यूपी में संघ की बढ़ती सक्रियता
उत्तर प्रदेश की राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हलचल हमेशा दूरगामी संकेत मानी जाती रही है। यही वजह है कि लखनऊ में सरसंघचालक मोहन भागवत का तीन दिवसीय प्रवास सिर्फ एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीतिक तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। संघ इसे शताब्दी वर्ष, प्रशिक्षण वर्ग और संगठन विस्तार से जोड़ रहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि 2024 लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार संघ इतने आक्रामक अंदाज में उत्तर प्रदेश के मैदान में उतरता दिखाई दे रहा है। वजह भी साफ है। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा को यह एहसास करा दिया कि उत्तर प्रदेश में उसका राजनीतिक और सामाजिक समीकरण पहले जैसा अभेद्य नहीं रह गया है।
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को यूपी में बड़ा नुकसान हुआ। 2019 में भाजपा और उसके सहयोगियों ने 80 में से 64 सीटें जीती थीं, जिनमें अकेले भाजपा के खाते में 62 सीटें थीं। लेकिन 2024 में भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई। सहयोगियों को मिलाकर एनडीए का आंकड़ा 36 तक पहुंचा। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनने का दावा मजबूत किया। कांग्रेस ने भी 6 सीटें जीतकर लंबे समय बाद वापसी के संकेत दिए। सबसे अहम बात यह रही कि भाजपा का वोट शेयर 2019 के करीब 50 प्रतिशत से घटकर लगभग 41 प्रतिशत के आसपास आ गया। कई सीटों पर हार का अंतर 20 हजार से भी कम रहा। फैजाबाद, श्रावस्ती, बस्ती, सुल्तानपुर, संतकबीरनगर और बलिया जैसे क्षेत्रों में भाजपा को अप्रत्याशित नुकसान उठाना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह गिरावट सिर्फ सीटों की नहीं थी, बल्कि भाजपा के सामाजिक गठजोड़ में आई कमजोरी का संकेत थी।
लोकसभा चुनाव के आंकड़ों ने साफ कर दिया कि गैर-यादव पिछड़े और दलित वोटों में भाजपा की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रही। 2014 और 2019 में भाजपा को कुर्मी, लोध, मौर्य, निषाद, राजभर और गैर-जाटव दलित वर्गों का बड़ा समर्थन मिला था। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज यानी सीएसडीएस के पोस्ट पोल सर्वे के मुताबिक 2019 में गैर-यादव ओबीसी वोट का लगभग 72 प्रतिशत हिस्सा भाजपा के साथ था, लेकिन 2024 में इसमें गिरावट दर्ज हुई। समाजवादी पार्टी ने पिछड़े वर्गों के बीच ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का नारा देकर नई सामाजिक गोलबंदी की कोशिश की, जिसका असर कई सीटों पर साफ दिखाई दिया। भाजपा को पहली बार यह महसूस हुआ कि सिर्फ हिंदुत्व और मोदी-योगी फैक्टर के भरोसे यूपी की राजनीति को नियंत्रित रखना आसान नहीं होगा।
यही वजह है कि संघ अब बूथ से लेकर सामाजिक अभियानों तक अपनी सक्रियता तेजी से बढ़ा रहा है। लखनऊ में चल रहे प्रशिक्षण वर्ग में अवध, गोरक्ष, काशी और कानपुर प्रांत के स्वयंसेवक शामिल हैं। संघ के भीतर इसे सिर्फ शाखा विस्तार का कार्यक्रम नहीं माना जा रहा। दरअसल संघ जमीन से राजनीतिक फीडबैक जुटाने में लगा है। गांवों, कस्बों और छोटे शहरों से मिल रही रिपोर्टों में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, किसानों की नाराजगी और स्थानीय नेताओं के खिलाफ असंतोष जैसे मुद्दे लगातार सामने आ रहे हैं। पिछले दो वर्षों में उत्तर प्रदेश में पेपर लीक और भर्ती विवादों को लेकर युवाओं में गुस्सा बढ़ा है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग और पुलिस भर्ती परीक्षा से जुड़े विवादों ने सरकार को असहज किया। संघ अब इन मुद्दों की गंभीरता को समझना चाहता है, क्योंकि यही नाराजगी चुनावी नुकसान में बदल सकती है।
