2027 में पीडीए बनाम भाजपा रणनीति

  

2027  में सपा की पीडीए बनाम भाजपा का हिंदुत्व

उत्तर प्रदेश की राजनीति का स्वभाव हमेशा से अस्थिर सामाजिक समीकरणों पर टिका रहा है। यहां कोई भी राजनीतिक फार्मूला स्थायी नहीं रहा। हर चुनाव के साथ जातीय और सामाजिक समीकरणों का नया गणित बनता है और उसी के सहारे सत्ता का रास्ता तय होता है। 2024 के लोकसभा चुनाव ने भी इसी परंपरा को एक बार फिर साबित किया। एक दशक से राज्य की राजनीति में मजबूत दिख रही भारतीय जनता पार्टी को इस चुनाव में बड़ा झटका लगा और समाजवादी पार्टी ने 37 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने का दावा पेश किया। कांग्रेस के साथ गठबंधन ने कुल मिलाकर 43 सीटों का आंकड़ा छू लिया, जबकि भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई। यही परिणाम अब 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीति की दिशा तय करने वाले आधार के रूप में देखा जा रहा है।दरअसल 2014 के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने राज्य की राजनीति को पारंपरिक जातीय समीकरणों से हटाकर हिंदुत्व और कल्याणकारी योजनाओं के मिश्रण की ओर मोड़ दिया। गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों को साथ जोड़ने की रणनीति ने भाजपा को लगातार चुनावी सफलता दिलाई। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 में से 312 सीटों पर जीत दर्ज कर अभूतपूर्व बहुमत हासिल किया और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने 255 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी। यह उत्तर प्रदेश में तीन दशक बाद किसी पार्टी की लगातार दूसरी पूर्ण बहुमत की सरकार थी।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने पहली बार संकेत दिया कि राजनीतिक जमीन पूरी तरह स्थिर नहीं है। समाजवादी पार्टी ने इस चुनाव में अपने पारंपरिक ‘मुस्लिम-यादव’ समीकरण से बाहर निकलने की कोशिश की और पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक यानी पीडीए का नया राजनीतिक नारा दिया। इस रणनीति के तहत टिकट वितरण में भी बड़ा बदलाव किया गया। कई सीटों पर गैर-यादव पिछड़े और दलित उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रयोग ने कई क्षेत्रों में सामाजिक ध्रुवीकरण को नया रूप दिया और भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में भी कुछ हद तक सेंध लगी।समाजवादी पार्टी की इस सफलता का एक अहम कारण कांग्रेस के साथ गठबंधन भी रहा। 2014 में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो सीटें मिली थीं और 2019 में यह संख्या घटकर एक रह गई थी। लेकिन 2024 में कांग्रेस ने छह सीटों पर जीत दर्ज की। विपक्षी वोटों का यह आंशिक एकीकरण भाजपा के लिए चुनौती बना। कई सीटों पर मुकाबला सीधा हो गया और यही स्थिति चुनावी परिणामों में भी दिखाई दी।हालांकि यह भी उतना ही सच है कि भाजपा का राजनीतिक आधार कमजोर नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त प्रशासनिक छवि अभी भी भाजपा की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। योगी सरकार कानून-व्यवस्था को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य में माफिया के खिलाफ कार्रवाई और अपराध नियंत्रण को भाजपा लगातार राजनीतिक मुद्दा बनाती रही है। इसके अलावा बुनियादी ढांचा विकास भी भाजपा के चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा है।

उत्तर प्रदेश में पिछले आठ वर्षों के दौरान एक्सप्रेसवे नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ है। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे और गंगा एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं को सरकार विकास के प्रतीक के रूप में पेश करती है। इसके अलावा अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का विकास और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की रणनीति भी भाजपा की राजनीति के केंद्र में है। पार्टी यह संदेश देने की कोशिश करती है कि विकास और सांस्कृतिक पहचान दोनों को साथ लेकर चलने का मॉडल ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।यही वह राजनीतिक पृष्ठभूमि है जिसमें 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है। समाजवादी पार्टी इस बार पीडीए रणनीति को और मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी संगठन के स्तर पर पिछड़े और दलित समुदायों के बीच लगातार संपर्क अभियान चला रही है। अखिलेश यादव यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन जरूरी है और पीडीए उसी दिशा में उठाया गया कदम है।लेकिन इस रणनीति के सामने कई चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विधानसभा चुनाव में मुद्दे अक्सर स्थानीय होते हैं। लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे और प्रधानमंत्री का चेहरा निर्णायक होता है, लेकिन विधानसभा चुनाव में मतदाता स्थानीय नेतृत्व और प्रशासनिक कामकाज के आधार पर भी फैसला लेते हैं। इस लिहाज से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रभाव अभी भी काफी मजबूत माना जाता है।

दूसरी चुनौती बहुजन समाज पार्टी की मौजूदगी है। भले ही हाल के चुनावों में बसपा का प्रदर्शन कमजोर रहा हो, लेकिन दलित वोट बैंक पर उसका पारंपरिक प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। मायावती पहले ही पीडीए की राजनीति को लेकर सवाल उठा चुकी हैं और इसे बहुजन वोटों को भ्रमित करने वाली रणनीति बता चुकी हैं। अगर दलित वोट पूरी तरह समाजवादी पार्टी के साथ नहीं आता तो पीडीए का गणित कमजोर पड़ सकता है।भाजपा भी इस चुनौती को समझती है और सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए संगठनात्मक स्तर पर लगातार काम कर रही है। पार्टी गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और ब्राह्मणों के बीच नए सिरे से संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही सनातन और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा भी भाजपा के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना हुआ है।यानी 2027 का चुनाव केवल दो दलों के बीच सत्ता की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के सामाजिक गठबंधनों की नई परीक्षा भी होगा। एक तरफ अखिलेश यादव का पीडीए मॉडल है, जो सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति पर आधारित है। दूसरी तरफ भाजपा का वह मॉडल है, जिसमें हिंदुत्व, विकास और मजबूत प्रशासनिक छवि का मिश्रण है।उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां चुनावी गणित आखिरी समय तक बदल सकता है। 1990 के दशक में मंडल और कमंडल की राजनीति ने सत्ता के समीकरण बदल दिए थे। 2014 के बाद मोदी लहर ने पारंपरिक जातीय राजनीति को पीछे धकेल दिया। अब सवाल यह है कि क्या पीडीए का नया नारा राज्य की राजनीति में उतना ही बड़ा बदलाव ला पाएगा।फिलहाल इतना तय है कि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं होगा। यह उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने वाला चुनाव साबित हो सकता है। आने वाले महीनों में सामाजिक समीकरणों, गठबंधन की रणनीतियों और स्थानीय मुद्दों की जो तस्वीर बनेगी, वही तय करेगी कि राज्य की राजनीति किस रास्ते पर आगे बढ़ेगी।


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