एक देश-एक चुनाव: चुनावी खर्च की महाबचत से क्या वाकई देश से मिट जाएगी गरीबी?
वैश्विक स्तर पर जारी युद्ध और गंभीर ऊर्जा संकट के बीच भारत इस समय तेल और गैस की किल्लत से जूझ रहा है। इस संकट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया को यह चेतावनी देने पर मजबूर कर दिया कि अगर युद्ध और ईंधन की अनिश्चितता नहीं रुकी, तो दुनिया भर में करोड़ों लोग दोबारा गरीबी के दलदल में धकेल दिए जाएंगे। इस वैश्विक आंधी के बीच भारत के सामने अपने नागरिकों को सुरक्षित रखने की एक बड़ी चुनौती है। सरकार फिलहाल देश के करीब 80 करोड़ लोगों को हर महीने मुफ्त अनाज दे रही है ताकि कोई भूखा न सोए, लेकिन अब वक्त आ गया है कि इस सुरक्षा तंत्र को और मजबूत किया जाए। इस संकट काल में देश के भीतर एक नई बहस ने जोर पकड़ा है, जो सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था और चुनावी ढांचे से जुड़ी है। 'एक देश-एक चुनाव' के मुद्दे पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने हाल ही में गुजरात का दौरा किया और इसके अध्यक्ष पीपी चौधरी ने दावा किया कि यदि देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो कम से कम सात लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम बचत हो सकती है। तर्क सीधा है कि बार-बार चुनाव कराने में जो पैसा पानी की तरह बह जाता है, उसे बचाकर देश के विकास कार्यों को रफ्तार दी जा सकती है और कीमती समय भी बचाया जा सकता है।
इस सात लाख करोड़ रुपये की बचत का सीधा गणित देश की गरीबी रेखा से जुड़ा हुआ है। सरकारी आंकड़ों को देखें तो साल 2011-12 में भारत में गरीबी दर 16.2 फीसदी थी, जिसका मतलब था कि देश के करीब 20 करोड़ लोग बेहद गरीब थे। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में यह आंकड़ा घटकर 5.25 फीसदी पर आ गया है, यानी अब गरीबों की संख्या करीब 7.52 करोड़ रह गई है। जेपीसी अध्यक्ष का गणित कहता है कि अगर 'एक देश-एक चुनाव' से बचने वाले सात लाख करोड़ रुपये का सही इस्तेमाल किया जाए, तो देश के लगभग 1.94 करोड़ सबसे गरीब परिवारों को अगले पांच साल तक हर महीने 6,000 रुपये की सीधी नकद मदद दी जा सकती है। भारतीय परिवारों के औसत आकार (4.4 सदस्य प्रति परिवार) के हिसाब से इस योजना के जरिए लगभग 8.5 करोड़ लोगों को एक झटके में गरीबी रेखा से बाहर निकाला जा सकता है, जो कि देश के मौजूदा कुल गरीब आबादी से भी अधिक है। कभी हर गरीब परिवार को 6,000 रुपये महीना देने का सपना कांग्रेस और राहुल गांधी ने भी देखा था, लेकिन वे सियासी बिसात पर इस वादे को भुना नहीं पाए। इंदिरा गांधी का 'गरीबी हटाओ' का नारा पांच दशकों बाद भी पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर सका, लेकिन अगर यह आर्थिक मॉडल लागू होता है तो गरीबी उन्मूलन के इतिहास में यह सबसे बड़ा कदम होगा। बाजार के जानकारों का मानना है कि जब समाज के सबसे निचले तबके के हाथ में सीधे पैसे पहुंचेंगे, तो उनकी क्रय शक्ति और उपभोग बढ़ेगा, जिससे बाजार में चौतरफा मांग पैदा होगी और देश की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। इसके अलावा, कई राज्यों में पहले से ही महिलाओं के लिए 1,500 से 3,000 रुपये की मासिक योजनाएं चल रही हैं, जिन्हें इस राशि के साथ जोड़ दिया जाए तो एक गरीब परिवार को सालाना करीब एक लाख रुपये की मदद मिल सकती है, जो उनकी पूरी जिंदगी बदल सकती है।
आखिर 'एक देश-एक चुनाव' को देश के लिए इतना जरूरी क्यों माना जा रहा है? केंद्र सरकार का स्पष्ट मानना है कि बार-बार होने वाले चुनावों से सिर्फ पैसे की बर्बादी नहीं होती, बल्कि देश का विकास भी ठप हो जाता है। भारत में औसतन हर छह महीने में कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। लोकसभा, विधानसभा, नगर निगम और पंचायत चुनावों के कारण बार-बार आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होती है, जिससे नई सरकारी नीतियां और विकास कार्य पूरी तरह रुक जाते हैं। पूरी मशीनरी, केंद्र से लेकर राज्य सरकारें और सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष, हमेशा चुनावी मोड में ही नजर आते हैं। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने भी अपनी रिपोर्ट सौंपकर लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने की पुरजोर सिफारिश की है। देश के 47 राजनीतिक दलों में से 32 ने इस व्यवस्था का खुला समर्थन किया है, जबकि 15 दल इसके विरोध में खड़े हैं। समर्थन करने वालों का सबसे बड़ा तर्क यही है कि बार-बार के चुनावी अभियानों में राजनेता और दल पांच साल तक सिर्फ प्रचार में व्यस्त रहते हैं, जिससे दीर्घकालिक और कड़े नीतिगत फैसले लेना मुश्किल हो जाता है।
