यूपी में इन सीटों पर बीजेपी का रहेगा सबसे ज्यादा फोकस
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों,, लेकिन राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। सत्ता में लगातार दूसरी बार काबिज भारतीय जनता पार्टी ने उन सीटों पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया है, जो पिछले डेढ़ दशक से उसके लिए राजनीतिक पहेली बनी हुई हैं। पार्टी ने ऐसी 61 विधानसभा सीटों की पहचान की है, जहां वह 2012, 2017 और 2022 तीनों चुनावों में जीत हासिल नहीं कर सकी। यह वही दौर है जिसमें भाजपा ने राज्य की राजनीति में सबसे बड़ा विस्तार देखा, 2017 में ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया और 2022 में सत्ता बरकरार रखी। इसके बावजूद ये 61 सीटें उसके चुनावी नक्शे पर लगातार लाल निशान बनी रहीं। पहली नजर में यह संख्या बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में इसका महत्व काफी अधिक है। 403 सदस्यीय विधानसभा में 61 सीटों का मतलब लगभग 15 प्रतिशत विधानसभा क्षेत्र है। किसी भी दल के लिए यह ऐसा क्षेत्र माना जाता है, जहां लगातार हार केवल चुनावी संयोग नहीं बल्कि गहरे राजनीतिक और सामाजिक कारणों की ओर इशारा करती है। भाजपा की चिंता भी यही है कि जब राज्य के अधिकांश हिस्सों में उसका प्रभाव बढ़ा, तब इन सीटों पर तस्वीर क्यों नहीं बदली।
इन सीटों का भूगोल भाजपा की परेशानी को और स्पष्ट करता है। इनमें सबसे ज्यादा 22 सीटें पूर्वांचल में हैं। आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, जौनपुर और मिर्जापुर जैसे जिले लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति के मजबूत केंद्र रहे हैं। यहां चुनावी लड़ाई केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं होती, बल्कि जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक प्रभाव भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि प्रदेशव्यापी लहर का असर भी कई बार इन क्षेत्रों में सीमित दिखाई देता है।पूर्वांचल की राजनीति को समझे बिना इन 61 सीटों की कहानी अधूरी रहेगी। यहां यादव, राजभर, निषाद, दलित और मुस्लिम समुदायों की आबादी कई सीटों पर चुनावी परिणाम तय करती है। समाजवादी पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दलों ने वर्षों तक इन सामाजिक समूहों के बीच मजबूत पकड़ बनाई है। भाजपा ने पिछले एक दशक में गैर-यादव पिछड़े वर्गों और गैर-जाटव दलितों के बीच प्रभाव बढ़ाया, लेकिन कुछ विधानसभा क्षेत्रों में यह रणनीति अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो सकी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 13 सीटें भी भाजपा के लिए आसान नहीं हैं। सहारनपुर, मुरादाबाद और बिजनौर जैसे जिलों की कई सीटों पर पार्टी लगातार संघर्ष कर रही है। यहां मुस्लिम आबादी का प्रभाव महत्वपूर्ण है। साथ ही जाट, गुर्जर और दलित मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका भी मजबूत रहती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगियों ने इन क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था। इससे साफ हुआ कि राज्य स्तर पर भाजपा की ताकत के बावजूद कुछ इलाकों में स्थानीय समीकरण अभी भी निर्णायक बने हुए हैं। 2022 के चुनाव परिणामों का विश्लेषण भाजपा के लिए कई संकेत छोड़ता है। जिन 61 सीटों पर पार्टी लगातार हार रही है, उनमें बड़ी संख्या समाजवादी पार्टी के खाते में गई थी। कुछ सीटों पर सहयोगी दलों का प्रभाव भी दिखाई दिया। इसका मतलब यह है कि भाजपा को केवल विपक्षी दलों से नहीं, बल्कि उन सामाजिक गठबंधनों से चुनौती मिल रही है जो वर्षों से स्थानीय राजनीति की दिशा तय करते आए हैं।
यही कारण है कि इस बार भाजपा केवल चुनावी प्रचार की तैयारी नहीं कर रही, बल्कि सीट-दर-सीट राजनीतिक अध्ययन में जुटी है। पार्टी संगठन इन क्षेत्रों के बूथवार आंकड़े खंगाल रहा है। पिछले चुनावों के मतदान प्रतिशत, जातीय संरचना, स्थानीय मुद्दों और लाभार्थी वर्ग के रुझानों का अलग-अलग विश्लेषण किया जा रहा है। भाजपा का मानना है कि यदि किसी सीट पर लगातार तीन चुनाव हार मिली है तो उसके पीछे संगठनात्मक या सामाजिक कारण अवश्य हैं, जिन्हें समझे बिना जीत संभव नहीं होगी।मुस्लिम बहुल सीटों को लेकर भी पार्टी अलग रणनीति बना रही है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग पांचवें हिस्से के आसपास है, लेकिन कई विधानसभा क्षेत्रों में उनका अनुपात काफी अधिक है। ऐसे इलाकों में भाजपा को पारंपरिक रूप से कठिन मुकाबले का सामना करना पड़ा है। हालांकि पार्टी का प्रयास है कि सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों, महिलाओं और युवाओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाकर चुनावी समीकरणों में बदलाव लाया जाए।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो इन 61 सीटों की लड़ाई केवल सीटों की संख्या बढ़ाने की कवायद नहीं है। भाजपा के लिए यह अपनी राजनीतिक पहुंच का विस्तार करने का अभियान भी है। यदि पार्टी इन क्षेत्रों में सफलता हासिल करती है तो इसका अर्थ होगा कि उसने उन सामाजिक और क्षेत्रीय बाधाओं को पार कर लिया है, जो अब तक उसकी राह में खड़ी थीं। वहीं विपक्ष के लिए ये सीटें उसके प्रभाव और जनाधार की सबसे बड़ी परीक्षा होंगी।दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई बार वही सीटें सबसे ज्यादा महत्व हासिल कर लेती हैं, जिनकी संख्या अपेक्षाकृत कम होती है। कारण यह है कि वे किसी दल की ताकत और कमजोरी दोनों का प्रतीक बन जाती हैं। भाजपा के लिए ये 61 सीटें ठीक वैसी ही चुनौती हैं। 2017 की प्रचंड जीत और 2022 की वापसी के बावजूद इन सीटों पर हार का सिलसिला जारी रहा। इसलिए 2027 का चुनाव आते-आते इन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा राजनीतिक नजरें टिकना तय है
असल सवाल केवल इतना नहीं है कि भाजपा इन सीटों को जीत पाएगी या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या वह उन सामाजिक समीकरणों को बदल पाएगी, जिन्होंने पिछले 15 वर्षों से इन सीटों की राजनीतिक दिशा तय की है। उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि सत्ता परिवर्तन आसान हो सकता है, लेकिन सामाजिक आधार बदलना कहीं ज्यादा कठिन काम होता है।यही वजह है कि 2027 के चुनाव में जब राजनीतिक दल अपने-अपने दावे पेश करेंगे, तब सबसे ज्यादा चर्चा शायद उन 61 सीटों की होगी जो भाजपा के लिए अब तक अधूरी कहानी बनी हुई हैं। आने वाले महीनों में इन सीटों पर होने वाली राजनीतिक गतिविधियां यह तय करेंगी कि क्या भाजपा अपने सबसे कठिन चुनावी किलों में सेंध लगाने में सफल होती है या फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर साबित करेगी कि कुछ इलाकों की राजनीतिक प्रकृति बदलने में केवल चुनावी लहरें काफी नहीं होतीं।
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