संघ की चिंता सिर्फ विपक्ष नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर बढ़ती दूरी भी है। लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी के अंदर संगठन और सरकार के तालमेल को लेकर सवाल उठे। कई सांसदों और विधायकों ने कार्यकर्ताओं की अनदेखी और नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव की शिकायत की। भाजपा के भीतर यह चर्चा भी हुई कि कार्यकर्ता पहले जैसी ऊर्जा के साथ मैदान में नहीं उतर रहे। यही कारण है कि संघ अब ‘ट्रिपल एस मॉडल’ को फिर सक्रिय करने की कोशिश कर रहा है। यह मॉडल संघ, संगठन और सरकार के तालमेल पर आधारित है। संघ वैचारिक आधार और कैडर नेटवर्क देता है, भाजपा संगठन चुनावी रणनीति संभालता है और सरकार योजनाओं के जरिए जनता तक पहुंच बनाती है।
2014 के बाद भाजपा की चुनावी सफलता में इसी मॉडल की बड़ी भूमिका रही। 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यूपी की 80 में से 71 सीटें जीती थीं। 2017 विधानसभा चुनाव में पार्टी को 312 सीटें मिलीं और लगभग 39.7 प्रतिशत वोट शेयर हासिल हुआ। 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 255 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। उस चुनाव में भाजपा गठबंधन का वोट शेयर 43 प्रतिशत से ज्यादा था। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि संघ के बूथ नेटवर्क और सामाजिक अभियानों ने भाजपा को गांव-गांव तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। मतदान वाले दिन संघ के स्वयंसेवक बूथ स्तर पर सक्रिय रहते थे। ‘पहले मतदान, फिर जलपान’ जैसे अभियान सिर्फ नारे नहीं थे, बल्कि संगठित चुनावी रणनीति का हिस्सा थे।
अब 2027 के लिए संघ फिर उसी तरह की तैयारी में जुटा है। संघ के भीतर उत्तर प्रदेश को छह क्षेत्रों अवध, काशी, गोरक्ष, पश्चिम, ब्रज और कानपुर में बांटकर अलग-अलग रणनीति पर काम किया जा रहा है। हर क्षेत्र में सामाजिक समीकरण अलग हैं। पश्चिम यूपी में जाट और दलित राजनीति प्रभावी है, जबकि पूर्वांचल में पिछड़ी जातियां निर्णायक भूमिका निभाती हैं। अवध और मध्य यूपी में ब्राह्मण, कुर्मी और दलित वोट बड़ा असर डालते हैं। संघ अब हर क्षेत्र में अलग सामाजिक अभियान चलाने की तैयारी कर रहा है। सेवा कार्यों, हिंदू सम्मेलनों और घर-घर संपर्क अभियान के जरिए भाजपा के सामाजिक आधार को फिर मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
मोहन भागवत का लखनऊ दौरा इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा संगठन के कई वरिष्ठ नेताओं की उनसे मुलाकात की संभावना है। पिछले कुछ महीनों में योगी और संघ नेतृत्व के बीच लगातार संवाद बढ़ा है। फरवरी में दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद राजनीतिक हलकों में कई तरह के संकेत निकाले गए थे। भाजपा यह समझ चुकी है कि 2027 का चुनाव सिर्फ सरकार की उपलब्धियों के भरोसे नहीं जीता जा सकता। जातीय समीकरण, सामाजिक नाराजगी और बूथ स्तर की मजबूती इस चुनाव में निर्णायक रहने वाली है।
उत्तर प्रदेश लंबे समय से संघ की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला रहा है। 1984 में भाजपा जब सिर्फ दो लोकसभा सीटों तक सिमट गई थी, तब संघ परिवार ने राम मंदिर आंदोलन के जरिए हिंदुत्व की नई राजनीतिक जमीन तैयार की। विश्व हिंदू परिषद और संघ के कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर आंदोलन को सामाजिक अभियान बनाया। उसी आंदोलन ने भाजपा को 1991 में पहली बार यूपी की सत्ता तक पहुंचाया। इसके बाद 2014 में संघ ने पिछड़ी जातियों और दलित समाज के बीच नई रणनीति के साथ काम शुरू किया। सेवा कार्यों और सामाजिक समरसता अभियानों के जरिए भाजपा उन वर्गों तक पहुंची जो पहले उसके साथ नहीं थे।
अब 2027 से पहले संघ की बेचैनी फिर साफ दिखाई दे रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार लड़ाई सत्ता हासिल करने की नहीं, बल्कि सत्ता बचाने की है। भाजपा जानती है कि अगर उत्तर प्रदेश में उसका जनाधार कमजोर हुआ तो उसका असर सिर्फ लखनऊ नहीं, बल्कि दिल्ली की राजनीति पर भी पड़ेगा। यही कारण है कि चुनावी बिगुल बजने से काफी पहले ही संघ ने अपने सबसे अहम राज्य में पूरी ताकत झोंकनी शुरू कर दी है।
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