चुनावी साल में भी योगी के तेवर वही, विपक्ष क्यों नहीं खोज पा रहा जवाब आज
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी साल आते ही सरकारों का मिजाज बदल जाना कोई नई बात नहीं रही। फैसलों की रफ्तार धीमी पड़ जाती है, विवादित कदमों से बचने की कोशिश होती है और विपक्ष को भी सरकार को घेरने के मौके मिलने लगते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली इस परंपरा से अलग दिखाई देती है। 2027 के विधानसभा चुनाव करीब हैं, फिर भी उनके फैसलों में चुनावी नरमी का असर नजर नहीं आता। कानून व्यवस्था पर सख्ती हो, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई हो, माफिया के खिलाफ अभियान हो या विकास परियोजनाओं की समीक्षा, सरकार उसी गति से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है, जैसी पिछले नौ वर्षों में रही है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि योगी क्या कर रहे हैं, बल्कि यह है कि विपक्ष उनके सामने प्रभावी राजनीतिक चुनौती क्यों नहीं खड़ी कर पा रहा।2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद संभाला था, तब उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती कानून व्यवस्था को माना जाता था। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने भी इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। सत्ता संभालने के बाद सरकार ने पुलिस और प्रशासन को साफ संदेश दिया कि अपराध और संगठित माफिया के खिलाफ कार्रवाई में किसी तरह की ढिलाई स्वीकार नहीं होगी। इसके बाद अपराधियों के खिलाफ लगातार अभियान शुरू हुआ। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले नौ वर्षों में हजारों पुलिस अभियान चलाए गए, बड़ी संख्या में इनामी अपराधी गिरफ्तार हुए और गैंगस्टर एक्ट के तहत माफियाओं की हजारों करोड़ रुपये की अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई की गई। हाल के सरकारी बयानों में यह भी कहा गया कि अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ाया गया है और अपराध से अर्जित संपत्ति को जब्त करना सरकार की प्राथमिकता बनी हुई है। यह अभियान केवल चुनाव से पहले नहीं बल्कि पूरे कार्यकाल में लगातार चलता रहा। यही निरंतरता योगी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानी जाती है।
सरकार केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रही। अभियोजन व्यवस्था को मजबूत करने और अदालतों में दोषसिद्धि बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। ऑपरेशन कन्विक्शन जैसे अभियानों के जरिए गंभीर मामलों में तेजी से सुनवाई कराने की कोशिश हुई। सरकार का दावा है कि हत्या, महिला अपराध और गैंगस्टर से जुड़े मामलों में पहले की तुलना में दोषसिद्धि दर बढ़ी है। यही कारण है कि भाजपा जब कानून व्यवस्था की बात करती है तो केवल पुलिस कार्रवाई नहीं बल्कि अदालतों में मिलने वाली सजाओं का भी हवाला देती है।इसी बीच उत्तर प्रदेश की दूसरी तस्वीर विकास की रही। 2017 के बाद राज्य में एक्सप्रेसवे निर्माण की रफ्तार तेज हुई। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे चालू हुआ, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे ने नए औद्योगिक गलियारों की संभावनाएं बढ़ाईं, गंगा एक्सप्रेसवे का निर्माण तेजी से आगे बढ़ा और जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा देश की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में शामिल हो गया। सरकार का दावा है कि इन परियोजनाओं का उद्देश्य केवल सड़क बनाना नहीं बल्कि निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा करना है। उत्तर प्रदेश ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के दौरान सरकार ने लाखों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिलने का दावा किया और उसके बाद ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के जरिए कई परियोजनाओं को जमीन पर उतारने की प्रक्रिया शुरू की गई। सरकारी दावों के अनुसार हजारों निवेश प्रस्तावों पर काम शुरू हो चुका है और कई इकाइयों में उत्पादन भी आरंभ हो गया है।राज्य का बजट भी इसी दिशा की कहानी कहता है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश का बजट लगातार बढ़ा है। 2026-27 के बजट में बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई, पुलिस आधुनिकीकरण और ग्रामीण विकास पर विशेष जोर दिया गया। सरकार का दावा है कि राज्य की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और उत्तर प्रदेश देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। भाजपा चुनावी मंचों पर इन्हीं उपलब्धियों को विकास मॉडल के रूप में पेश करती है।
