मायावती की ठसक, कांग्रेस की बेबसी
संजय सक्सेना,लखनऊ
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों शह और मात का एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसने दिल्ली से लेकर लखनऊ तक के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। लखनऊ के मॉल रोड स्थित बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती के आशियाने के बाहर इस सप्ताह जो कुछ भी घटा, उसने यह साफ कर दिया कि बीएसपी भले ही चुनावी आंकड़ों के लिहाज से अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही हो, लेकिन उसकी मुखिया की राजनीतिक ठसक और तेवर आज भी पुराने वाले ही हैं। कांग्रेस के दो कद्दावर दलित चेहरों को मायावती के दरवाजे से बिना मुलाकात के बैरंग लौट जाना पड़ा, जिसके बाद यूपी की राजनीति में कयासों का बाजार गर्म हो गया है। कांग्रेस इसे महज एक शिष्टाचार भेंट बताकर डैमेज कंट्रोल में जुटी है, वहीं समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने इस घटनाक्रम के बाद अपनी आंखें तरेर कर यह साफ कर दिया है कि वह उत्तर प्रदेश में किसी भी नए राजनीतिक समीकरण को आसानी से स्वीकार करने वाले नहीं हैं। यह पूरी कहानी सिर्फ एक मुलाकात न होने की नहीं है, बल्कि इसके पीछे कांग्रेस की मजबूरी, सपा की चौकसी और मायावती का वो पुराना इतिहास है जो समय-समय पर कांग्रेस को उसकी जमीन याद दिलाता रहता है।
दरअसल, इस पूरे सियासी ड्रामे की शुरुआत तब हुई जब कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और बाराबंकी से कांग्रेस के नवनिर्वाचित सांसद व प्रदेश एससी विभाग के मुखिया तनुज पूनिया अचानक लखनऊ में मायावती के आवास पर पहुंच गए। कांग्रेस के दफ्तर से महज कुछ ही दूरी पर स्थित बीएसपी सुप्रीमो के घर जब ये दोनों नेता पहुंचे, तो कयास लगाए जाने लगे कि क्या उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और बीएसपी के बीच पर्दे के पीछे कोई नई खिचड़ी पक रही है। लेकिन मायावती के सुरक्षा चक्र और उनके स्टाफ ने कांग्रेस के इन बड़े नेताओं को अंदर जाने की इजाजत नहीं दी। उन्हें दो टूक कह दिया गया कि चूंकि मिलने का कोई पूर्व निर्धारित समय नहीं था, इसलिए मुलाकात मुमकिन नहीं है। नेताओं से कहा गया कि वे रजिस्टर में अपना नाम और मोबाइल नंबर दर्ज करा दें, जब बहन जी की तरफ से हरी झंडी मिलेगी, तब उन्हें बुलावा भेजा जाएगा। मीडिया और सोशल मीडिया पर जैसे ही यह खबर फैली, वैसे ही कांग्रेस बैकफुट पर आ गई। दोनों नेताओं ने आनन-फानन में सफाई दी कि वे सिर्फ मायावती की सेहत का हालचाल जानने गए थे, क्योंकि वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। लेकिन सियासत में जब दो धुर विरोधी दलों के नेता किसी के दरवाजे पर दस्तक देते हैं, तो उसके मायने सिर्फ तबीयत पूछने तक सीमित नहीं रहते।
इस घटना ने विपक्षी खेमे में कितनी बड़ी खलबली मचाई, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की सहयोगी समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव तुरंत सतर्क हो गए। लखनऊ के राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम हो गई कि कांग्रेस दरअसल मायावती के प्रति थोड़ी नरमी और नजदीकी दिखाकर समाजवादी पार्टी पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही है, ताकि भविष्य में होने वाले चुनावों के लिए सीट शेयरिंग के फार्मूले पर अपनी सौदेबाजी की क्षमता को बढ़ाया जा सके। अखिलेश यादव ने इस रणनीति को भांपने में तनिक भी देर नहीं लगाई और फौरन एक ऐसा बयान दे डाला जिसने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को सोचने पर मजबूर कर दिया। अखिलेश ने साफ लफ्जों में संदेश दिया कि समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है और वह केवल उन्हीं दलों के साथ गठबंधन करेगी जो जमीन पर चुनाव जीतने का दम रखते हैं। अखिलेश का यह कड़ा रुख कांग्रेस के लिए एक सीधा अल्टीमेटम था। इसका असर भी तुरंत देखने को मिला, जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद तारिक अनवर को सामने आकर यह सफाई देनी पड़ी कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का गठबंधन केवल और केवल समाजवादी पार्टी के साथ ही रहेगा और मायावती के घर जाना महज एक औपचारिकता थी।
