बदलते सियासी समीकरणों के बीच विपक्ष की नई बिसात और राहुल गांधी का बड़ा दांव



 बदलते सियासी समीकरणों के बीच विपक्ष की नई बिसात और राहुल गांधी का बड़ा दांव

भारतीय राजनीति की तासीर ऐसी है कि यहाँ चुनावी नतीजे आते ही पुरानी दोस्ती की मियाद खत्म हो जाती है और नई मजबूरियां जन्म ले लेती हैं। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों ने देश के राजनीतिक परिदृश्य को एक बार फिर से मथ कर रख दिया है। विपक्ष के जिस 'इंडिया' गठबंधन को लोकसभा चुनाव के बाद एक मजबूत चट्टान की तरह पेश किया जा रहा था, उसकी दरारें अब सतह पर साफ दिखने लगी हैं। दिलचस्प बात यह है कि जो क्षेत्रीय दल कल तक खुद को गठबंधन का सर्वेसर्वा मानकर चल रहे थे, आज वे हार के बाद बैकफुट पर हैं, जबकि कांग्रेस चुनावी झटकों के बीच भी खुद को फायदे में देख रही है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा उलटफेर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की सियासत से निकलकर आ रहा है, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकजुटता के दावों की हवा निकाल दी है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आ गया है। चुनाव प्रचार के दौरान जो ममता बनर्जी कांग्रेस और राहुल गांधी पर बेहद हमलावर थीं, करारी हार का स्वाद चखने के बाद उनके सुर अचानक बदल गए हैं। तृणमूल कांग्रेस, जो कल तक 'इंडिया' ब्लॉक से लगभग बाहर हो चुकी थी, अब फिर से गठबंधन के छाते के नीचे शरण ढूंढ रही है। कोलकाता के राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरें बताती हैं कि ममता बनर्जी को अब फिर से राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की अहमियत समझ में आने लगी है। उन्होंने जून के पहले हफ्ते में ही विपक्ष की एक बड़ी बैठक बुलाने की वकालत कर दी है, जिसमें समान विचारधारा वाले दलों को जुटाने की कवायद तेज हो गई है। यह वही ममता बनर्जी हैं जो कुछ समय पहले तक कांग्रेस को भाव देने के मूड में नहीं थीं, लेकिन हार के बाद बदले हालात में अब वे सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अखिलेश यादव का आभार जता रही हैं। राहुल गांधी ने भी चुनावी कड़वाहट को भुलाकर ममता के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया है और बंगाल में 'वोट चोरी' का आरोप लगाते हुए टीएमसी के समर्थन में खड़े हो गए हैं। यह राजनीति की वह विडंबना है जहाँ कल के दुश्मन आज सबसे बड़े हमदर्द बनकर उभर रहे हैं।

दूसरी तरफ, दक्षिण भारत के सबसे मजबूत राज्य तमिलनाडु से जो खबरें आ रही हैं, वे विपक्षी गठबंधन के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। द्रमुक (डीएमके) और कांग्रेस के बीच का पुराना और मजबूत रिश्ता अब टूटने की कगार पर पहुंच गया है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्य के समीकरण इस कदर बदले कि कांग्रेस, वामपंथी दल और अन्य सहयोगी अचानक डीएमके का साथ छोड़कर अभिनेता से नेता बने सी. जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके के पाले में जाकर सरकार में शामिल हो गए। इस कथित 'विश्वासघात' से डीएमके नेतृत्व इस कदर खफा है कि उसने कांग्रेस की तुलना जोंक से कर दी और पीठ में छुरा घोंपने का आरोप तक लगा दिया। पूर्व डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन के तीखे तेवर यह साफ कर रहे हैं कि डीएमके अब कांग्रेस को माफ करने के मूड में कतई नहीं है। स्थिति यह हो गई है कि डीएमके ने संसद में कांग्रेस के साथ बैठने से भी इनकार कर दिया है और इसके लिए लोकसभा स्पीकर को बकायदा चिट्ठी लिखी गई है। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि डीएमके अब एनडीए का रुख कर सकती है, हालांकि बीजेपी के साथ जाना उसके लिए इतना आसान नहीं होगा क्योंकि परिसीमन जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर उसे अपना स्टैंड पूरी तरह बदलना पड़ेगा।

इस पूरे घटनाक्रम में आम आदमी पार्टी ने भी अपनी राहें अलग कर ली हैं। पंजाब और दिल्ली के आगामी चुनावों को देखते हुए 'आप' ने अब गठबंधन से पूरी तरह दूरी बना ली है और मुद्दों के आधार पर बाहर से समर्थन देने की बात कह रही है। हालांकि, इन तमाम बिखरावों के बावजूद कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी के चेहरे पर कोई मलाल नजर नहीं आता। सच तो यह है कि क्षेत्रीय क्षत्रपों की हार ने कांग्रेस के भीतर एक नई ऊर्जा भर दी है। विपक्षी खेमे में राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर जो सवाल रह-रहकर उठ रहे थे, वे ममता और स्टालिन के कमजोर पड़ते ही पूरी तरह खत्म हो गए हैं। अब राहुल गांधी विपक्ष के निर्विवाद नेता के रूप में खुद को स्थापित देख रहे हैं। यही वजह है कि वे अब और अधिक आक्रामक होकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साध रहे हैं। पार्टी के भीतर हुई रणनीतिक बैठकों से जो छनकर बाहर आ रहा है, उसके मुताबिक राहुल गांधी का दावा है कि देश में आसन्न आर्थिक संकट के चलते बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाएगी और प्रधानमंत्री मोदी के लिए इस दबाव को संभालना नामुमकिन हो जाएगा।

कांग्रेस अब इस माहौल को पूरी तरह अपने पक्ष में मानकर चल रही है। यही कारण है कि विपक्ष ने अब अगले ढाई साल तक लगातार 'आंदोलन मोड' में रहने की एक बड़ी रूपरेखा तैयार की है। लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने जो गलतियां की थीं, उन्हें सुधारने की कोशिश की जा रही है। पिछली बार जब राहुल गांधी ने अकेले 'न्याय यात्रा' निकाली थी, तो क्षेत्रीय दलों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी। इस बार विपक्ष 'इंडिया' ब्लॉक के बैनर तले एक साझा देशव्यापी यात्रा निकालने की तैयारी कर रहा है, जिसमें सभी सहयोगी दलों के नेताओं को शामिल किया जाएगा। विपक्ष की रणनीति अब केवल अंध-बीजेपी विरोध पर केंद्रित रहने की नहीं है, बल्कि वे खुद को जनता के सामने एक मजबूत और व्यावहारिक विकल्प के रूप में पेश करना चाहते हैं। इसके लिए सीधे जनता से जुड़े मुद्दों, जैसे महंगाई, बेरोजगारी और हालिया चुनावों में सामने आए मुद्दों को हथियार बनाया जाएगा। साथ ही, जातीय जनगणना के आंकड़ों को मुख्य मुद्दा बनाकर 2029 के आम चुनाव की जमीन अभी से तैयार करने की कवायद शुरू हो चुकी है। देखना दिलचस्प होगा कि बिखरते कुनबे और नई महत्वाकांक्षाओं के बीच विपक्ष की यह नई बिसात क्या रंग लाती है।

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