सार्वजनिक नीतियों के विश्लेषकों के अनुसार, यदि लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनावों को मिला दिया जाए तो देश में कुल चुनावी खर्च लगभग 10 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। अकेले 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब 60 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया था। इस व्यवस्था के लागू होने से न केवल सरकारी खजाने की बचत होगी, बल्कि चुनावों में लगने वाले काले धन और भ्रष्टाचार पर भी काफी हद तक लगाम कसी जा सकेगी। यह कोई नया प्रयोग नहीं है; देश की आजादी के बाद 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ ही होते थे। यह सिलसिला तब टूटा जब 1968-69 में कुछ राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग हो गईं। उस दौर में एक साथ चुनाव होने का सबसे बड़ा फायदा तत्कालीन मजबूत राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को मिला था, जिसका सफलता दर करीब 87.5 फीसदी था। हालांकि, यह सोचना पूरी तरह सही नहीं है कि केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को ही इसका हमेशा फायदा मिलेगा। उदाहरण के तौर पर, ओडिशा में 2014 और 2019 में एक साथ चुनाव हुए, जहां केंद्र में भाजपा की लहर के बावजूद राज्य में नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी ने बाजी मारी। वहीं दूसरी ओर, महाराष्ट्र में 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को झटका लगा, लेकिन बाद में हुए विधानसभा चुनाव में उसने शानदार वापसी की।
विपक्ष की सबसे बड़ी चिंता यही है कि एक साथ चुनाव कराने से क्षेत्रीय मुद्दे पूरी तरह गायब हो जाएंगे और राष्ट्रीय मुद्दों के सामने क्षेत्रीय दल हाशिए पर चले जाएंगे। लोकसभा चुनाव देश की सुरक्षा, विदेश नीति और राष्ट्रीय नेतृत्व जैसे मुद्दों पर लड़े जाते हैं, जबकि विधानसभा चुनाव स्थानीय समस्याओं, सड़क, बिजली और पानी जैसे मुद्दों पर आधारित होते हैं। एक साथ चुनाव होने पर मतदाता के भ्रमित होने और राष्ट्रीय लहर में बह जाने का खतरा बना रहता है। इसके अलावा, बार-बार होने वाले चुनाव सरकारों के लिए एक फीडबैक मैकेनिज्म का काम करते हैं। उदाहरण के तौर पर, 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव हार गई थी। इस हार ने सरकार को सचेत किया, जिसके बाद ईडब्ल्यूएस आरक्षण, किसान सम्मान निधि और पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने जैसे बड़े फैसले तुरंत लिए गए। इसके विपरीत, जब 2023 के अंत में भाजपा ने इन राज्यों में बड़ी जीत दर्ज की, तो अति-आत्मविश्वास का माहौल बना और '400 पार' के नारों के बीच 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी अपने दम पर बहुमत से दूर रह गई और उसे गठबंधन सरकार बैसाखी के सहारे चलानी पड़ी।
आज का भारत आजादी या इमरजेंसी के दौर का भारत नहीं है। अब सोशल मीडिया, साक्षरता और जागरूक आकांक्षी वर्ग की बदौलत मतदाताओं का मूड महज दो-तीन महीनों में पूरी तरह बदल जाता है। लगातार होने वाले चुनाव जनता के हाथ में वह हथियार हैं जिससे वे पल-पल में सरकार पर दबाव बनाए रखते हैं। यदि पांच साल में सिर्फ एक बार चुनाव होंगे, तो राजनीतिक दलों को जनता के बदलते मिजाज को समझने और अपनी गलतियों को सुधारने का मौका नहीं मिलेगा। एक और व्यावहारिक पहलू यह भी है कि चुनाव देश में एक बड़ा आर्थिक चक्र चलाते हैं। पोस्टर-बैनर, गाड़ियां, खान-पान, चुनावी रिसर्च, सर्वे और एजेंसियों का एक बहुत बड़ा कारोबार इस दौरान चलता है, जिससे लाखों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी है। एक देश-एक चुनाव से इस क्षेत्र को भी बड़ा झटका लग सकता है। यह केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के मूल ढांचे को बदलने वाला कदम है। यदि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है और वाकई सात लाख करोड़ रुपये की बचत कर उसे सीधे गरीबों के खातों में डालने में सफल होती है, तो यह देश की तकदीर बदल सकता है, लेकिन इसके साथ आने वाली लोकतांत्रिक चुनौतियों और जनमत के दबाव को बनाए रखने के रास्तों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
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