बीजेपी से नाराज ब्राह्मणों पर सभी दलों का दांव


 बीजेपी से नाराज ब्राह्मणों पर सभी दलों का दांव

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीस साल लंबा वक्त होता है. इतने समय में चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं, गठबंधन टूटते-बनते हैं, लेकिन कुछ बुनियादी सच जस के तस रहते हैं. जाति, सामाजिक संतुलन और सत्ता तक पहुंचने की जद्दोजहद. साल 2007 में जिस सोशल इंजीनियरिंग ने सत्ता का ताला खोला था, करीब दो दशक बाद वही प्रयोग बदले पैकेज में फिर लौटता दिख रहा है. फर्क बस इतना है कि अब हालात ज्यादा जटिल हैं, मतदाता ज्यादा सजग हैं और सियासी खिलाड़ी एक-दूसरे की चाल पहले से बेहतर समझते हैं.2027 के विधानसभा चुनाव को अभी वक्त है, लेकिन मैदान अभी से सज चुका है. हर दल अपने-अपने स्तर पर उस वोट बैंक की तलाश में है, जो सत्ता की सीढ़ी का आखिरी पायदान बन सकता है. इस पूरी कवायद के केंद्र में एक बार फिर ब्राह्मण वोटर आ खड़ा हुआ है. उत्तर प्रदेश की आबादी में करीब बारह फीसदी हिस्सेदारी रखने वाला यह वर्ग लंबे समय से किसी एक पार्टी का स्थायी वोट बैंक नहीं रहा. कभी सत्ता के साथ, कभी असंतोष में, कभी खामोशी से और कभी मुखर होकर इस वर्ग ने सियासत की दिशा बदली है.

करीब उन्नीस साल पहले बहुजन राजनीति की अगुआ मायावती ने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का जो प्रयोग किया था, उसने यह साबित कर दिया था कि अगर सामाजिक समीकरण सधे हों तो सियासी गणित ध्वस्त भी हो सकता है. 2007 की जीत उसी प्रयोग की देन थी. लेकिन समय के साथ वही फार्मूला कमजोर पड़ता गया. दलित-मुस्लिम समीकरण आजमाया गया, फिर दोबारा ब्राह्मणों की ओर हाथ बढ़ाया गया, लेकिन बीएसपी का जनाधार सिमटता चला गया. 2022 में पार्टी एक सीट पर आ गई. यह गिरावट खुद बताती है कि सिर्फ नारे और प्रतीक काफी नहीं होते, जमीन पर भरोसा भी चाहिए.इसी बदले हुए माहौल में सोशल इंजीनियरिंग 2.0 की चर्चा शुरू हुई है. इस बार प्रयोग सिर्फ एक दल नहीं कर रहा. समाजवादी पार्टी, बीएसपी, बीजेपी और उनके सहयोगी सभी अपने-अपने तरीके से ब्राह्मण वोटर की नब्ज टटोल रहे हैं. फर्क यही है कि अब दलित वोटर को केंद्र में रखने के बजाय कई जगह ओबीसी वोटर को मुख्य धुरी बनाया जा रहा है और ब्राह्मण को उसके साथ जोड़ने की कोशिश हो रही है.

इस पूरी सियासत में सबसे दिलचस्प और आक्रामक एंट्री हुई है सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की. पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश राजभर ने आजमगढ़ से जो संदेश दिया है, वह सिर्फ एक रैली भर नहीं है. आजमगढ़ वही इलाका है, जिसे समाजवादी पार्टी का अभेद्य किला माना जाता रहा है. यहां से मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव सांसद रह चुके हैं. आज भी जिले की सभी विधानसभा सीटों पर समाजवादी पार्टी का कब्जा है. ऐसे इलाके में ब्राह्मणों की बड़ी रैली करना सीधे तौर पर सपा के सामाजिक आधार को चुनौती देना है.राजभर की रैली में ब्राह्मण समाज के सम्मान की बात हुई, परशुराम और सुहेलदेव के नारे लगे, यूजीसी के नए नियमों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के मुद्दे उठे. संदेश साफ था कि यह सिर्फ भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे, नौकरीपेशा और प्रभावशाली ब्राह्मण वर्ग को भरोसा देने की कोशिश है. मंच से यह भी जताया गया कि न्याय और सम्मान की लड़ाई में सरकार और अदालत दोनों दरवाजे खुले हैं. यह भाषा सीधे उस वर्ग से संवाद करती है, जो खुद को दिशा देने वाला मानता है.