मायावती के इस रुख को समझने के लिए हमें इतिहास के उन पन्नों को पलटना होगा, जहां कांग्रेस और बीएसपी के रिश्तों की कड़वाहट और अविश्वास की कहानियां दर्ज हैं। मायावती हमेशा से मानती रही हैं कि कांग्रेस ने कभी भी दलितों का भला नहीं किया, बल्कि उसने सिर्फ उनके वोट बैंक का इस्तेमाल किया। वह कई मंचों से कांग्रेस को असली 'दलित विरोधी' पार्टी करार दे चुकी हैं। इतिहास गवाह है कि मायावती किसी भी राष्ट्रीय दल के साथ अपनी शर्तों पर ही बात करती हैं और जब भी कोई उनके कद को छोटा करने की कोशिश करता है, वह उसे करारा जवाब देती हैं। साल 2018 का वह नजारा आज भी राजनीतिक विश्लेषकों के जेहन में ताजा है, जब कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस ने जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी थी। उस शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी एकजुटता का जो नजारा दिखा था, उसकी देश भर में चर्चा हुई थी। मंच पर कांग्रेस की तत्कालीन सर्वेसर्वा सोनिया गांधी ने बेहद गर्मजोशी से मायावती का हाथ थामा था, मुस्कुराई थीं और यहां तक कि दोनों नेताओं ने आपस में माथा टकराकर तस्वीरें भी खिंचवाई थीं। तब लगा था कि सोनिया और मायावती की यह केमिस्ट्री उत्तर प्रदेश में दिल्ली का रास्ता बदल देगी। लेकिन दिल्ली लौटते ही मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस पर करारे हमले किए और उसे पानी पी-पीकर कोसा। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस को पूरी तरह दरकिनार करते हुए समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया। हालांकि, वह गठबंधन भी चुनाव के बाद ताश के पत्तों की तरह ढह गया जब मायावती ने सपा पर अपना वोट ट्रांसफर न करा पाने का आरोप लगाकर नाता तोड़ लिया।
मायावती और सोनिया गांधी के बीच अविश्वास की एक और दिलचस्प बानगी साल 2004 के दौर में देखने को मिलती है। तब सोनिया गांधी खुद चलकर दिल्ली के हुमायूं रोड स्थित मायावती के सरकारी आवास पर उनसे मुलाकात करने पहुंची थीं। इस हाई-प्रोफाइल मुलाकात की भनक लगते ही देश भर का मीडिया मायावती के बंगले के बाहर जमा हो गया। बंद कमरे में करीब दो घंटे तक बातचीत चली। लेकिन जब सोनिया गांधी के निकलने का वक्त आया, तो मायावती ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने सबको हैरान कर दिया। मायावती नहीं चाहती थीं कि मीडिया के कैमरों के सामने वह सोनिया गांधी के साथ एक ही फ्रेम में दिखाई दें, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे उनके कोर दलित वोटर के बीच यह संदेश जा सकता है कि बीएसपी कांग्रेस के सामने झुक गई है। लिहाजा, उन्होंने सोनिया गांधी को अपने बंगले के पिछले दरवाजे से गुपचुप तरीके से विदा कर दिया। यह घटना दिखाती है कि मायावती अपने राजनीतिक प्रतीकों और अपनी स्वतंत्र पहचान को लेकर कितनी संवेदनशील और अड़ियल रही हैं।
हालांकि, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि मायावती ने कभी कांग्रेस की मदद नहीं की। राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, और मायावती ने भी समय आने पर व्यावहारिक फैसले लिए हैं। जब अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर वामपंथी दलों ने मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था और केंद्र सरकार गिरने की कगार पर पहुंच गई थी, तब मायावती की बीएसपी और मुलायम सिंह यादव की सपा ने बाहर से समर्थन देकर मनमोहन सरकार की नैया पार लगाई थी। लेकिन इस मदद के बदले भी मायावती ने कभी कांग्रेस को अपने ऊपर हावी होने का मौका नहीं दिया। आज की तारीख में उत्तर प्रदेश की विधानसभा में बहुजन समाज पार्टी का सिर्फ एक विधायक है और संसद के दोनों सदनों में उसका प्रतिनिधित्व शून्य है। राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि बीएसपी अपने इतिहास के सबसे कमजोर दौर से गुजर रही है। लेकिन इन सबके बावजूद मायावती का सियासी मिजाज नहीं बदला है। वह आज भी यह मानती हैं कि उनका अपना एक काडर है, जो उनके एक इशारे पर वोट बैंक को इधर से उधर करने की ताकत रखता है। कांग्रेस के दो दलित नेताओं को समय न देकर उन्होंने यह साफ संदेश दे दिया है कि अगर किसी को उनसे हाथ मिलाना है या कोई गठबंधन करना है, तो उसे उनके दरवाजे पर अर्जी लगानी होगी और बातचीत सीधे उनके स्तर पर होगी, किसी दूत या विभाग के मुखिया के जरिए नहीं। कांग्रेस की यह बेबसी और मायावती की यह जिद आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति को किस करवट ले जाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा, लेकिन फिलहाल अखिलेश यादव की सतर्कता ने यह तय कर दिया है कि यूपी के इस त्रिकोणीय मुकाबले में शह-मात का खेल अभी लंबा चलने वाला है।
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