हाल के महीनों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बैठकों का एक और पहलू चर्चा में रहा। कांवड़ यात्रा से लेकर त्योहारों तक कानून व्यवस्था को लेकर उन्होंने अधिकारियों को लगातार निर्देश दिए। ड्रोन निगरानी, सीसीटीवी, संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल और अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई जैसे निर्देश सरकार की प्राथमिकता बताते हैं कि चुनावी साल में भी कानून व्यवस्था को लेकर कोई ढिलाई नहीं बरती जा रही। प्रशासनिक बैठकों में मुख्यमंत्री बार-बार यही संदेश दोहराते रहे हैं कि शांति व्यवस्था से समझौता नहीं होगा और सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने वालों पर भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।अतिक्रमण के खिलाफ अभियान भी इसी राजनीतिक शैली का हिस्सा बन चुका है। सरकारी जमीन, अवैध कब्जों और माफियाओं से जुड़ी संपत्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई अब उत्तर प्रदेश की राजनीति का स्थायी प्रतीक बन चुकी है। समर्थकों का कहना है कि इससे प्रशासन का डर पैदा हुआ और अवैध कब्जों पर रोक लगी। वहीं विपक्ष इसे चयनात्मक कार्रवाई बताता है और आरोप लगाता है कि कानून का इस्तेमाल समान रूप से नहीं होता। इन आरोपों के बावजूद सरकार ने अपनी नीति में कोई बदलाव नहीं किया। चुनावी साल में भी कई जिलों में अतिक्रमण हटाने और अवैध निर्माण ध्वस्त करने की कार्रवाई जारी रही।यही वह बिंदु है जहां विपक्ष की राजनीति कमजोर पड़ती दिखाई देती है। समाजवादी पार्टी बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, किसानों और महंगाई जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करती है। कांग्रेस भी युवाओं और सामाजिक न्याय के सवाल उठाती है। लेकिन भाजपा हर बार बहस को कानून व्यवस्था, विकास और निवेश की ओर मोड़ देती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने पिछले नौ वर्षों में अपना सबसे मजबूत नैरेटिव सुरक्षा और विकास को बनाया है, जबकि विपक्ष अब भी ऐसा कोई व्यापक मुद्दा नहीं बना पाया है जो पूरे प्रदेश में समान प्रभाव छोड़ सके।
इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार के सामने चुनौतियां नहीं हैं। युवाओं में रोजगार को लेकर अपेक्षाएं हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। किसानों की आय, महंगाई और स्थानीय समस्याएं भी राजनीतिक मुद्दे हैं। विपक्ष इन्हीं विषयों को लेकर जनता के बीच जाता है। लेकिन सरकार की रणनीति हर बार नए विकास कार्यों, प्रशासनिक फैसलों और कानून व्यवस्था के रिकॉर्ड को सामने रखकर जवाब देने की रही है। यही कारण है कि चुनावी माहौल बनने के बावजूद सरकार रक्षात्मक मुद्रा में कम दिखाई देती है।राजनीतिक दृष्टि से देखें तो योगी आदित्यनाथ ने अपनी छवि केवल मुख्यमंत्री की नहीं बल्कि एक ऐसे प्रशासक की बनाई है जो फैसले लेने से पीछे नहीं हटता। यही छवि भाजपा के लिए चुनावी पूंजी भी है। पार्टी संगठन भी इसे लगातार मजबूत करता है। हर नई परियोजना, हर निवेश समझौता और हर प्रशासनिक कार्रवाई को राजनीतिक संदेश के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।दूसरी ओर विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व से ज्यादा नैरेटिव की है।
समाजवादी पार्टी के पास मजबूत सामाजिक समीकरण हैं, कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रही है और अन्य दल भी अपने-अपने मुद्दे उठा रहे हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में अभी तक ऐसा कोई आंदोलन या जनलहर दिखाई नहीं दी जिसने सरकार को रक्षात्मक होने पर मजबूर किया हो। यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि योगी सरकार विपक्ष को उसकी पसंद के मुद्दों पर नहीं, बल्कि अपनी तय की हुई राजनीतिक जमीन पर लड़ने के लिए मजबूर कर देती है।2027 का चुनाव अभी बाकी है और लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता करती है। विपक्ष के पास अभी भी सरकार को चुनौती देने का समय है और सरकार के सामने भी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की परीक्षा है। लेकिन मौजूदा तस्वीर यही बताती है कि चुनावी साल में भी योगी आदित्यनाथ ने अपनी कार्यशैली नहीं बदली है। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत भी है और सबसे बड़ी परीक्षा भी। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि सख्त प्रशासन, विकास परियोजनाओं और लगातार फैसले लेने की यही शैली भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता तक पहुंचाती है या विपक्ष कोई नया राजनीतिक समीकरण खड़ा करने में सफल होता है।
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