मध्य प्रदेश के लिए अहम हो गई हैं मायावती?

क्यों दिल्ली से पहले मध्य प्रदेश के लिए अहम हो गई हैं मायावती?

मध्य प्रदेश।लोकसभा चुनाव 2019 के लिए आए एग्जिट पोल के नतीजों में एनडीए को मिली बढ़त के बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने फेडरल फ्रंट को लेकर बातचीत शुरू कर दी हैं. एनडीए के खिलाफ बन रहे इस फेडरल फ्रंट के लिए मायावती काफी जरूरी मानी जा रहीं हैं. हालांकि, 23 को दिल्ली की कुर्सी के नतीजे आने से पहले मध्य प्रदेश के लिए मायावती काफी अहम हो गई हैं.

एमपी में नेता प्रतिपक्ष और बीजेपी नेता गोपाल भार्गव ने राज्यपाल को चिट्ठी लिखकर सत्र बुलाने की मांग की है. भार्गव ने कहा है कि जिस तरह से केंद्र और राज्य में बीजेपी को अपार जन समर्थन मिल रहा है उससे कई कांग्रेस विधायक भी अपना मन बदल रहे हैं. भार्गव का दावा है कि ये विधायक कमलनाथ सरकार से परेशान हो चुके हैं और बीजेपी के साथ आना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि बीजेपी खरीद फरोख्त नहीं करेगी, लेकिन कांग्रेस के ही विधायक अब उनकी सरकार के साथ नहीं हैं. बीजेपी ने सत्र के दौरान कांग्रेस से बहुमत साबित करने की मांग की है.

साल 2018 के विधानसभा चुनावों में कुल 230 सीटों में से कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं और वो बहुमत के जादुई आंकड़े 116 से दो कदम दूर रह गई थी. बीजेपी को 109 सीटें मिली थी और वो जादुई आंकड़े से 7 कदम दूर थी. इन चुनावों में बसपा को 2, सपा को 1 जबकि निर्दलीयों को 4 सीटें मिली थीं. सपा-बसपा ने पहले ही कांग्रेस के समर्थन का एलान कर दिया था और निर्दलीय भी बाद में उसी के साथ आ गए थे.

बीजेपी के पास एमपी में सरकार बनाने के दो रास्ते हैं- पहला कि बसपा-सपा और निर्दलीय मिलाकर कुल 7 विधायक उन्हें समर्थन दे दें. दूसरा कि कांग्रेस के कुछ विधायक और निर्दलीय या फिर बसपा के दो विधायक उनके साथ आ जाएं. ऐसे में मायावती कांग्रेस के लिए सिर्फ केंद्र में ही नहीं एमपी में भी काफी अहम् हो गयी हैं. 116 के लिए निर्दलीय विधायकों से ज्यादा कांग्रेस बीएसपी पर निर्भर है, क्योंकि सपा का एक विधायक भी इसी वजह से उनके साथ है.मायावती के इनकार से सवाल उठे?

बता दें कि एग्जिट पोल में एनडीए को बहुमत के संकेत मिलने के बाद सोनिया गांधी ने 23 मई को दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक बुलाई है. सोनिया गांधी ने एनडीए विरोधी दलों से संपर्क साधने और रणनीति बनाने को लेकर चर्चा करने के लिए इस मीटिंग की जिम्मेदारी मध्यप्रदेश के सीएम कमलनाथ के आलावा पी चिदंबरम को दी थी. बताया जा रहा है कि कमलनाथ ने बसपा सुप्रीमो से इस मामले में संपर्क साधा था लेकिन कोई जवाब नहीं मिल पाया.

उधर मायावती ने रविवार देर शाम इस तरह की किसी भी बैठक में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है. मायावती का ये इनकार मध्य प्रदेश पर भी लागू हुआ तो कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं.


बता दें कि सरकार बनने के बाद ही सपा और बसपा के विधायक कांग्रेस से नाराज नजर आ रहे थे, बार-बार कमलनाथ ने उनसे बातचीत की थी, लेकिन उसका कोई फायदा नजर नहीं आया. इसी दौरान बीजेपी के बड़े नेता भी आए दिन कमलनाथ सरकार को गिराने का दावा करते नजर आ रहे थे.

कैलाश विजयवर्गीय ने लोकसभा चुनाव से पहले तो यहां तक कह दिया था कि जिस दिन ऊपर से आदेश होगा उसी दिन सरकार गिरा देंगे. ऐसे में बीजेपी के इस कॉन्फिडेंस के पीछे अगर कांग्रेस के बागी समेत बहनजी के विधायक भी हुए तो कमलनाथ सरकार मुश्किल में पड़ सकती है.

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