राहुल गांधी के दावे और मजबूत एनडीए के बीच झूलती देश की मौजूदा सियासत


राहुल गांधी के दावे और मजबूत एनडीए के बीच झूलती देश की मौजूदा सियासत

विपक्ष के नेता राहुल गांधी का यह दावा कि अगले एक साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार गिर जाएगी, इस समय देश के राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी बहस का केंद्र बन गया है। कांग्रेस की एक आंतरिक बैठक से निकला यह बयान केवल एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि इसके गहरे मायने तलाशे जा रहे हैं। बीजेपी ने स्वाभाविक रूप से इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे पूरी तरह से 'हवा-हवाई' और चुनावी हार से उपजी 'राजनीतिक निराशा' का नतीजा करार दिया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या राहुल गांधी के इस बड़े दावे के पीछे वाकई कोई ठोस राजनीतिक जमीन है, या फिर यह सिर्फ चुनाव दर चुनाव पस्त हो चुके अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों में नया जोश फूंकने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है? अगर वर्तमान समय के जमीनी सियासी और अंकगणितीय हालात का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो यह दावा हकीकत से ज्यादा महज एक राजनीतिक बयानबाजी की तरह ही नजर आता है।

इस दावे के खोखले दिखने की सबसे बड़ी और व्यावहारिक वजह केंद्र में बैठी एनडीए सरकार का मौजूदा संख्या बल है। यह सही है कि भारतीय जनता पार्टी इस बार अकेले दम पर बहुमत का जादुई आंकड़ा नहीं छू सकी और उसे सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद पूरे गठबंधन के साथ मिलकर सरकार पूरी तरह से सुरक्षित और स्थिर दिखाई दे रही है। फिलहाल सत्ता पक्ष के भीतर से किसी भी तरह के अंतर्विरोध या बड़े मतभेद की खबरें सामने नहीं आई हैं, जो सरकार की सेहत पर तत्काल प्रभाव डाल सकें। गठबंधन के प्रमुख घटक दल सरकार के साथ मजबूती से खड़े नजर आ रहे हैं। ऐसे में किसी भी तात्कालिक राजनीतिक संकट की दूर-दूर तक कोई संभावना दिखाई नहीं देती, जो सरकार को अस्थिर कर सके।

इसके अतिरिक्त, हाल के महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए विभिन्न चुनावों के नतीजों और राजनीतिक घटनाक्रमों ने यह साफ संकेत दिया है कि जमीन पर बीजेपी का जनाधार अभी भी काफी मजबूत है। पश्चिम बंगाल और असम जैसे गैर-हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी को जनता का जो समर्थन मिला है, उसने विपक्ष की इस थ्योरी को कमजोर किया है कि बीजेपी सिर्फ उत्तर भारत या हिंदी पट्टी तक ही सीमित है। विशेष रूप से बंगाल में तमाम चुनौतियों और हिंसक परिस्थितियों के बीच भी बीजेपी ने अपनी राजनीतिक मौजूदगी को न सिर्फ बरकरार रखा है, बल्कि उसे और धार दी है। वहीं असम में भी पार्टी और उसकी राज्य सरकार की पकड़ पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और व्यापक होकर उभरी है। ये चुनावी संदेश यह बताने के लिए काफी हैं कि पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में पार्टी का सांगठनिक ढांचा और प्रभाव लगातार विस्तार ले रहा है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर उसकी स्थिति और मजबूत हुई है।

इन सब के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता आज भी बीजेपी की सबसे बड़ी और अचूक मार्गदर्शक ताकत बनी हुई है। राष्ट्रीय स्तर पर जब चेहरे की बात आती है, तो मोदी का प्रभाव विपक्ष के किसी भी नेता के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़ा और व्यापक माना जाता है। विपक्षी दल लंबे समय से महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और पेपर लीक जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दों को लेकर लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं और सरकार को घेरने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इन तमाम घेराबंदियों के बावजूद, जमीन पर आम जनता के बीच मोदी की व्यक्तिगत विश्वसनीयता और लोकप्रियता में कोई बड़ी गिरावट देखने को नहीं मिली है। एक बड़े मतदाता वर्ग में उनके प्रति भरोसा आज भी कायम है। यही वह मुख्य कारक है जो तमाम विपरीत परिस्थितियों और मुद्दों के उठने के बाद भी बीजेपी को चुनावी राजनीति में बढ़त दिला देता है।

