रक्षाबंधन की मिठास पर महंगाई की कड़वी चोट

 रक्षाबंधन की मिठास पर महंगाई की कड़वी चोट

रक्षाबंधन रिश्तों की मिठास का त्योहार है, लेकिन इस बार मिठास का सबसे बड़ा सवाल चीनी बन गई है। बहन राखी बांधने से पहले तोहफे का हिसाब लगा रही है और भाई मिठाई से पहले चीनी का भाव पूछ रहा है। बाजार में 40 से 50 रुपये किलो बिकने वाली चीनी कई जगह 60 से 75 रुपये तक पहुंच गई। राष्ट्रीय औसत खुदरा कीमत 20 जुलाई के 48.18 रुपये प्रति किलो से 20 अगस्त को 55.70 रुपये पहुंच गई। यानी सिर्फ एक महीने में करीब 16 प्रतिशत तेजी। दो महीनों की उछाल लगभग 40 प्रतिशत तक बताई जा रही है। सवाल केवल यह नहीं कि चीनी महंगी क्यों हुई। असली सवाल यह है कि सरकार को संकट का अंदाजा इतनी देर से क्यों हुआ। चीनी का मामला इसलिए भी गंभीर है कि यह केवल चाय की प्याली का खर्च नहीं बढ़ाता। मिठाई, बिस्कुट, कोल्ड ड्रिंक, बेकरी, होटल, हलवाई और त्योहारों की पूरी अर्थव्यवस्था इसकी कीमत से प्रभावित होती है। अगस्त से नवंबर के बीच गणेशोत्सव, दशहरा, दीपावली और शादियों के कारण मांग बढ़ती है। सरकार ने जुलाई के आखिर में ही माना था कि चीनी के एक्स-मिल दामों में बढ़ोतरी मांग-आपूर्ति की सामान्य स्थिति से मेल नहीं खाती। इसके बावजूद बाजार की आग इतनी बढ़ने दी गई कि अगस्त में भारत को करीब एक दशक बाद दस लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात का फैसला करना पड़ा। जिस देश ने कुछ महीने पहले निर्यात की अनुमति दी थी, उसे त्योहारों से ठीक पहले आयात का दरवाजा खोलना पड़ा। यही नीति की सबसे बड़ी विडंबना है।

संकट की जड़ उत्पादन अनुमान में हुई बड़ी चूक है। चालू 2025-26 चीनी मौसम के लिए शुरुआत में लगभग 343 लाख टन उत्पादन का अनुमान था, लेकिन बाद में इसे घटाकर करीब 306 लाख टन करना पड़ा। यानी अनुमान में लगभग 37 लाख टन की कमी। सरकार के अनुसार अत्यधिक बारिश से जलभराव, रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों ने गन्ने को नुकसान पहुंचाया। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे महत्वपूर्ण उत्पादक राज्यों में मौसम की मार ने चिंता बढ़ाई। उत्तर प्रदेश में गन्ना क्षेत्र बढ़ने के बावजूद उत्पादन और रिकवरी का सवाल अलग है। इसलिए केवल खेत का रकबा देखकर चीनी की उपलब्धता तय नहीं होती। फसल, बीमारी, बारिश, रिकवरी और मिलों तक पहुंचने वाला गन्ना, सभी का हिसाब जरूरी है। इसके बाद आता है भंडार और बाजार का खेल। जब उत्पादन अनुमान कमजोर पड़ता है, कारोबारी भविष्य की कमी देखकर खरीद बढ़ाते हैं। सरकार ने पहले डीलरों के लिए स्टॉक सीमा लागू की और बाद में बड़े उपभोक्ताओं के लिए नियम और सख्त कर दिए। एक सितंबर से महीने में दस टन से अधिक चीनी इस्तेमाल करने वालों को केवल पंद्रह दिन की जरूरत के बराबर स्टॉक रखने की अनुमति है। सरकार ने मिलों से बिक्री और खरीदारों का विवरण भी मांगा तथा भौतिक सत्यापन के निर्देश दिए। इसका मतलब साफ है कि समस्या केवल खेत में कम उत्पादन की नहीं, बाजार में उपलब्ध माल को लेकर पैदा हुई आशंका और जमाखोरी की भी है। सवाल फिर वही है कि जब जुलाई में सरकार को असामान्य तेजी दिखाई दे रही थी, तब निगरानी पहले क्यों नहीं बढ़ाई गई?

