तमिल फिल्म स्टार विजय बनाम स्टालिन की जंग
तमिलनाडु की राजनीति में इस वक्त जो हलचल दिखाई दे रही है, वह सिर्फ एक नए दल या एक फिल्म स्टार की एंट्री भर नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की परीक्षा है, जो दशकों से लगभग तय ढांचे में चलती रही है। द्रविड़ राजनीति, मजबूत कैडर, जातीय समीकरण और गठबंधन आधारित सत्ता संतुलन के बीच थलपति विजय का सामने आना एक असहज सवाल खड़ा करता है कि क्या वाकई जनता अब किसी तीसरे रास्ते को मौका देने के मूड में है। वेल्लोर की जनसभा इसी सवाल का पहला सार्वजनिक संकेत बनी, जहां विजय ने खुद को किसी समझौते की राजनीति से अलग खड़ा किया और साफ कर दिया कि यह लड़ाई उनके लिए व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के खिलाफ है।तमिलनाडु में इस समय करीब 5.6 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं। इनमें युवा मतदाताओं की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है और शहरीकरण के साथ-साथ राजनीतिक प्राथमिकताएं भी बदली हैं। बीते दो दशकों में राज्य ने सामाजिक कल्याण की कई योजनाएं देखीं, लेकिन साथ ही बेरोजगारी, निजी क्षेत्र में अवसरों की कमी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को लेकर असंतोष भी पनपा। यही वह जमीन है, जिस पर विजय अपनी राजनीति खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका तर्क सीधा है कि द्रविड़ राजनीति ने पहचान तो दी, लेकिन अब वह जड़ हो चुकी है और नए दौर की चुनौतियों का जवाब देने में असफल साबित हो रही है।
सत्ता में मौजूद द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के सामने यह चुनौती इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पार्टी का संगठन मजबूत होने के बावजूद एंटी इन्कंबेंसी धीरे-धीरे सिर उठा रही है। मुख्यमंत्री एम के स्टालिन की छवि एक प्रशासक की है, लेकिन सत्ता के वर्षों में छोटे-बड़े आरोप, योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी और नौकरशाही पर निर्भरता ने सरकार को आलोचना के दायरे में ला दिया है। विजय इसी असंतोष को एक नैरेटिव में बदलना चाहते हैं, जिसमें वे खुद को जनता की सीधी आवाज के रूप में पेश करते हैं।राजनीतिक गणित के लिहाज से देखें तो तमिलनाडु की 234 विधानसभा सीटों में पिछले चुनाव में डीएमके गठबंधन ने 159 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। विपक्ष उस समय कमजोर और बिखरा हुआ था। आज भी अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम वैसी आक्रामक स्थिति में नहीं दिखती, जैसी जयललिता के दौर में हुआ करती थी। इसी खालीपन को विजय एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। वे जानते हैं कि डीएमके विरोधी वोट अगर एक जगह केंद्रित हो जाए, तो सत्ता समीकरण बदल सकता है। यही वजह है कि वे एआईएडीएमके को लगभग नजरअंदाज करते हुए सीधे सत्ता को चुनौती दे रहे हैं, ताकि खुद को मुख्य विकल्प के तौर पर स्थापित कर सकें।
विजय का एक अहम राजनीतिक फैसला किसी भी बड़े दल से गठबंधन न करने का है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने डीएमके के साथ बने रहने का फैसला किया, भले ही उसे ज्यादा सीटें और सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली। इससे साफ हो गया कि टीवीके और कांग्रेस की राहें फिलहाल अलग हैं। विजय इसे कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान की मजबूती के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका दावा है कि तमिलनाडु की जनता अब मजबूरी में नहीं, बल्कि भरोसे के आधार पर वोट देना चाहती है।