यूपी में कहां से उठ रही है सपा के टूटने की आवाज
संजय सक्सेना,लखनऊ
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों शह और मात का एक ऐसा खेल शुरू हो चुका है, जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है. देश के दो बड़े राज्यों पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में हुई बड़ी राजनीतिक टूट और दलबदल के बाद अब कयासों के बाजार का रुख देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की ओर मुड़ गया है. इस पूरे सियासी बवंडर के केंद्र में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर का वह सनसनीखेज दावा है, जिसने समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर बेचैनी बढ़ा दी है. राजभर ने एक बड़ा सियासी धमाका करते हुए दावा किया है कि महाराष्ट्र और बंगाल की टूट तो महज एक बानगी है, उत्तर प्रदेश में तो पूरी की पूरी समाजवादी पार्टी ही भारतीय जनता पार्टी में विलय होने को बेताब बैठी है. इस दावे ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में वर्ष 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ही चुनावी बिसात बिछा दी है. राजभर का यह दावा केवल एक सामान्य बयानबाजी नहीं है, बल्कि उन्होंने इसके पीछे एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज कहानी बुनी है. सुभासपा प्रमुख का कहना है कि समाजवादी पार्टी के सबसे कद्दावर और वरिष्ठ नेताओं में शुमार रामगोपाल यादव ने देश के गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर उन्हें एक गोपनीय पत्र सौंपा है. राजभर के अनुसार, इस पत्र में समाजवादी पार्टी के उन तमाम बड़े चेहरों की एक लंबी सूची शामिल है, जो भाजपा के साथ जाने को तैयार हैं. उनका आरोप है कि सपा के शीर्ष नेता खुद को और अपने करीबियों को बचाने के लिए पर्दे के पीछे से इस सौदेबाजी में लगे हैं. उन्होंने तीखा तंज कसते हुए कहा कि जब कोई बाजार में बिकने को तैयार होता है, तभी खरीदार सामने आते हैं और अब उत्तर प्रदेश की बारी आ चुकी है.
इस तीखे और सीधे हमले पर समाजवादी पार्टी की तरफ से भी उतनी ही तीखी और आक्रामक प्रतिक्रिया सामने आई है. सपा के मुख्य प्रवक्ता सुनील साजन ने राजभर के दावों पर कड़ा पलटवार करते हुए इसे पूरी तरह से निराधार और 'अपनी राजनीतिक दुकान' चलाने की कोशिश करार दिया है. सपा का तर्क है कि भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन से बुरी तरह बौखलाए हुए हैं. गौरतलब है कि वर्ष 2024 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में एक नया इतिहास रचते हुए 80 लोकसभा सीटों में से अकेले अपने दम पर 37 सीटों पर जीत हासिल की थी. इस अप्रत्याशित प्रदर्शन के दम पर सपा न केवल राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, बल्कि उसने भाजपा के विजय रथ को 33 सीटों पर रोक दिया. सपा प्रवक्ताओं का दावा है कि जिस प्रकार उन्होंने 2024 में भाजपा को 'हाफ' (आधा) कर दिया था, उसी प्रकार 2027 के विधानसभा चुनावों में वे भाजपा का उत्तर प्रदेश से पूरी तरह 'साफ' (सफाया) कर देंगे. उत्तर प्रदेश के हालिया चुनावी समीकरणों, सीटों के उतार-चढ़ाव और बदलते सांगठनिक परिदृश्य को समझने के लिए निम्नलिखित सांख्यिकीय आंकड़ों का विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 47 सीटें जीती थीं, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में उसकी संख्या बढ़कर 111 सीटों तक पहुंच गई थी (सपा गठबंधन को 108 विपक्षी सीटें मिली थीं)। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरते हुए कन्नौज से अखिलेश यादव को विजयी बनाया। वर्ष 2027 के लिए पार्टी पूरे प्रदेश में 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 312 सीटें जीतकर ऐतिहासिक सफलता हासिल की थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीटें घटकर 255 रह गईं, हालांकि एनडीए गठबंधन को कुल 293 सीटें प्राप्त हुई थीं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई और सहयोगी दलों सहित भी वह पहले जैसी बढ़त कायम नहीं रख सकी। वर्ष 2027 के चुनाव को देखते हुए भाजपा 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे के साथ सत्ता बचाने की बड़ी चुनौती का सामना कर रही है।