राहुल गांधी अपने इस आक्रामक बयान के पीछे देश में बढ़ रहे आर्थिक असंतोष और विशेषकर युवाओं की नाराजगी को मुख्य आधार बना रहे हैं। कांग्रेस ने नीट पेपर लीक और छात्रों की भविष्य से जुड़ी चिंताओं को एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की। विपक्ष को लगा था कि यह मुद्दा सरकार की जड़ें हिला सकता है, लेकिन सरकार ने भी इस पर राजनीतिक नुकसान को भांपते हुए त्वरित कदम उठाए, जांच एजेंसियों को सक्रिय किया और कड़े फैसले लिए। नतीजतन, विपक्ष इस मुद्दे का वह राजनीतिक लाभ नहीं उठा सका जिसकी उसने उम्मीद की थी। वैसे भी, भारतीय राजनीति का पुराना इतिहास गवाह है कि महज कुछ जन-मुद्दों या प्रशासनिक कमियों के आधार पर पूर्ण बहुमत या मजबूत गठबंधन वाली सरकारें नहीं गिरा करतीं। किसी भी चुनी हुई सरकार के गिरने के लिए सत्ताधारी दल के भीतर एक बहुत बड़ा आंतरिक विभाजन होना जरूरी होता है, या फिर गठबंधन के सहयोगियों में ऐसी दरार आ जाए जिसे पाटना नामुमकिन हो। फिलहाल एनडीए के भीतर ऐसी कोई भी स्थिति दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। ऐसे में एक स्थिर सरकार के समय से पहले गिरने की भविष्यवाणी करना, राहुल गांधी की अपनी राजनीतिक परिपक्वता और समझ पर भी सवाल खड़े करता है।

इस पूरे परिदृश्य का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राहुल गांधी भले ही सरकार गिरने का दावा कर रहे हों, लेकिन खुद विपक्ष की अपनी स्थिति भी बहुत ज्यादा एकजुट और मजबूत नहीं कही जा सकती। चुनाव के वक्त बना 'इंडिया' गठबंधन अभी भी एक बिखरा हुआ ढांचा ही नजर आता है, जहां शामिल तमाम क्षेत्रीय दलों के अपने-अपने राज्यों में अलग-अलग सियासी हित और मजबूरियां हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष आज तक न तो कोई एक सर्वमान्य चेहरा देश के सामने पेश कर पाया है और न ही कोई ऐसा ठोस, सकारात्मक और वैकल्पिक एजेंडा रख पाया है जिससे आम जनता को आकर्षित किया जा सके। इसके अलावा, देश के कई बड़े राज्यों में कांग्रेस का अपना सांगठनिक ढांचा बेहद कमजोर और निष्क्रिय स्थिति में है। जब तक जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत नहीं होगा, तब तक सत्ता पक्ष की मजबूत मशीनरी को चुनौती देना नामुमकिन है। यही वजह है कि बीजेपी के खिलाफ विपक्ष की यह चुनौती फिलहाल पूरी तरह से बिखरी हुई और दिशाहीन नजर आती है।यही कारण है कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने राहुल गांधी के इस बयान को बेहद हल्के में लिया है। सत्ता पक्ष के रणनीतिकारों और मंत्रियों का साफ कहना है कि विपक्ष दरअसल जनता के इस जनादेश को दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि देश ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है। अपनी इसी हताशा को छिपाने और राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए इस तरह के काल्पनिक और बेतुके बयान दिए जा रहे हैं।

कुल मिलाकर, गहराई से देखा जाए तो राहुल गांधी का यह पूरा बयान किसी वास्तविक राजनीतिक संभावना पर आधारित होने के बजाय, एक सोची-समझी रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक चाल अधिक प्रतीत होता है। कांग्रेस नेतृत्व इसके जरिए अपने कार्यकर्ताओं और देश भर में फैले समर्थकों में यह संदेश देना चाहता है कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और दिल्ली की सत्ता को कभी भी चुनौती दी जा सकती है। पार्टी अपने कैडर को अवसाद से बाहर निकालकर आगामी राज्य विधानसभा चुनावों के लिए सक्रिय रखना चाहती है। लेकिन अगर हम आज के वास्तविक राजनीतिक समीकरणों, प्रधानमंत्री मोदी की मजबूत जन-पकड़, एनडीए के अटूट संख्या बल और खुद विपक्ष की आंतरिक कमजोरियों का निष्पक्ष आकलन करें, तो राहुल गांधी की यह भविष्यवाणी फिलहाल धरातल की कड़वी सच्चाई से कोसों दूर, सिर्फ एक राजनीतिक कोरी कल्पना ही नजर आती है। 

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