यूपी: स्कूटी योजना से उठे सवालों ने बदली नौकरशाही की बहस


यूपी: स्कूटी योजना से उठे सवालों ने बदली नौकरशाही की बहस 

उत्तर प्रदेश में छात्राओं के लिए प्रस्तावित स्कूटी योजना का उद्देश्य उच्च शिक्षा में बेटियों को प्रोत्साहित करना था, लेकिन इस योजना की एक शर्त ने ऐसी बहस छेड़ दी, जो अब केवल शिक्षा विभाग तक सीमित नहीं रही। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने जब यह सवाल उठाया कि 90 प्रतिशत अंक पाने वाली छात्राओं तक ही योजना को सीमित क्यों रखा गया है, तब यह मुद्दा सीधे नीति निर्माण की गुणवत्ता और नौकरशाही की कार्यप्रणाली तक पहुंच गया। उनका कहना था कि गांवों और कस्बों की गरीब छात्राओं के पास न तो शहरों जैसी सुविधाएं हैं और न ही महंगे कोचिंग संस्थानों का सहारा। ऐसे में केवल अंकों के आधार पर पात्रता तय करना उन छात्राओं के साथ न्याय नहीं होगा, जिनके सामने आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह की चुनौतियां हैं। राज्यपाल की इस टिप्पणी के बाद उच्च शिक्षा विभाग ने प्रस्ताव में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की और अब 75 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाली आर्थिक रूप से कमजोर छात्राओं को भी योजना में शामिल करने की तैयारी की जा रही है। यहीं से शुरू हुई बहस ने नया राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ ले लिया। योगी सरकार में समाज कल्याण मंत्री और पूर्व आईपीएस अधिकारी असीम अरुण ने सोशल मीडिया पर लंबी टिप्पणी लिखकर कहा कि समस्या किसी अधिकारी विशेष की नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि जब तक सरकारी नीतियां फाइलों में सुंदर दिखाई देंगी और जमीन पर लागू होने की कसौटी पर खरी नहीं उतरेंगी, तब तक लोककल्याण का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा। उन्होंने भारतीय नौकरशाही के उस "स्टील फ्रेम" मॉडल पर पुनर्विचार की जरूरत बताई, जिसे स्वतंत्रता के बाद देश की प्रशासनिक रीढ़ माना गया था। असीम अरुण का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह स्वयं लगभग तीन दशक तक भारतीय पुलिस सेवा का हिस्सा रहे हैं और प्रशासनिक व्यवस्था को भीतर से देख चुके हैं।

दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब भारतीय नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हों। स्वतंत्र भारत में 1966, 2005 और उसके बाद गठित विभिन्न प्रशासनिक सुधार आयोगों ने भी विशेषज्ञता आधारित प्रशासन, जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने की सिफारिश की थी। दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा था कि 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना केवल सामान्य प्रशासनिक ज्ञान से नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्य, शिक्षा, शहरी विकास, पर्यावरण, साइबर सुरक्षा और वित्त जैसे क्षेत्रों में विषय विशेषज्ञों की भूमिका लगातार बढ़ानी होगी। सरकारी आंकड़े भी इस बहस को मजबूती देते हैं। केंद्र सरकार द्वारा संसद में उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार 1 जनवरी 2025 तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में 6,877 स्वीकृत पदों के मुकाबले लगभग 5,577 अधिकारी ही कार्यरत थे। यानी 1,300 से अधिक पद खाली थे। भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय वन सेवा में भी सैकड़ों पद रिक्त हैं। तीनों अखिल भारतीय सेवाओं को मिलाकर रिक्त पदों की संख्या लगभग 2,800 से अधिक है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में भी स्वीकृत आईएएस पदों की तुलना में अधिकारियों की संख्या कम है। इसका सीधा असर योजनाओं के क्रियान्वयन, निगरानी और प्रशासनिक निर्णयों की गति पर पड़ता है।

