अहंकार से विपक्षी एकता तोड़ने वाली ममता बनर्जी को आज क्यों याद आया इंडिया गठबंधन
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी अजेय मानी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) आज अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है। भवानीपुर की अपनी पारंपरिक सीट पर पिछड़ना, फाल्टा उपचुनाव में प्रत्याशी का मैदान छोड़ देना और पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के खिलाफ सुलगती बगावत ने ममता बनर्जी के राजनीतिक धरातल को हिलाकर रख दिया है। जब सत्ता हाथ से फिसल गई और खुद का वजूद दांव पर लग गया, तो ममता बनर्जी को अचानक उस 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन की याद सताने लगी है, जिसे मटियामेट करने में उन्होंने खुद कोई कसर नहीं छोड़ी थी। रविवार को फेसबुक लाइव के जरिए जून के पहले हफ्ते में विपक्षी गठबंधन की बैठक बुलाने और संयुक्त रणनीति बनाने का उनका दावा किसी राजनीतिक ढोंग से कम नजर नहीं आता। जो नेता कल तक पूरे विपक्ष को अपनी उंगलियों पर नचाना चाहता था, वह आज ढहते किले को बचाने के लिए उसी गठबंधन की शरण में जाने को बेताब है जिसे उसने अपने हाथों से कमजोर किया था।
इतिहास गवाह है कि जब 2024 के आम चुनाव से पहले बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा के खिलाफ एक देशव्यापी मोर्चा बनाने की कसम खाई थी, तब ममता बनर्जी ही उस प्रयास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनीं। नीतीश कुमार ने हर राज्य का दौरा कर बिखरते विपक्ष को पटना में एक मेज पर बिठाया था। बेंगलुरु की दूसरी बैठक में जब गठबंधन को औपचारिक आकार दिया जा रहा था और नीतीश कुमार को इसका संयोजक बनाने की बात लगभग तय हो चुकी थी, तब ममता बनर्जी ने अपने अहं को आगे रख दिया। वह बैठक खत्म होने से पहले ही कोलकाता की फ्लाइट पकड़कर रवाना हो गईं। इसके बाद मुंबई की बैठक में भी उनके अड़ंगे के कारण नीतीश कुमार को दरकिनार किया गया। नतीजा यह हुआ कि जिस नेता ने इस पूरे गठबंधन की परिकल्पना की थी, वही निराश होकर दोबारा एनडीए के पाले में चला गया। ममता की इस जिद ने विपक्षी एकता के गुब्बारे की हवा पहली बैठक में ही निकाल दी थी।
ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा से 'एकला चलो रे' की आड़ में अपनी राजनीतिक हनक दिखाने की रही है। लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने बंगाल में गठबंधन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। यहां तक कि कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व केवल एक सीट पर समझौते को भी तैयार था, लेकिन सत्ता के नशे में चूर ममता ने कांग्रेस को एक भी सीट देने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने न केवल गठबंधन को तिलांजलि दी, बल्कि कांग्रेस के कद्दावर नेता के खिलाफ क्रिकेटर यूसुफ पठान को मैदान में उतारकर यह संदेश दिया कि वह सहयोगियों को कुचलने में यकीन रखती हैं। उस वक्त उन्होंने अहंकार में आकर यहां तक कह दिया था कि राहुल गांधी अगर विपक्ष का चेहरा रहे, तो नरेंद्र मोदी को कोई नहीं हरा सकता। यह राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है कि आज जब 2026 के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद ममता बनर्जी अकेलेपन और हताशा से जूझ रही थीं, तो उन्हें ढांढस बंधाने के लिए पहला फोन कॉल उसी राहुल गांधी का गया था, जिन्हें वह कभी खारिज कर चुकी थीं।