इतिहास में सिनेमा से राजनीति में आए नेताओं के उदाहरण तमिलनाडु और पड़ोसी राज्यों में पहले भी रहे हैं। आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव ने 1983 में जिस तरह सत्ता पलट दी थी, वह आज भी चर्चा का विषय है। उस वक्त कांग्रेस के बार-बार मुख्यमंत्री बदलने से जनता में नाराजगी चरम पर थी। दूसरी ओर, हाल के वर्षों में कमल हासन की पार्टी चुनावी राजनीति में अपेक्षित असर नहीं छोड़ पाई। विजय इन दोनों ध्रुवों के बीच खड़े हैं। फर्क यह है कि वे ऐसे समय आए हैं, जब असंतोष तो है, लेकिन वह अभी तक एक लहर में तब्दील नहीं हुआ है।
विजय की सामाजिक ताकत उनके समर्थक हैं, खासकर युवा और महिलाएं। 18 से 40 साल की उम्र के मतदाताओं में उनकी लोकप्रियता किसी पारंपरिक नेता जैसी नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आइकन जैसी है। यही वजह है कि वे अपने समर्थकों को सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि संदेशवाहक मानते हैं। उनका आह्वान है कि युवा अपने घरों में बुजुर्गों से बात करें और उन्हें बदलाव के लिए राजी करें। तमिलनाडु जैसे राज्य में, जहां परिवार के भीतर राजनीतिक झुकाव पीढ़ियों तक चलता है, यह रणनीति अहम हो सकती है।
विजय पर यह आरोप भी लगता रहा है कि वे भारतीय जनता पार्टी पर खुलकर हमला नहीं करते। इसकी एक वजह रणनीतिक मानी जा रही है। वे फिलहाल खुद को राज्य की राजनीति तक सीमित रखना चाहते हैं और राष्ट्रीय ध्रुवीकरण से दूरी बनाकर चल रहे हैं। उनकी फिल्मों से जुड़ा सेंसर विवाद भी इस लिहाज से अहम है कि उन्होंने उसे सियासी हथियार नहीं बनाया। वे जानते हैं कि अगर वे हर मुद्दे को अभिनेता की तरह उठाएंगे, तो नेता के रूप में उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे।संगठन के मोर्चे पर विजय की राह सबसे कठिन है। तमिलनाडु की राजनीति में बूथ स्तर का प्रबंधन निर्णायक भूमिका निभाता है। सिर्फ लोकप्रियता से चुनाव नहीं जीते जाते। टीवीके अभी इस मोर्चे पर निर्माण की अवस्था में है। जिला स्तर पर ढांचा खड़ा किया जा रहा है, कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां दी जा रही हैं और संभावित उम्मीदवारों की पहचान की जा रही है। यह प्रक्रिया समय लेने वाली है और यहीं पर विजय की असली परीक्षा होगी।
चुनावी आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु में औसतन 65 से 70 फीसदी मतदान होता है। अगर कुल वोट का 10 से 15 फीसदी हिस्सा भी किसी नए दल की तरफ मुड़ता है, तो 20 से 30 सीटों का गणित बदल सकता है। विजय इसी स्पेस पर नजर लगाए हुए हैं। वे जानते हैं कि भले ही वे सत्ता तक न पहुंचें, लेकिन अगर वे निर्णायक वोट शेयर हासिल कर लेते हैं, तो भविष्य की राजनीति में उनकी भूमिका अनदेखी नहीं की जा सकेगी।थलपति विजय की राजनीति इसलिए भी अहम है क्योंकि यह तमिलनाडु में जमी हुई धारणाओं को चुनौती देती है। यह प्रयोग सफल होगा या नहीं, यह तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि 2026 का चुनाव सिर्फ सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह नहीं होगा। यह इस सवाल का जवाब भी देगा कि क्या तमिलनाडु की राजनीति द्रविड़ ध्रुवों से बाहर किसी नए नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार है। विजय ने इस बहस को जन्म दे दिया है और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जाएगी, चाहे नतीजा कुछ भी हो।
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