सिलीगुड़ी कॉरिडोर की 120 एकड़ जमीन और देश की सुरक्षा का नया चक्रव्यूह
भारत के नक्शे को ध्यान से देखें तो उत्तर-पूर्व के सात राज्यों को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला एक बेहद संकरा हिस्सा दिखाई देता है, जिसे सामरिक भाषा में 'चिकन नेक' और भूगोल की भाषा में सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहा जाता है। पश्चिम बंगाल की सत्ता में आए बड़े राजनीतिक बदलाव के बाद अब इस संवेदनशील गलियारे की तस्वीर पूरी तरह बदलने जा रही है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने शपथ ग्रहण के महज दस दिनों के भीतर एक ऐसा बड़ा फैसला लिया है, जिसने देश की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर एक नई लकीर खींच दी है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर की 120 एकड़ बेहद महत्वपूर्ण जमीन को सीधे केंद्र सरकार और सीमा सुरक्षा बल (BSF) के हवाले करने की मंजूरी दे दी गई है। यह वही जमीन है, जिसे लेकर लंबे समय से केंद्र और राज्य के बीच गतिरोध बना हुआ था, लेकिन अब इस फाइल पर जमी धूल साफ हो चुकी है।
इस 120 एकड़ जमीन का नोटिफिकेशन होना सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भारत की संप्रभुता को अभेद्य बनाने की दिशा में उठाया गया सबसे बड़ा कदम है। यह पूरा इलाका नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे अंतरराष्ट्रीय बॉर्डरों से घिरा हुआ है। सिलीगुड़ी के पश्चिम में नेपाल सीमा पर स्थित पानीटंकी से लेकर पूर्वी दिशा में फूलबाड़ी तक फैला यह गलियारा महज 22 किलोमीटर चौड़ा है, जबकि इसकी कुल लंबाई 60 किलोमीटर के करीब है। यही वह बेहद नाजुक नस है, जिस पर भारत के दुश्मन हमेशा से बुरी नीयत रखते आए हैं। किसी भी युद्ध या आपातकाल की स्थिति में अगर दुश्मन इस संकरे रास्ते को ब्लॉक कर दे, तो भारत का संपर्क अपने उत्तर-पूर्वी राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा से पूरी तरह कट सकता है। इसी सामरिक खतरे को भांपते हुए केंद्र सरकार सालों से यहां बुनियादी ढांचे को मजबूत करना चाहती थी, लेकिन स्थानीय सियासत और संघीय ढांचे की दुहाई देकर इस संवेदनशील परियोजना को अटकाया जा रहा था।
अब जब यह जमीन भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और नेशनल हाईवेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHIDCL) के पास आ गई है, तो यहां नेशनल हाईवे के सात बड़े हिस्सों के चौड़ीकरण और आधुनिकीकरण का रास्ता साफ हो गया है। वर्तमान में इस रूट पर सड़कों की हालत ऐसी नहीं थी कि आपात स्थिति में सेना के भारी-भरकम टैंक, मिसाइल सिस्टम और बड़े सैन्य काफिले तेजी से आगे बढ़ सकें। नई सड़कों के बनने से न केवल सिक्किम और उत्तर-पूर्व तक भारतीय सेना की आवाजाही कई गुना तेज हो जाएगी, बल्कि रसद और हथियारों की सप्लाई लाइन भी बिना किसी बाधा के काम कर सकेगी। यह कदम चीन जैसे पड़ोसियों की आक्रामक हरकतों को करारा जवाब है, जो सीमा पार लगातार अपना इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत कर रहे हैं।
इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे क्रांतिकारी योजना इसके नीचे बिछने वाला अंडरग्राउंड रेलवे नेटवर्क है। देश के इतिहास में पहली बार किसी बेहद संवेदनशील बॉर्डर एरिया में सतह से नीचे रेलवे कॉरिडोर बनाने की तैयारी है। इसके तहत टीन माइल हाट से लेकर रंगापानी रेलवे स्टेशनों के बीच करीब 40 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछाई जाएगी, जिसमें एक बड़ा हिस्सा अंडरग्राउंड टनल के रूप में होगा। सतह पर मौजूद रेलवे ट्रैक किसी भी हवाई हमले या गोलाबारी में सबसे पहले निशाना बनते हैं। ऐसे में अगर युद्ध के दौरान ऊपरी ट्रैक को नुकसान पहुंचता है, तो यह अंडरग्राउंड रेल मार्ग बैकअप के तौर पर काम करेगा। इसके जरिए बिना किसी रुकावट के फौज और रसद को सीधे सीमा तक पहुंचाया जा सकेगा। यह भूमिगत नेटवर्क देश की सुरक्षा के लिहाज से गेम चेंजर साबित होने वाला है।
इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी भी अपने पड़ोसियों की जमीन पर बुरी नजर नहीं डाली। साल 1971 के युद्ध में जब भारतीय सेना ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर किया और बांग्लादेश को आजादी दिलाई, तब भारत चाहता तो सुरक्षा के लिहाज से इस संकरे गलियारे को चौड़ा करने के लिए कुछ इलाका अपने नियंत्रण में ले सकता था। लेकिन भारत की नीति हमेशा से 'वसुधैव कुटुंबकम' और पड़ोसी देशों की संप्रभुता का सम्मान करने की रही है। हालांकि, भारत की इस शराफत को दुश्मनों ने हमेशा उसकी कमजोरी समझने की भूल की। कुछ साल पहले दिल्ली दंगों के दौरान भी देश विरोधी तत्वों ने इसी सिलीगुड़ी कॉरिडोर को देश से काटकर भारत सरकार को घुटने पर लाने की साजिश रची थी। लेकिन अब केंद्र सरकार की सीधी निगरानी और मजबूत होते इंफ्रास्ट्रक्चर ने साफ कर दिया है कि भारत की इस 'चिकन नेक' को दबाने का ख्वाब देखने वालों के मंसूबे कभी पूरे नहीं होंगे।
यह रणनीतिक बदलाव उत्तर-पूर्व के सात राज्यों के मन में वर्षों से बैठे एक अनजाने डर को भी हमेशा के लिए खत्म कर देगा। वहां के नागरिकों और स्थानीय सरकारों को हमेशा यह चिंता सताती थी कि मुख्य भूमि से जोड़ने वाला इकलौता रास्ता बेहद कमजोर है। अब जब केंद्र सरकार इस पूरे गलियारे को एक अभेद्य किले में तब्दील करने जा रही है, तो उत्तर-पूर्व की सुरक्षा का यह डर हमेशा के लिए छू-मंतर हो जाएगा। हाईवे और रेलवे के इस नए जाल से न केवल सेना मजबूत होगी, बल्कि इन राज्यों में व्यापार, पर्यटन और आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खुलेंगे। जिसे कभी भारत की सबसे कमजोर कड़ी माना जाता था, वही सिलीगुड़ी कॉरिडोर अब नए भारत की ताकत और अटूट एकता का सबसे बड़ा प्रतीक बनने जा रहा है।
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