सपा की अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने हिंदुत्व में फूट की कोशिश

 


 सपा की अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने हिंदुत्व में फूट की कोशिश

प्रयागराज के झूंसी थाने में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ अदालत के आदेश पर दर्ज एफआईआर ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक बार फिर धर्म, कानून और सत्ता के चौराहे पर ला खड़ा किया है। मामला जितना कानूनी है, उससे कहीं ज्यादा उसका असर सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर दिख रहा है। आरोप बेहद गंभीर हैं, धाराएं सख्त हैं और समय ऐसा जब हर घटना को चुनावी गणित से जोड़कर देखा जा रहा है। यही वजह है कि यह प्रकरण तेजी से सूबे की राजनीति के केंद्र में आ गया है।एफआईआर में पॉक्सो एक्ट समेत गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। यह कानून बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में देश का सबसे सख्त कानून माना जाता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2022 में देशभर में करीब 54 हजार पॉक्सो मामले दर्ज हुए थे। इनमें अकेले उत्तर प्रदेश से लगभग 7,500 मामले सामने आए, यानी कुल मामलों का करीब 14 प्रतिशत। इनमें से करीब 65 प्रतिशत मामलों में पीड़ित की उम्र 16 साल से कम थी। आंकड़े बताते हैं कि यूपी में हर दिन औसतन 20 से अधिक पॉक्सो मामले दर्ज होते हैं। ऐसे माहौल में किसी बड़े धार्मिक पद पर बैठे व्यक्ति पर इस कानून के तहत एफआईआर दर्ज होना स्वाभाविक रूप से असाधारण घटना मानी जा रही है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे सुनियोजित साजिश बताया है। उनका कहना है कि जिन घटनाओं का उल्लेख शिकायत में किया गया है, वे कथित तौर पर 15 से 20 साल पुरानी बताई जा रही हैं। सवाल यह उठता है कि इतने लंबे समय बाद मामला क्यों सामने आया। शंकराचार्य का दावा है कि उनके गुरुकुल में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और जांच एजेंसियां चाहें तो तथ्यों की निष्पक्ष जांच कर सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि वह जांच से भागेंगे नहीं और कानून का सामना करेंगे, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के पीछे राजनीतिक मंशा साफ दिखाई दे रही है।

यहीं से यह मामला राजनीति की जमीन पर उतर आता है। समाजवादी पार्टी खुलकर शंकराचार्य के समर्थन में सामने आई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस एफआईआर को सरकार की नीयत से जोड़ते हुए योगी सरकार पर तीखा हमला बोला। अखिलेश यादव का कहना है कि जो सरकार खुद को सनातन धर्म की रक्षक बताती है, वही आज धर्म के सबसे प्रतिष्ठित पदों में से एक पर बैठे शंकराचार्य को झूठे आरोपों में घसीट रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की विदेश यात्राओं का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब प्रदेश में इतना संवेदनशील मामला सामने आया है, तब सरकार की प्राथमिकता क्या है।अखिलेश यादव ने इस विवाद को केवल धार्मिक या कानूनी मुद्दा मानने से इनकार किया। उन्होंने इसे पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति से जोड़ते हुए कहा कि मौजूदा सरकार की नीतियों से समाज के बड़े हिस्से में नाराजगी बढ़ रही है। सपा के आंतरिक सर्वे के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में यूपी के ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी की दर करीब 12 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 10 प्रतिशत के आसपास है। महंगाई के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक है। खाद्य पदार्थों की कीमतों में पिछले तीन साल में औसतन 25 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सपा का तर्क है कि जब जनता पहले से इन समस्याओं से जूझ रही है, तब ऐसे विवाद सरकार के खिलाफ माहौल को और तेज कर रहे हैं।

सरकार और उसके समर्थक इस पूरे मामले को कानून के राज से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि एफआईआर अदालत के आदेश पर दर्ज हुई है और पुलिस केवल न्यायिक निर्देशों का पालन कर रही है। भाजपा समर्थकों का तर्क है कि कानून सबके लिए समान है और धार्मिक पद या सामाजिक हैसियत किसी को कानून से ऊपर नहीं रख सकती। हालांकि यह भी सच है कि सरकार की ओर से अब तक कोई विस्तृत राजनीतिक बयान सामने नहीं आया है, जिसे विपक्ष अपने पक्ष में भुना रहा है।धार्मिक और सामाजिक स्तर पर भी यह मामला गहरे असर छोड़ रहा है। संत समाज का एक वर्ग शंकराचार्य के समर्थन में सामने आया है और इसे सनातन परंपरा पर हमला बता रहा है। उनका कहना है कि ऐसे आरोपों से न सिर्फ एक व्यक्ति, बल्कि पूरी संत परंपरा की छवि धूमिल होती है। वहीं कुछ धार्मिक संगठनों का मत है कि आरोप गंभीर हैं और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आंकड़ों के अनुसार, यूपी में दर्ज पॉक्सो मामलों में करीब 9 से 10 प्रतिशत मामलों में आरोपी सामाजिक रूप से प्रभावशाली या धार्मिक संस्थाओं से जुड़े पाए गए हैं, जिससे ऐसे मामलों में विवाद और राजनीतिक दबाव बढ़ जाता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में धर्म आधारित मुद्दे हमेशा चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में धार्मिक ध्रुवीकरण ने बड़ी भूमिका निभाई थी। अब जबकि 2027 का विधानसभा चुनाव दूर नहीं है, ऐसे विवादों का असर धीरे-धीरे जमीन पर दिखने लगेगा। सपा इसे सत्ता की कथित दमनकारी नीति और संतों के अपमान के रूप में पेश कर रही है, जबकि भाजपा इसे न्यायिक प्रक्रिया बताकर अपने ऊपर लगे राजनीतिक आरोपों से बचने की कोशिश कर रही है। फिलहाल जांच शुरुआती दौर में है और कानूनी प्रक्रिया को पूरा होने में लंबा समय लग सकता है। लेकिन इतना तय है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर दर्ज एफआईआर अब सिर्फ एक कानूनी कार्रवाई नहीं रह गई है। यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म, सत्ता और जनभावनाओं के टकराव का बड़ा प्रतीक बन चुकी है। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी और नए तथ्य सामने आएंगे, वैसे-वैसे इस विवाद का राजनीतिक तापमान और बढ़ेगा, और इसका असर सूबे की राजनीति पर लंबे समय तक महसूस किया जाएगा।


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