इस रणनीति का एक और पहलू है. राजभर का निशाना बार-बार समाजवादी पार्टी पर रहा. संदेश यह कि आजमगढ़ में जो भीड़ जुटी है, वह सिर्फ समर्थन देने नहीं, बल्कि सपा के दबदबे को तोड़ने आई है. यह दावा जितना राजनीतिक है, उतना ही मनोवैज्ञानिक भी. चुनाव से पहले अगर किसी क्षेत्र में यह धारणा बन जाए कि मुकाबला अब एकतरफा नहीं रहा, तो वोटर का व्यवहार बदलने लगता है.उधर, समाजवादी पार्टी भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी. पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का जो फॉर्मूला लोकसभा चुनाव 2024 में असरदार साबित हुआ, उसी को आगे बढ़ाने की तैयारी है. लेकिन साथ ही ब्राह्मणों के बीच संदेश देने की कोशिशें भी दिख रही हैं. विधानसभा में नेता विपक्ष के तौर पर माता प्रसाद पांडेय की नियुक्ति, पूर्वांचल के प्रभावशाली ब्राह्मण परिवारों से मुलाकातें और सोशल मीडिया के जरिए दिए जा रहे संकेत इसी दिशा में पढ़े जा रहे हैं.

बीजेपी के लिए स्थिति और भी नाजुक है. सत्ता में होने के फायदे हैं, लेकिन एंटी-इनकंबेंसी का दबाव भी. पार्टी के भीतर ब्राह्मण बनाम ठाकुर की चर्चाएं सामने आ चुकी हैं. कुछ ब्राह्मण विधायकों की बैठक और उस पर नेतृत्व की नाराजगी ने साफ कर दिया कि अंदरखाने खींचतान है. बरेली से लेकर प्रयागराज तक सामने आए विवादों ने इस असंतोष को और हवा दी. यही वजह है कि उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक जैसे चेहरे प्रतीकात्मक कदमों के जरिए ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश करते नजर आए.कांग्रेस इस पूरी बहस में अपेक्षाकृत खामोश है. एक तरफ राहुल गांधी की ओबीसी राजनीति, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की मजबूरी. कभी उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की पहली पसंद रही कांग्रेस अब असमंजस में दिखती है. क्या वह दोबारा उस वर्ग की ओर खुले मन से लौट पाएगी, या मौजूदा लाइन पर ही चलेगी, यह वक्त बताएगा.

असल सवाल यह है कि क्या ब्राह्मण वोट बैंक आज भी किसी सोशल इंजीनियरिंग का निर्णायक आधार बन सकता है. आंकड़े बताते हैं कि सवर्ण आबादी करीब बीस फीसदी है, जिसमें ब्राह्मण सबसे बड़ा हिस्सा हैं. लेकिन यह वोट हमेशा जाति के आधार पर एकजुट नहीं होता. उम्मीदवार, क्षेत्रीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और सत्ता का माहौल सब मिलकर फैसला तय करते हैं. यही कारण है कि ब्राह्मण राजनीति जोखिम भरी भी है और जरूरी भी.2027 की ओर बढ़ते उत्तर प्रदेश में सियासत अब सिर्फ नारों की नहीं, बल्कि धैर्य, संगठन और भरोसे की परीक्षा बनती जा रही है. सोशल इंजीनियरिंग 2.0 का शोर तेज है, लेकिन उसका नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन सा दल प्रतीकों से आगे जाकर ज़मीनी हकीकत को साध पाता है. ब्राह्मण वोटर इस बार भी निर्णायक हो सकता है, लेकिन किसके पक्ष में, यह अभी पूरी तरह खुला सवाल है.

Post a Comment

0 Comments