यूपी में 'करो या मरो' का रण क्या मायावती का पुराना फॉर्मूला बचा पाएगा नैया?


यूपी में 'करो या मरो' का रण क्या मायावती का पुराना फॉर्मूला बचा पाएगा नैया?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर खिसक चुकी बहुजन समाज पार्टी के लिए आगामी विधानसभा चुनाव अस्तित्व की रक्षा का सबसे बड़ा मैदान बन चुका है। लगातार मिलती चुनावी शिकस्तों और घटते जनाधार के बीच, बसपा प्रमुख मायावती ने एक बार फिर अपने सबसे कामयाब और परखे हुए 'ब्राह्मण कार्ड' पर दांव लगाने का फैसला किया है। कभी इसी सोशल इंजीनियरिंग के बूते साल 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली मायावती अब 2027 के महासमर में इतिहास दोहराने की पुरजोर कोशिश में जुटी हैं। लखनऊ के मॉल एवेन्यू स्थित पार्टी कार्यालय में कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की बंद कमरे में हुई बैठक इस बात का साफ संकेत है कि बसपा अब आक्रामक तरीके से अपने पुराने सियासी और सामाजिक समीकरण को जिंदा करने की फिराक में है। मायावती ने पार्टी कैडर को दोटूक संदेश दिया है कि मौजूदा सत्ता में सर्वसमाज और विशेषकर ब्राह्मण समाज खुद को उपेक्षित और असुरक्षित महसूस कर रहा है। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार की आर्थिक नीतियों को पूंजीपति परस्त बताते हुए दावा किया कि केवल बसपा शासनकाल में ही कमजोरों और प्रबुद्ध वर्ग को वास्तविक हिस्सेदारी और सुरक्षा मिली थी। राजनीति में पुरानी कहावत है कि वक्त और हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते। सियासी विश्लेषक इस दांव को 'काठ की हांडी' की तरह देख रहे हैं, जो बार-बार चूल्हे पर नहीं चढ़ाई जा सकती। सवाल यही है कि क्या बीस साल पुराने फॉर्मूले के सहारे 2027 की वैतरणी पार की जा सकती है, जबकि यूपी की जमीनी हकीकत पूरी तरह बदल चुकी है?

बदल चुका है दो दशकों का सियासी परिदृश्य

साल 2007 और आज के उत्तर प्रदेश में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। दो दशक पहले जब बसपा ने 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है' का नारा देकर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा छुआ था, तब भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ग्रामीण इलाकों में संगठनात्मक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में थे। उस दौर में तत्कालीन सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के खिलाफ जनता और प्रबुद्ध वर्ग में भारी असंतोष था और विपक्ष के तौर पर बसपा ही एकमात्र मजबूत और जिताऊ विकल्प नजर आ रही थी। ब्राह्मण मतदाता हमेशा उस पाले में खड़ा होना पसंद करता है जिसके जीतने की प्रबल संभावना दिखाई देती है। उस समय मायावती के पास मजबूत दलित वोट बैंक का आधार था, जिसमें ब्राह्मणों के जुड़ते ही एक अपराजेय समीकरण तैयार हो गया था। आज की स्थिति बिल्कुल उलट है। साल 2014 के बाद से भाजपा का वैचारिक और ढांचागत आधार सूबे के हर गांव और हर बूथ तक बेहद मजबूत हो चुका है। हिंदुत्व का नैरेटिव, भव्य राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का कायाकल्प और सख्त कानून-व्यवस्था के दावों ने सवर्ण मतदाताओं, खासकर ब्राह्मणों को वैचारिक रूप से सत्ताधारी दल के साथ मजबूती से जोड़ दिया है। ऐसे में भाजपा के इस अभेद्य किले में सेंध लगाना बसपा के लिए टेढ़ी खीर साबित होने वाला है।

