीरो आर्केटाइप" होता है। यानी हर व्यक्ति अपने भीतर एक ऐसे आदर्श नायक की छवि लिए चलता है, जो मुश्किल समय में सही फैसला ले सके। वहीं लेखक जोसेफ कैंपबेल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक द हीरो विद ए थाउज़ेंड फेसेज़ में बताया कि दुनिया की लगभग हर महान कहानी एक जैसी यात्रा तय करती है एक साधारण इंसान, अचानक आया संकट, कठिन संघर्ष, आत्म-परिवर्तन और अंत में समाज की रक्षा। यही वजह है कि राम, अर्जुन, स्पाइडर-मैन और बैटमैन अलग-अलग संस्कृतियों में पैदा होने के बावजूद एक जैसे लगते हैं।

अगर पिछले सौ वर्षों का इतिहास देखा जाए तो एक दिलचस्प पैटर्न सामने आता है। 1930 के दशक की आर्थिक मंदी में सुपरमैन पैदा हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कैप्टन अमेरिका और वंडर वुमन लोकप्रिय हुए। शीतयुद्ध के दौर में विज्ञान आधारित सुपरहीरो सामने आए। 21वीं सदी में आतंकवाद, कोविड-19 महामारी, जलवायु परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी नई चुनौतियों के बीच सुपरहीरो फिर वैश्विक संस्कृति के केंद्र में आ गए। यह महज संयोग नहीं है। जब वास्तविक दुनिया डर पैदा करती है, तब काल्पनिक दुनिया उम्मीद पैदा करती है।आज सुपरहीरो फिल्मों का कारोबार अरबों डॉलर तक पहुंच चुका है। भारत भी इस बदलाव का बड़ा हिस्सा बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में हॉलीवुड की सुपरहीरो फिल्मों ने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर लगातार मजबूत प्रदर्शन किया है। दूसरी ओर भारतीय सुपरहीरो भी अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते रहे हैं। राज कॉमिक्स के नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, डोगा और परमाणु ने भारतीय समाज की समस्याओं को भारतीय नजरिए से पेश किया। बाद में शक्तिमान ने बच्चों की पूरी पीढ़ी को यह सिखाया कि सबसे बड़ी शक्ति सत्य और चरित्र है, जबकि 'कृष' ने भारतीय सुपरहीरो को बड़े पर्दे पर नई पहचान दी।

लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है क्या सुपरहीरो सचमुच दुनिया बदल देते हैं? शायद नहीं। वे युद्ध नहीं रोकते, गरीबी खत्म नहीं करते और न ही अपराध पूरी तरह मिटा देते हैं। फिर भी उनकी जरूरत खत्म नहीं होती, क्योंकि वे दुनिया नहीं, इंसान के भीतर का विश्वास बचाते हैं। वे याद दिलाते हैं कि सबसे बड़ी ताकत मांसपेशियों में नहीं, बल्कि नैतिक साहस में होती है। किसी कमजोर के साथ खड़ा होना, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद नहीं छोड़ना यही असली सुपरपावर है।शायद इसलिए सुपरहीरो कभी पुराने नहीं पड़ते। उनका चेहरा बदल जाता है, उनकी पोशाक बदल जाती है, उनके दुश्मन बदल जाते हैं, लेकिन उनकी भूमिका नहीं बदलती। हर संकट के बाद दुनिया एक नए सुपरहीरो को जन्म देती है, क्योंकि इंसान को हमेशा यह भरोसा चाहिए होता है कि अंधेरा चाहे कितना भी लंबा क्यों न हो, कहीं न कहीं कोई ऐसा जरूर होगा जो रोशनी की पहली किरण लेकर आएगा। और शायद यही कारण है कि सुपरहीरो कॉमिक्स के पन्नों में नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना में हमेशा जीवित रहते हैं।

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