2029 के लिए हुंकार भरते राहुल
आम चुनाव 2024 के नतीजों ने कांग्रेस के भीतर जिस आत्मविश्वास का संचार किया था, वह अब 2026 में आकर एक बेहद सोची-समझी और आक्रामक रणनीति की शक्ल अख्तियार कर चुका है। साल 2025 में भले ही दिल्ली से लेकर बिहार तक कांग्रेस नेतृत्व के फैसलों में 'हिट एंड ट्रायल' यानी प्रयोगों वाली हड़बड़ाहट दिखाई दे रही थी, लेकिन अब दक्षिण भारत के राज्यों से आ रहे सियासी संकेत बता रहे हैं कि पार्टी ने 2029 के आम चुनाव के लिए अपनी बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। तमिलनाडु, केरलम और कर्नाटक में हाल के दिनों में लिए गए फैसले इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि कांग्रेस अब क्षेत्रीय दलों के रहमोकरम पर रहने वाली पुरानी स्थिति से बाहर निकल रही है। दिल्ली के चुनाव में जो रुख अरविंद केजरीवाल के प्रति अपनाया गया था, वही रुख अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और बिहार में तेजस्वी यादव के साथ भी साफ दिखाई दे रहा है। एक तरफ जहां हार के बाद क्षेत्रीय क्षत्रप अपने अस्तित्व को बचाने के संकट से जूझ रहे हैं, वहीं कांग्रेस उनके प्रति केवल उतनी ही सहानुभूति दिखा रही है जितनी गठबंधन धर्म की औपचारिकता के लिए जरूरी हो।
इस पूरी रणनीति का सबसे दिलचस्प अध्याय तमिलनाडु की धरती पर लिखा गया है। लोकसभा चुनाव के दौरान भले ही डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का सबसे मुखर समर्थन किया था, लेकिन राजनीति में वफादारी से बड़ा अवसर होता है। कांग्रेस ने तमिलनाडु के बदलते समीकरणों को भांपते हुए पांच दशक पुराने डीएमके गठबंधन को किनारे लगाने में देर नहीं लगाई। सिनेमा से राजनीति में आए सी. जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके (तमिलगा वेत्री कड़गम) के साथ हाथ मिलाकर कांग्रेस ने न सिर्फ स्टालिन को बड़ा झटका दिया, बल्कि करीब 59 साल बाद तमिलनाडु कैबिनेट में अपनी हिस्सेदारी भी पक्की कर ली। यह रणनीतिक चतुराई साफ करती है कि कांग्रेस अब दक्षिण में खुद को जूनियर पार्टनर की भूमिका से ऊपर उठाना चाहती है। परिसीमन जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर विजय और कांग्रेस का एक सुर में होना इस नए समीकरण को और मजबूती दे रहा है, जबकि एआईएडीएमके जैसी पारंपरिक ताकतें इस मामले में भाजपा के करीब खड़ी नजर आ रही हैं।
केरलम और कर्नाटक के हालिया घटनाक्रमों ने यह भी साबित कर दिया है कि कांग्रेस का आंतरिक नेतृत्व अब प्रांतीय नेताओं के दबाव में बिखरने के बजाय बेहद संभलकर फैसले ले रहा है। केरलम में यूडीएफ की शानदार जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए राहुल गांधी के बेहद करीबी और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल का नाम सबसे आगे चल रहा था। लेकिन जमीन से जुड़े नेता वीडी सतीशन ने जिस तरह का अड़ियल और स्पष्ट रुख अपनाया, उसने आलाकमान को जमीन की हकीकत स्वीकार करने पर मजबूर किया। सतीशन का यह चयन कांग्रेस के बढ़े हुए मनोबल का प्रतीक बना। ठीक इसी तर्ज पर कर्नाटक में भी बदलाव की स्क्रिप्ट लिखी गई। सिद्धारमैया जैसे कद्दावर और अड़ियल माने जाने वाले नेता को बिना किसी बड़े सियासी ड्रामे के दिल्ली बुलाकर मनाया गया और कमान डीके शिवकुमार को सौंप दी गई। हालांकि, सिद्धारमैया ने केंद्र में मिलने वाले राज्यसभा या अन्य बड़े पदों के प्रस्तावों को फिलहाल विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया है, लेकिन उनके बेटे यतींद्र के लिए कैबिनेट में मेडिकल एजुकेशन या पिछड़ा वर्ग कल्याण जैसे अहम विभागों की पैरवी करके उन्होंने अपने पत्ते साफ रख दिए हैं।
इस बदलाव के पीछे कांग्रेस का वह गहरा घाव भी है जो उसे 2018 में मिला था। तब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जीतने के महज छह महीने के भीतर हुए 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी बुरी तरह चूक गई थी। इस बार कांग्रेस उन गलतियों को दोहराने के मूड में नहीं है। डीके शिवकुमार के वोक्कालिगा चेहरे के साथ संतुलन बनाने के लिए कर्नाटक में तीन डिप्टी सीएम बनाने की जो तैयारी चल रही है, वह सोशल इंजीनियरिंग का बड़ा उदाहरण है। इसमें एससी कोटे से जी. परमेश्वर और मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे जैसे नाम रेस में हैं। राहुल गांधी जानते हैं कि अगर 2029 की लड़ाई जीतनी है, तो राष्ट्रीय स्तर पर उठाए जा रहे जाति जनगणना और ओबीसी के एजेंडे को जमीन पर उतारना होगा। यही वजह है कि मल्लिकार्जुन खड़गे के रूप में देश का सबसे बड़ा दलित चेहरा सामने रखने के बाद, वह सिद्धारमैया को कांग्रेस का सबसे बड़ा ओबीसी चेहरा बनाकर पूरे देश में भुनाना चाहते हैं।
राहुल गांधी ने साल 2021 के केरलम दौरे के समय उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत के लोगों की राजनीतिक समझ को बेहतर बताया था, जिसे तब अमेठी की हार के गुस्से के तौर पर देखा गया था। आज हालात बदल चुके हैं। अमेठी की जनता ने 2024 में कांग्रेस को वापस जिताकर उस पुरानी टीस को तो खत्म कर दिया है, लेकिन कांग्रेस का राजनीतिक झुकाव अब भी दक्षिण की तरफ ही ज्यादा मजबूत दिख रहा है। उत्तर भारत में जहां क्षेत्रीय दल कांग्रेस को दबाकर राजनीति करना चाहते हैं, वहीं दक्षिण भारत में कांग्रेस खुद ड्राइवर की सीट पर बैठने की तैयारी कर चुकी है। देखना यह होगा कि दिल्ली से बेंगलुरु और चेन्नई तक फैले इस नए सियासी प्रयोग की बदौलत क्या कांग्रेस 2028 के राज्य विधानसभा चुनावों और अंततः 2029 के महामुकाबले में भाजपा की मजबूत घेराबंदी कर पाएगी।
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