ईरान पर हमलों से खाड़ी संकट गहराया, भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव तेज बढ़ा
मध्य पूर्व में हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं। ईरान पर अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई के बाद जिस तरह जवाबी हमले हुए हैं, उसने पूरे खाड़ी क्षेत्र को अस्थिरता के घेरे में ला दिया है। मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरों के साथ ही तेल बाजार में हलचल तेज हो गई है। निवेशकों में डर बढ़ा है और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर आशंकाएं गहराने लगी हैं। इस संघर्ष का असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी लहरें एशिया से यूरोप तक महसूस की जा रही हैं।तेल बाजार इस संकट का पहला और सबसे बड़ा शिकार बना है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड के दाम हाल के दिनों में 70 से 72 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहे हैं, लेकिन युद्ध के बढ़ने की स्थिति में कीमतों के 80 डॉलर से ऊपर जाने की आशंका जताई जा रही है। कुछ वैश्विक वित्तीय संस्थानों का अनुमान है कि अगर तनाव लंबे समय तक चला तो 2026 के अंत तक कच्चा तेल 90 से 91 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। वैश्विक उत्पादन में ईरान की हिस्सेदारी लगभग 4 से 5 प्रतिशत मानी जाती है और यदि उसकी सप्लाई बाधित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमी तुरंत महसूस की जाएगी।
खाड़ी क्षेत्र इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि यहीं से दुनिया के बड़े हिस्से को ऊर्जा मिलती है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर प्रतिदिन दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी गुजरती है। भारत के कुल कच्चे तेल और गैस आयात का लगभग आधा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। युद्ध की स्थिति में यदि इस समुद्री मार्ग पर आवाजाही बाधित होती है तो भारत समेत कई देशों के लिए ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है। भारत प्रतिदिन करीब 2.6 मिलियन बैरल तेल इसी क्षेत्र से मंगाता है और इसमें जरा सी रुकावट भी घरेलू बाजार को हिला सकती है।भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का करीब 85 से 90 प्रतिशत आयात से पूरा करता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 161 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया था। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में एक डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का सालाना आयात बिल करीब 9 हजार करोड़ रुपये बढ़ जाता है। अगर कीमतें मौजूदा स्तर से 15 से 20 डॉलर तक बढ़ती हैं तो अतिरिक्त बोझ 1.3 से 1.8 लाख करोड़ रुपये के बीच हो सकता है। इसका सीधा असर राजकोषीय घाटे पर पड़ेगा और रुपये पर दबाव बढ़ेगा।
तेल की कीमतों में उछाल का असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। पेट्रोकेमिकल्स पर आधारित उद्योगों की लागत बढ़ेगी। प्लास्टिक, पेंट, केमिकल और सिंथेटिक फाइबर बनाने वाली कंपनियों को महंगे कच्चे माल का सामना करना पड़ेगा। पॉलिएस्टर और नायलॉन जैसे कपड़ों के दाम बढ़ सकते हैं। डीजल महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी, जिसका असर फल, सब्जी और अनाज जैसी रोजमर्रा की चीजों पर पड़ेगा। इसका मतलब है कि महंगाई का दबाव आम आदमी की जेब पर सीधे महसूस होगा।खाड़ी संकट का एक और असर अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और व्यापारिक मार्गों पर दिखने लगा है। सुरक्षा कारणों से कई एयरलाइंस ने दुबई और दोहा जैसे बड़े हब्स तक अपनी उड़ानों को सीमित किया है। कुछ रूट बदले गए हैं, जिससे उड़ानों का समय और ईंधन खर्च बढ़ा है। इसका असर टिकटों के दाम और कार्गो परिवहन पर पड़ सकता है। खाड़ी देशों पर निर्भर पर्यटन उद्योग को भी झटका लग सकता है, क्योंकि असुरक्षा का माहौल यात्रियों को दूर रहने पर मजबूर करता है।
भारत और ईरान के बीच व्यापार पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनाव के कारण सीमित हो चुका है। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार लगभग 1.68 अरब डॉलर रहा। इसमें भारत का निर्यात करीब 1.24 अरब डॉलर और आयात लगभग 0.44 अरब डॉलर रहा, जिससे भारत को करीब 0.80 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष मिला। भारत ईरान को मुख्य रूप से बासमती चावल, दवाइयां और अन्य खाद्य सामग्री निर्यात करता है। केवल बासमती चावल का निर्यात करीब 698 मिलियन डॉलर के आसपास रहा। अगर युद्ध के कारण शिपमेंट रुकते हैं या भुगतान व्यवस्था प्रभावित होती है तो इसका सीधा नुकसान भारतीय किसानों और निर्यातकों को होगा।बाजारों में अस्थिरता का असर शेयर बाजार पर भी दिखने लगा है। जोखिम बढ़ने पर निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं। सोने की कीमतों में तेजी इसी का संकेत है। डॉलर मजबूत होने से उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है। भारत के लिए इसका मतलब है आयात महंगा होना और विदेशी निवेश में संभावित कमी। ऐसे हालात में सरकार और केंद्रीय बैंक को मुद्रा और महंगाई को संतुलित रखने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़ सकते हैं।
रणनीतिक दृष्टि से यह संघर्ष केवल ईरान और उसके विरोधियों के बीच नहीं रह गया है। खाड़ी क्षेत्र में मौजूद सैन्य ठिकाने, समुद्री मार्ग और तेल टर्मिनल सभी संभावित निशाने बन गए हैं। यही वजह है कि वैश्विक शक्तियां लगातार हालात पर नजर रखे हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तनाव कम करने की अपीलें तेज हो गई हैं, लेकिन जमीनी हालात फिलहाल राहत के संकेत नहीं दे रहे।विशेषज्ञों का मानना है कि अगर संघर्ष सीमित रहता है तो तेल की कीमतें कुछ समय बाद स्थिर हो सकती हैं, लेकिन अगर यह लंबा चला और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर असर पड़ा तो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए यह बड़ा झटका होगा। भारत जैसे देश, जो विकास और औद्योगिक विस्तार के दौर में हैं, उनके लिए महंगे ऊर्जा संसाधन आर्थिक रफ्तार को धीमा कर सकते हैं। सरकार के सामने चुनौती होगी कि वह पेट्रोल-डीजल की कीमतों को कैसे संभाले और महंगाई पर कैसे काबू रखे।कुल मिलाकर ईरान पर हमलों के बाद पैदा हुआ यह संकट केवल युद्ध की खबर नहीं है, बल्कि यह तेल, व्यापार और महंगाई से जुड़ा वैश्विक आर्थिक मुद्दा बन चुका है। खाड़ी में बढ़ता तनाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार संतुलन और आम आदमी की जिंदगी पर असर डाल सकता है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि यह टकराव सीमित रहता है या पूरी दुनिया के लिए एक नई आर्थिक परीक्षा बनता है।
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