यूपी में सोशल इंजीनियरिंग के चक्रव्यूह से पिछड़ों को साधने का नया कांग्रेस प्लान


यूपी में सोशल इंजीनियरिंग के चक्रव्यूह से पिछड़ों को साधने का नया कांग्रेस प्लान

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार                               

उत्तर प्रदेश की सियासत में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर बिसात बिछनी शुरू हो गई है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता को उखाड़ने और अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने के लिए कांग्रेस इस बार एक बेहद आक्रामक और नई रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के गलियारों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि कांग्रेस पार्टी जून के मध्य में सूबे की राजधानी लखनऊ में एक बड़ी बैठक करने जा रही है, जिसका मुख्य एजेंडा 'अत्यंत पिछड़े वर्गों' यानी ईबीसी को अपने पाले में लाना है। लोकसभा चुनावों में मिली आंशिक सफलता के बाद अब देश के सबसे बड़े राज्य में होने वाले दंगों और चुनावी बिसातों के बीच कांग्रेस का यह ईबीसी कार्ड उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है। पिछले कुछ दशकों से राज्य की राजनीति मुख्य रूप से मंडल और कमंडल के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जिससे पारंपरिक तौर पर मजबूत कांग्रेस का जनाधार पूरी तरह खिसक गया था। 1990 के दशक के उभार के बाद राज्य के अधिकांश पिछड़े और दलित वोट बैंक समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और बाद के दिनों में भारतीय जनता पार्टी की ओर शिफ्ट हो गए थे। लेकिन बदलते दौर में कांग्रेस को लगता है कि सामाजिक न्याय के मुद्दे को नए सिरे से उठाकर वह इन जातियों में अपनी पैठ दोबारा बना सकती है।

इस नई रणनीति की कमान खुद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संभाल रखी है। वे अपनी तमाम जनसभाओं में 'पिछड़ा, अत्यंत पिछड़ा और दलित' जैसे शब्दों का बार-बार इस्तेमाल कर रहे हैं। राहुल गांधी की रैलियों में 'जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी' का नारा अब पार्टी का मुख्य नीतिगत वक्तव्य बन चुका है। इसी सिलसिले में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर जातीय जनगणना कराने की मांग को बेहद पुरजोर तरीके से उठाया है, जिस पर अब केंद्र सरकार भी रक्षात्मक रुख अपनाने को मजबूर दिख रही है। राहुल गांधी की प्राथमिकताओं में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी और उसमें भी विशेष रूप से अत्यंत पिछड़ा वर्ग सबसे ऊपर है। हाल ही में रायबरेली और अमेठी के दौरे पर गए राहुल गांधी ने इस चुनावी संदेश को जमीन पर उतारने का प्रयास किया। रायबरेली की 'बहुजन स्वाभिमान सभा' में उन्होंने ऐतिहासिक स्वतंत्रता सेनानी वीरा पासी की मूर्ति का अनावरण किया। पासी समुदाय, जो उत्तर प्रदेश में दलित आबादी का एक बहुत बड़ा और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हिस्सा है, को लुभाने का यह प्रयास कांग्रेस की इसी गहरी सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा है। इस जनसभा में राहुल गांधी का रुख बेहद आक्रामक रहा और उन्होंने सीधे तौर पर देश के शीर्ष नेतृत्व यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को निशाने पर लिया। बीजेपी की तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए उन्होंने संविधान की रक्षा के मुद्दे पर तीखे शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने मंच से हुंकार भरते हुए सवाल उठाया कि अगर कोई देश के संविधान को कमजोर करने या उसे नष्ट करने की कोशिश करता है, तो उसे गद्दार क्यों न कहा जाए।

उत्तर प्रदेश में चुनावी तैयारियां अब केवल भाषणों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सांगठनिक स्तर पर भी कांग्रेस बहुत सक्रिय दिख रही है। पिछले कुछ महीनों के भीतर उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने किसानों, वकीलों, जाटों, गुर्जरों, पासियों, निषादों, लोधियों और सवर्ण जातियों के साथ अलग-अलग दौर की कई महत्वपूर्ण और गोपनीय बैठकें की हैं। कांग्रेस के प्रांतीय नेताओं का मानना है कि इस तरह के सीधे संवाद से पार्टी का जनसंपर्क अभियान मजबूत होगा और आगामी विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन को वैसा ही अप्रत्याशित लाभ मिल सकता है, जैसा 2024 के लोकसभा चुनाव में मिला था। याद रहे कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, जहां 'संविधान खतरे में है' के नैरेटिव ने जमीन पर बड़ा असर दिखाया था और कांग्रेस शून्य से उठकर छह सीटें जीतने में कामयाब रही थी।