सुभासपा (ओम प्रकाश राजभर) ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 8 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 4 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 18 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6 सीटें जीतीं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सुभासपा एनडीए गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में उतरी और घोसी सीट पर अपनी दावेदारी बनाए रखी। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी पूर्वांचल की 32 सीटों पर मजबूत दावा कर रही है तथा आजमगढ़ को समाजवादी पार्टी से छीनने की रणनीति पर काम कर रही है।इस राजनीतिक घमासान की तह में जाने पर यह साफ हो जाता है कि राजभर के तीखे हमलों के पीछे केंद्रीय जांच एजेंसियों का बढ़ता कानूनी शिकंजा एक बड़ा हथियार बनकर उभरा है. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल (2012-2017) के दौरान हुए दो बड़े घोटालों अवैध खनन घोटाला और गोमती रिवर फ्रंट विकास परियोजना को लेकर जांच की आंच अब बेहद तेज हो चली है. अवैध खनन का मामला सीधे तौर पर वर्ष 2012 से 2016 के बीच का है, जब खुद अखिलेश यादव के पास खनन मंत्रालय का प्रभार था. केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का आरोप है कि इस अवधि के दौरान नियमों और ई-टेंडरिंग प्रक्रिया को पूरी तरह ताक पर रखकर चहेतों को बालू और मौरंग के खनन पट्टे बांटे गए. इस घोटाले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 17 फरवरी 2013 को महज एक ही दिन के भीतर बिना किसी पारदर्शी निविदा के 13 बड़ी खनन परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गई थी.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के कड़े आदेश के बाद वर्ष 2016 में सीबीआई ने इस मामले की जांच हाथ में ली थी. इस जांच के दौरान उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक महकमे में उस समय हड़कंप मच गया जब बेहद रसूखदार आईएएस अधिकारी बी. चंद्रकला (तत्कालीन डीएम हमीरपुर) और 2007 बैच के आईएएस अधिकारी अभय कुमार सिंह के ठिकानों पर छापेमारी की गई. फतेहपुर के तत्कालीन डीएम अभय कुमार सिंह के सरकारी बंगले से सीबीआई ने 47 लाख रुपये की भारी नकदी बरामद की थी, जिसने सपा शासनकाल के प्रशासनिक भ्रष्टाचार को पूरी तरह उजागर कर दिया था. इसी क्रम में, लोकसभा चुनाव 2024 से ठीक पहले फरवरी 2024 में सीबीआई ने सीआरपीसी की धारा 160 के तहत अखिलेश यादव को गवाह के तौर पर बयान दर्ज कराने के लिए दिल्ली तलब किया था. हालांकि अखिलेश यादव ने इसे भाजपा की 'घबराहट' और 'चुनावी हथकंडा' बताते हुए व्यक्तिगत रूप से पेश होने से इनकार कर दिया था, लेकिन कानूनी तलवार आज भी उनके सिर पर लटक रही है.दूसरी तरफ, अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट माने जाने वाले गोमती रिवर फ्रंट विकास कार्य में भी भ्रष्टाचार का एक बड़ा जिन्न बाहर निकल चुका है. लखनऊ की जीवनदायिनी गोमती नदी के सौंदर्यीकरण और सफाई के नाम पर शुरू की गई इस परियोजना के लिए तत्कालीन सपा सरकार ने 1438 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया था. जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार, कुल आवंटित बजट का 95 प्रतिशत हिस्सा पानी की तरह बहा दिया गया, लेकिन इसके बावजूद नदी में गिरने वाले 37 गंदे नालों को रोकने और ट्रंक सीवर लाइन बिछाने का काम अधूरा ही रह गया. सीबीआई द्वारा दर्ज की गई इस मामले की दूसरी विस्तृत एफआईआर में सिंचाई विभाग के 16 वरिष्ठ अधिकारियों और इंजीनियरों सहित कुल 189 लोगों को आरोपी बनाया गया है. जांच में खुलासा हुआ कि परियोजना के तहत नियमों को ताक पर रखकर ब्लैकलिस्टेड कंपनियों को काम सौंपा गया और फ्रांस की कंपनी 'एक्वॉटिक शो' से भारी कीमत पर फव्वारे मंगाए गए. इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की जा रही मनी लॉन्ड्रिंग की जांच ने कई सपा समर्थक ठेकेदारों और राजनेताओं के वित्तीय साम्राज्य पर संकट ला दिया है.