नेताओं का टोटा और पिछले प्रयोगों की नाकामी

किसी भी जातिगत समीकरण को जमीन पर उतारने के लिए उस समाज के कद्दावर चेहरों की जरूरत होती है जो जनता के बीच जाकर झंडा बुलंद कर सकें। 2007 के दौर में बसपा के पास सतीश चंद्र मिश्रा के अलावा रामवीर उपाध्याय, बृजेश पाठक, नकुल दुबे, रंगनाथ मिश्रा और राकेश धर त्रिपाठी जैसे बड़े ब्राह्मण चेहरे हुआ करते थे, जिनकी अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत पकड़ थी। आज हालात यह हैं कि सतीश चंद्र मिश्रा को छोड़कर बाकी तमाम बड़े नेता या तो दूसरे दलों में शामिल हो चुके हैं या राजनीति के मुख्य मंच से गायब हैं। कद्दावर नेताओं की कमी के चलते केवल नारों के दम पर ब्राह्मण मतदाताओं को एकाएक गोलबंद करना असंभव सा प्रतीत होता है। बसपा का यह प्रयोग नया नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने इसी रणनीति के तहत पूरे प्रदेश में 'प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन' आयोजित किए थे और करीब 74 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देकर बड़ा दांव खेला था। इसके बावजूद चुनावी नतीजे बेहद निराशाजनक रहे और पार्टी महज एक सीट पर सिमट कर रह गई। सांख्यिकीय आंकड़े बताते हैं कि पिछले चुनाव में करीब 89 फीसदी ब्राह्मण मतदाताओं ने एकमुश्त होकर भाजपा के पक्ष में मतदान किया था। इस कड़वे अनुभव के बाद दोबारा उसी रास्ते पर चलना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं है।

वोट बैंक का गणित और सत्ता की डगर

मायावती का गणित अक्सर इस दावे पर टिकता है कि सूबे के दलित और ब्राह्मण मिलकर किसी भी सरकार को उखाड़ फेंकने का माद्दा रखते हैं। जमीनी हकीकत को देखें तो उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी दावों के विपरीत करीब 8 से 10 फीसदी के आसपास आंकी जाती है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि बसपा का अपना मूल दलित वोट बैंक भी अब पहले की तरह अक्षुण्ण नहीं रहा है। बीते चुनावों के रुझान साफ बताते हैं कि गैर-जाटव दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की जनकल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक समीकरणों के चलते छिटक चुका है। यहां तक कि जाटव मतों में भी सेंधमारी साफ देखी गई है। इसके साथ ही, मुस्लिम और अति पिछड़ी जातियों का झुकाव भी अब पूरी तरह से दूसरे क्षेत्रीय और राष्ट्रीय विकल्पों की तरफ हो गया है। मौजूदा दौर में उत्तर प्रदेश की सत्ता तक पहुंचने के लिए महज 25 से 30 फीसदी वोटों का जुगाड़ काफी नहीं है, बल्कि मुकाबला जीतने के लिए कम से कम 40 से 45 फीसदी मतों की आवश्यकता होती है। सत्तारूढ़ दल पिछले दो चुनावों से लगातार 40 फीसदी से अधिक मत प्रतिशत हासिल कर पूर्ण बहुमत की सरकार चला रहा है। ऐसी स्थिति में, यदि मायावती कुछ हद तक ब्राह्मण मतों को रिझाने में कामयाब हो भी जाती हैं, तो भी बिना गैर-जाटव दलितों, अति पिछड़ों और अकलियत के समर्थन के सत्ता का सिंहासन हासिल करना एक बेहद जटिल और लगभग नामुमकिन सा काम दिखाई देता है। अब देखना यह होगा कि टिकट बंटवारे में अतिरिक्त सावधानी बरतने और बूथ स्तर के संगठन को मजबूत करने का मायावती का यह निर्देश क्या वाकई जमीन पर कोई नया चमत्कार दिखा पाता है या फिर यह महज एक डूबती हुई सियासी कश्ती को बचाने का आखिरी हताश प्रयास बनकर रह जाएगा।

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