हालांकि असीम अरुण का सबसे बड़ा सवाल रिक्त पदों पर नहीं, बल्कि भर्ती की मौजूदा व्यवस्था पर है। उनका कहना है कि एक ही परीक्षा के माध्यम से विदेश सेवा, प्रशासनिक सेवा, राजस्व सेवा, पुलिस सेवा और दूसरी कई सेवाओं के लिए अधिकारियों का चयन किया जाता है। विदेश सेवा में जाने वाला अधिकारी जरूरी नहीं कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों या विदेशी भाषाओं का विशेषज्ञ हो। नगर प्रशासन संभालने वाले अधिकारी ने संभव है कि कभी शहरी नियोजन का अध्ययन ही न किया हो। कर प्रशासन देखने वाला अधिकारी लेखांकन की पढ़ाई किए बिना भी उस जिम्मेदारी तक पहुंच जाता है। उनका तर्क है कि जब चयन विषय-विशेष की योग्यता और रुचि के आधार पर नहीं होगा तो उत्कृष्ट परिणामों की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। यह तर्क पूरी तरह नया भी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने लैटरल एंट्री के माध्यम से निजी क्षेत्र, शिक्षण संस्थानों और विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों से विशेषज्ञों को संयुक्त सचिव स्तर तक नियुक्त करने का प्रयोग किया है। सरकार का तर्क रहा कि इससे नीति निर्माण में विशेषज्ञता आएगी, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे पारंपरिक सिविल सेवा की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसी तरह 'मिशन कर्मयोगी' के माध्यम से अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है, ताकि बदलती तकनीक और नई प्रशासनिक चुनौतियों के अनुरूप उन्हें तैयार किया जा सके।

असीम अरुण ने अपने लेख में चुनाव आयोग और आपदा प्रबंधन प्रणाली का उदाहरण देते हुए कहा कि इन संस्थाओं की सफलता किसी एक अधिकारी की वजह से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थागत व्यवस्था की वजह से है। दूसरी ओर उन्होंने जमीन की खरीद-फरोख्त, ट्रैफिक प्रबंधन, नगर नियोजन, हाउस टैक्स संग्रह और स्थानीय प्रशासन को ऐसे क्षेत्र बताया, जहां व्यक्ति बदलते रहते हैं लेकिन व्यवस्था नहीं बदलती। यही कारण है कि आम नागरिक को रोजमर्रा के कामों में सबसे ज्यादा परेशानी इन्हीं विभागों में झेलनी पड़ती है। उन्होंने पोस्टिंग व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना है कि यदि डॉक्टर स्वास्थ्य विभाग की नीति निर्माण प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाएं, शिक्षक शिक्षा विभाग की योजनाएं तैयार करें, वित्त विशेषज्ञ वित्तीय नीतियों को दिशा दें और वन विशेषज्ञ वन विभाग की कमान संभालें तो नीतियों की गुणवत्ता और परिणाम दोनों बेहतर होंगे। उत्तर प्रदेश में हॉस्पिटैलिटी, मीडिया और माइनिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों को संबंधित विभागों में जिम्मेदारी देने के कुछ प्रयोग किए गए हैं, जिनके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। उनका मानना है कि इस मॉडल को और व्यापक बनाया जाना चाहिए।

राजनीतिक दृष्टि से भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्व कम नहीं है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे शुरू हो चुकी हैं। सरकार की कोशिश है कि उसकी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुंचे। ऐसे समय में यदि किसी योजना की पात्रता ही इतनी कठोर हो कि वास्तविक जरूरतमंद उससे बाहर हो जाएं, तो सरकार की मंशा पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। यही कारण है कि स्कूटी योजना के नियमों में बदलाव को केवल प्रशासनिक संशोधन नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर उस मूल प्रश्न को सामने ला दिया है कि क्या भारत की प्रशासनिक व्यवस्था आज की जरूरतों के अनुरूप खुद को बदल पा रही है? क्या सामान्य प्रशासनिक मॉडल और विषय विशेषज्ञता के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है? क्या भर्ती, प्रशिक्षण, पोस्टिंग और जवाबदेही की मौजूदा व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत है? इन सवालों पर आने वाले समय में बहस और तेज होना तय है। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश की एक स्कूटी योजना ने भारतीय नौकरशाही के उस "स्टील फ्रेम" को नई कसौटी पर खड़ा कर दिया है, जिसकी मजबूती पर दशकों से देश का प्रशासन टिका रहा है। अब देखना यह होगा कि यह बहस केवल सोशल मीडिया और बयानों तक सीमित रहती है या फिर आने वाले वर्षों में प्रशासनिक सुधारों की दिशा में ठोस बदलाव का आधार भी बनती है।


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