वैचारिक रूप से भी ममता बनर्जी ने कभी गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया। वामदल इस गठबंधन की शुरुआत से ही एक मजबूत स्तंभ की तरह खड़े रहे। देश की राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुए कांग्रेस ने बार-बार ममता से अपील की कि वह बंगाल में वामपंथियों के साथ कड़वाहट भुलाकर आगे बढ़ें। जिस तरह उत्तर प्रदेश में धुर विरोधी सपा-बसपा साथ आए थे और बिहार में लालू-नीतीश ने हाथ मिलाया था, वैसा ही प्रयोग बंगाल में भी जरूरी था। अगर ममता बनर्जी ने वामदलों और कांग्रेस को साथ लेकर चुनाव लड़ा होता, तो आज देश की राजनीतिक तस्वीर और यह गठबंधन दोनों बेहद मजबूत स्थिति में होते। लेकिन ममता ने क्षेत्रीय क्षत्रप बने रहने की चाह में अपने ही सहयोगियों की पीठ में छुरा घोंपा और राज्य के भीतर किसी भी घटक दल को टिकने नहीं दिया।
इतना ही नहीं, ममता बनर्जी गठबंधन के भीतर ही अपनी एक अलग खिचड़ी पकाती रहीं। वह शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के साथ मिलकर 'गठबंधन के अंदर गठबंधन' बनाने की फिराक में थीं। उनका मुख्य एजेंडा भाजपा से लड़ना कम और कांग्रेस को दरकिनार कर खुद को विपक्ष का सर्वमान्य नेता स्थापित करना ज्यादा था। वह देश को यह संदेश देना चाहती थीं कि कांग्रेस के बिना भी एक मोर्चा बन सकता है, जिसकी कमान उनके हाथ में हो। उनकी इसी आत्ममुग्धता और अदूरदर्शिता का परिणाम है कि आज विपक्षी कुनबा पूरी तरह बिखर चुका है।
साल 2023 में जब इस गठबंधन की नींव रखी गई थी, तब इसके पास मुख्यमंत्रियों की एक पूरी फौज थी। बंगाल में ममता, तमिलनाडु में स्टालिन, दिल्ली-पंजाब में आप, बिहार में नीतीश-तेजस्वी और झारखंड में सोरेन के साथ-साथ कई राज्यों में कांग्रेस की मजबूत सरकारें थीं। लेकिन ममता की जिद और आपसी खींचतान ने इस ताकत को नेस्तनाबूद कर दिया। आज हालात यह हैं कि गठबंधन के ज्यादातर बड़े चेहरे सत्ता से बेदखल हो चुके हैं। विपक्ष के पास खोने के लिए अब कुछ नहीं बचा है और इस बर्बादी की स्क्रिप्ट लिखने वालों में ममता बनर्जी का नाम सबसे ऊपर आता है।
अब जब बंगाल की जनता ने टीएमसी को नकार दिया है, भवानीपुर जैसे गढ़ ढह रहे हैं, और ममता बनर्जी के बुलाने पर उनके अपने अस्सी विधायक भी एक साथ बैठक में आने को तैयार नहीं हैं, तब उन्हें अचानक संयुक्त रणनीति की याद आ रही है। पार्टी के भीतर भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ वरिष्ठ नेताओं की खुली बगावत यह साफ संकेत दे रही है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर कभी भी बड़ा विस्फोट हो सकता है। अपने अस्तित्व को पूरी तरह खतरे में पाकर ममता बनर्जी अब 'इंडिया' गठबंधन का सहारा ढूंढ रही हैं। लेकिन राजनीति में साख एक बार चली जाए, तो दोबारा नहीं मिलती। जो नेता अपने रसूख के दिनों में सहयोगियों को कीड़े-मकौड़ों की तरह समझता था, आज जब वह खुद जमीन पर आ गिरा है, तो उसकी इस नई 'विपक्षी एकजुटता' वाली छटपटाहट पर कोई भी दल कितनी संजीदगी से भरोसा करेगा, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा। फिलहाल, ममता का यह बदला रुख उनकी ताकत नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक लाचारी को बयां कर रहा है।
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