इस कानूनी दबाव के बीच, राजभर और अखिलेश यादव के बीच का यह राजनीतिक युद्ध केवल कानूनी फाइलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक और व्यक्तिगत हमलों के रूप में सोशल मीडिया पर भी खुलकर सामने आया है. राजभर ने अखिलेश यादव के विदेश दौरों को निशाना बनाते हुए तीखे शब्दों में एक लंबी पोस्ट साझा की थी. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को लंदन और पेरिस की चमचमाती सड़कों से इतना गहरा लगाव हो गया है कि वे अपने ही प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहरों को भूल गए हैं. राजभर का सुझाव था कि यदि अखिलेश यादव विदेश घूमने की बजाय काशी, अयोध्या, मथुरा, नैमिषारण्य या मां विंध्यवासिनी धाम जैसे पवित्र धार्मिक स्थलों का भ्रमण करते, तो इससे उत्तर प्रदेश के पर्यटन को बढ़ावा मिलता. इससे स्थानीय फूल विक्रेताओं, छोटे दुकानदारों, गाइडों और होटल व्यवसायियों को सीधे तौर पर रोजगार मिलता, जिससे 'नए उत्तर प्रदेश' की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजभर द्वारा समाजवादी पार्टी पर किए जा रहे इन सुनियोजित हमलों के पीछे एक गहरी चुनावी रणनीति काम कर रही है. आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए सुभासपा एनडीए के भीतर अपनी स्थिति को बेहद मजबूत करना चाहती है. सुभासपा ने पहले ही पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के आजमगढ़ जिले को अपना मुख्य रणक्षेत्र घोषित कर दिया है, जो पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी का अभेद्य किला माना जाता रहा है. सुभासपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अरुण राजभर ने साफ किया है कि पार्टी आजमगढ़ की अतरौलिया, मेहनगर और दीदारगंज जैसी महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों पर अपनी दावेदारी ठोक चुकी है और वहां सांगठनिक रूप से बेहद सक्रिय है. सुभासपा का दावा है कि पिछले चुनावों में सपा को जो बढ़त मिली थी, वह केवल ओम प्रकाश राजभर के सामाजिक जनाधार के कारण थी. अब चूंकि सुभासपा वापस एनडीए के पाले में है, इसलिए वे पूर्वांचल में सपा के 'पीडीए' समीकरण को पूरी तरह ध्वस्त करने का इरादा रखते हैं. इस प्रकार, उत्तर प्रदेश की राजनीति में छिड़ा यह नया अध्याय केवल तात्कालिक बयानों का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह 2027 के महासंग्राम की एक पूर्व-तैयारी है. एक तरफ जहां समाजवादी पार्टी अपने हालिया लोकसभा विजय के रथ पर सवार होकर राज्य की सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रही है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा और उसके सहयोगी दल जांच एजेंसियों के कानूनी शिकंजे और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आख्यान के जरिए सपा के किले में सेंध लगाने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं. राजभर के बयानों ने इस राजनीतिक रस्साकशी को और अधिक धार दे दी है. अब देखना यह होगा कि क्या वाकई समाजवादी पार्टी के भीतर कोई बड़ी टूट आकार ले रही है या फिर यह महज 2027 के विधानसभा चुनाव में सीटों की बार्गेनिंग के लिए खेला जा रहा एक बड़ा राजनीतिक दांव है. बहरहाल, देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश में शह और मात का यह खेल आने वाले दिनों में और अधिक आक्रामक और दिलचस्प होने वाला है.
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