हालांकि, 2027 के विधानसभा चुनाव की राह इतनी आसान नहीं है, क्योंकि गठबंधन के भीतर अभी से सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर रस्साकशी के संकेत मिलने लगे हैं। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने सार्वजनिक मंचों से यह साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन एकजुट होकर चुनाव लड़ेगा, लेकिन साथ ही उन्होंने एक व्यावहारिक शर्त जोड़कर कांग्रेस खेमे में हलचल बढ़ा दी है। अखिलेश यादव का कहना है कि आगामी चुनाव में सीट बंटवारे का एकमात्र आधार केवल 'जीत' होगा, कोई और फॉर्मूला नहीं। सपा प्रमुख का यह बयान कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती की तरह है क्योंकि राज्य में कांग्रेस का अपना सांगठनिक ढांचा अभी भी बहुत कमजोर स्थिति में है। अतीत के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की केमिस्ट्री हमेशा एक जैसी नहीं रही है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में जब राहुल और अखिलेश की जोड़ी पहली बार एक साथ आई थी, तब इसे एक बड़ी राजनीतिक क्रांति के रूप में पेश किया गया था, लेकिन नतीजे बेहद निराशाजनक रहे। उस चुनाव में कांग्रेस ने 114 सीटों पर किस्मत आजमाई थी, लेकिन केवल सात सीटों पर सिमट गई और उसे महज 6.25 फीसदी वोट मिले थे। वहीं समाजवादी पार्टी भी 311 सीटों पर लड़कर सिर्फ 47 सीटें ही जीत पाई थी। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों दल अलग-अलग लड़े, जिसमें कांग्रेस का प्रदर्शन अपने इतिहास के सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। पार्टी ने 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन सिर्फ दो सीटें जीत सकी और उसका वोट शेयर गिरकर मात्र 2.33 फीसदी रह गया। इसके उलट सपा ने अकेले दम पर शानदार प्रदर्शन करते हुए 111 सीटें जीतीं और अपना वोट शेयर बढ़ाकर 32.06 फीसदी कर लिया।

इन कड़वे अनुभवों के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में यह जोड़ी एक बार फिर साथ आई और इस बार इनका गणित पूरी तरह हिट साबित हुआ। समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इस सफलता से उत्साहित होकर दोनों दल अब 2027 में भी इसी प्रदर्शन को दोहराने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। अपनी इसी सांगठनिक कमजोरी को दूर करने के लिए कांग्रेस ने इस बार एक बड़ा फैसला लिया है। पार्टी अब केवल विधानसभा चुनाव के भरोसे नहीं बैठना चाहती, बल्कि वह आगामी एमएलसी चुनावों और पंचायत स्तर के चुनावों में भी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व और राज्य प्रभारियों की योजना के अनुसार, पार्टी सूबे की 57,961 पंचायतों, 826 ब्लॉकों और 75 जिला पंचायतों की लगभग 3,500 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने जा रही है। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पार्टी ने रणनीतिक तौर पर लगभग 100 ऐसी जिला पंचायत सीटों की पहचान कर ली है जहां उनकी स्थिति बेहद मजबूत है और उन्हें उम्मीद है कि सीट शेयरिंग के तहत समाजवादी पार्टी उन्हें कम से कम 80 सीटें देने पर राजी हो जाएगी। कांग्रेस का मानना है कि जब तक गांव और ब्लॉक स्तर पर पार्टी के कार्यकर्ता सक्रिय नहीं होंगे, तब तक बीजेपी जैसी विशाल चुनावी मशीनरी का मुकाबला करना असंभव है। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात पर कांग्रेस का यह ईबीसी प्लान और जमीनी स्तर पर संगठन को पुनर्जीवित करने का प्रयास कितना सफल होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना साफ है कि पार्टी अब बैकफुट पर खेलने के मूड में बिल्कुल नहीं है। 

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