इसी बीच एथनॉल पर राजनीति गर्म है। आलोचकों का तर्क है कि गन्ने और चीनी का एक हिस्सा ईंधन बनाने में जाने से घरेलू आपूर्ति प्रभावित हुई। सरकार इसे खारिज करती है। उसका कहना है कि एथनॉल के लिए चीनी का उपयोग 2022-23 के करीब 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में लगभग 9 प्रतिशत रह गया है और देश के कुल एथनॉल उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्के से आता है। इसलिए वर्तमान महंगाई को सीधे एथनॉल से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से आसान निष्कर्ष हो सकता है, लेकिन इससे बड़ा सवाल खत्म नहीं होता। क्या खाद्य, गन्ना, एथनॉल और ऊर्जा सुरक्षा की नीति को मौसम के बदलते जोखिम के अनुसार हर साल समायोजित किया जा रहा है? यहीं सरकार को बहस से ऊपर उठकर नीति की समीक्षा करनी चाहिए। एथनॉल कार्यक्रम का उद्देश्य तेल आयात घटाना, किसानों को नया बाजार देना और ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाना है। यह महत्वपूर्ण है। लेकिन किसी भी नीति की सफलता का मतलब यह नहीं कि उसके संभावित दुष्प्रभावों की समीक्षा बंद कर दी जाए। यदि किसी साल गन्ने की फसल खराब होती है, तो प्राथमिकता क्या होगी? चीनी, एथनॉल या दोनों के बीच संतुलन? क्या उत्पादन घटने के संकेत मिलते ही एथनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल पर स्वतः नियंत्रण का तंत्र होना चाहिए? यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सरकार स्वयं अगले मौसम में गन्ने से एथनॉल उत्पादन सीमित करने जैसे विकल्पों पर विचार कर चुकी है।

आयात का फैसला तत्काल राहत दे सकता है, लेकिन यह कोई स्थायी इलाज नहीं है। दस लाख टन कच्ची चीनी को शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति 31 अक्टूबर तक दी गई है। पहले आयात पर 100 प्रतिशत शुल्क था। आयातित चीनी का कुछ हिस्सा जल्दी बाजार में आ सकता है, मगर बड़ी खेपों को बंदरगाह तक पहुंचने में समय लगेगा। इसलिए रक्षाबंधन की मिठाई का दाम तुरंत नीचे आ जाएगा, ऐसी उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। सरकार को आयात के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सस्ती आने वाली चीनी का लाभ उपभोक्ता तक पहुंचे, केवल व्यापारियों और रिफाइनरियों की मार्जिन में न समा जाए।उत्तर प्रदेश का मामला इस संकट में खास है। देश के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों में शामिल यूपी में भी खुदरा बाजार में तेजी दिखी। हालांकि राज्य सरकार के अनुसार चीनी मिलों के पास 179.38 लाख क्विंटल चीनी उपलब्ध है, जिसमें सहकारी मिलों में 23.60 लाख क्विंटल, निगम मिलों में 5.28 लाख क्विंटल और निजी मिलों में 150.50 लाख क्विंटल भंडार बताया गया। यदि भंडार पर्याप्त है तो खुदरा बाजार में इतनी तेज कीमत का जवाब केवल उत्पादन संकट से नहीं मिलेगा। फिर वितरण श्रृंखला, मिल से बाजार तक कीमत, थोक खरीद और स्थानीय जमाखोरी की अलग जांच जरूरी है। उपलब्धता कागज पर और दुकान पर अलग-अलग नहीं होनी चाहिए।

यह संकट गुड़ की कहानी से और दिलचस्प हो जाता है। चीनी महंगी हुई तो लोग सोचते हैं कि गुड़ सस्ता विकल्प होगा, लेकिन कई बाजारों में गुड़ के दाम भी तेज हैं। इसकी वजह पुराने स्टॉक का घटना, नए पेराई सत्र से पहले की मांग, कम उत्पादन और वैकल्पिक स्वीटनर के रूप में बढ़ती खपत है। भारत दुनिया के गुड़ उत्पादन में लगभग 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रखता है और गन्ने का करीब 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा गुड़ तथा खांडसारी क्षेत्र में जाता है। यानी चीनी का संकट केवल सफेद दानों की कहानी नहीं, पूरे गन्ना अर्थतंत्र के संतुलन का मामला है।सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब कीमत गिराने से ज्यादा भरोसा बहाल करना है। आयात, स्टॉक सीमा और छापेमारी के कदम जरूरी हैं, लेकिन इनकी सफलता बाजार में दिखाई देनी चाहिए। उत्पादन अनुमान अधिक सटीक हों, मौसम और बीमारी की चेतावनी समय पर मिले, निर्यात निर्णय वास्तविक उपलब्धता के आधार पर हों और एथनॉल नीति में लचीलापन हो। त्योहार से पहले बहन को चीनी का कट्टा और भाई को घेवर का बिल मजाक लग सकता है, मगर इसके पीछे गंभीर आर्थिक सवाल है। मिठास की चीज जब रिकॉर्ड महंगी हो जाए, तब सरकार को केवल आग बुझाने नहीं, धुआं उठते ही चेत जाने की जरूरत होती है। इस बार चीनी ने यही कड़वा सबक दिया है।

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